दिवाली, पटाखे, परम्परा और अदालती हरियाली

Edited By Updated: 10 Nov, 2020 11:42 AM

diwali firecrackers traditions and court greenery

राष्ट्रीय हरित पंचाट यानी ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अपने एक फैसले ने इस बार दिवाली पर पटाखों का प्रयोग बहुत हद तक बन्धित कर दिया है। पंचाट ने इसे सीधे संबंधित स्थान कि वायु गुणवत्ता यानी  एयर क्वालिटी इंडेक्स से जोड़ते हुए हुए पटाखे चलाने की अनुमति देने...

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): राष्ट्रीय हरित पंचाट यानी ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अपने एक फैसले ने इस बार दिवाली पर पटाखों का प्रयोग बहुत हद तक बन्धित कर दिया है। पंचाट ने इसे सीधे संबंधित स्थान कि वायु गुणवत्ता यानी  एयर क्वालिटी इंडेक्स से जोड़ते हुए हुए पटाखे चलाने की अनुमति देने के निर्देश दिए हैं। दिल्ली समेत कुछ जगह पूर्ण प्रतिबन्ध भी वहां के शासन ने लगा दिया है।खैर इसी बहाने एकबार फिर बहस छिड़ गई है कि पटाखों के बिना कैसी दिवाली। हालांकि  दिवाली का पटाखों से क्या सम्बन्ध है, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।  

 

वास्तव में पटाखों का इतिहास जानना उतना आसान नहीं है, जितना पटाखों को जलाना। लेकिन जब भी दिवाली आती है, तब पटाखों पर प्रतिबंध की बात जरूर मुखर हो जाती है। खासकर, 2015 की उस याचिका के बाद से जब सुप्रीम कोर्ट में तीन नवजात शिशुओं की तरफ से पटाखों पर प्रतिबंध की मांग की गुहार लगाई गयी थी। इन शिशुओं के नाम थे अर्जुन गोपाल, आरव भंडारी और ज़ोया राव भसीन। ये अब पांच साल के होंगे। हो सकता है, इनका मन भी इस दिवाली पटाखे चलाने को मचल रहा हो, लेकिन इनके परिजनों द्वारा इनके नाम पर डाली गई उसी याचिका पर 2 साल पहले  सुप्रीम कोर्ट ने अहम् फैसला सुनाया था। 

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कोर्ट ने दिवाली पर पटाखे प्रतिबंधित तो नहीं किए, लेकिन बंधित जरूर कर दिए। अपने फैसले में सुप्रीम ने कहा था कि अब पटाखे दिवाली (या ऐसे किसी दूसरे त्योहार) पर रात 8 से 10 बजे के बीच ही जलाए जा सकेंगे। क्रिसमस और नए साल के मौकों पर ये समय एक घंटे का है जो रात के 11.45 से लेकर 12.45 तक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने देश में ग्रीन पटाखे चलाये जाने की बात भी कही है। इस तरह से पटाखे तो प्रतिबंधित होने से बच गए, लेकिन बहस ज्यों की त्यों रह गई। बहस इस बात की कि क्या दिवाली पर पटाखे छोड़ा जाना सही है या नहीं? जो लोग इसके विरोध में हैं, उनका यही सबसे बड़ा तर्क रहता है कि दिवाली का पटाखों से कोई सम्बन्ध नहीं है। अब हरित पंचाट ने  इसी फैसले में कुछ और बढ़ोतरी कर दी है जिसके बाद कई राज्यों में दीवाली पर पटाखे बैन कर दिए गए हैं।

 

दिवाली रौशनी से सम्बन्ध रखने वाला त्योहार है जो कालांतर में आतिशबाजी और पटाखों से जुड़ गया। सिख पंथ में भी बंदी छोड़ दिवस को लेकर यह परम्परा दिखती है, लेकिन उसमें भी यह प्रामाणिक नहीं है कि तब पटाखे ही चलाए गए होंगे, क्योंकि देश में आज हम जिसे पटाखे या आतिशबाजी कहते हैं, वो चीज़ें 1940 के बाद ही आईं। हां, यह जरूर हो सकता है कि ऐसे मौकों पर बंदूकें या तोपें दागी गई हों, जिन्होंने कालान्तर में पटाखों का स्थान ले लिया हो। अगर ऐसा है तो फिर यह जश्न तो पहले से ही स्वसीमित है, बन्दूक/तोप से पटाखे पर जो आ गया। लेकिन चलिए इस बहाने पटाखों के इतिहास पर ही नज़र डाल लेते हैं।

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कितना पुराना है पटाखों का इतिहास ?
विभिन्न उपलब्ध लेखों का अध्ययन करने के बाद हमने यह पाया है कि भारत में पटाखों का आगमन मुग़ल काल माना जाता है। हालांकि, यह भी पूर्ण रूप से स्थापित तथ्य नहीं है। उससे पहले कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी ऐसे किसी चूर्ण का उल्लेख है जिसे आप बारूद कह सकते हैं। ऐसे में इसे सही माना जा सकता है कि पटाखों का अविष्कार बारूद के प्रयोगों की परिणति है। वैसे, आपको बता दें कि दुनिया में बारूद 1270 में (या उससे पहले ढूंढा जा चुका था) सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल रम्माह ने 1270  में अपनी किताब में इसका उल्लेख किया था। खैर भारत में जब 1526 में काबुल के तैमूरी शासक ज़हीर उद्दीन मोहम्मद बाबर की सेना ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोधी की एक बहुत बड़ी सेना को युद्ध में परास्त किया, तब बारूद का रूप सामने आया था। यही वो पहली लड़ाई थी जिसमे अपने देश में आधिकारिक रूप से बारूद का प्रयोग पहली बार हुआ था। 

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इतिहासकार लिखते हैं कि जब 1526 में काबुल के सुल्तान बाबर ने दिल्ली के सुल्तान पर हमला किया तो उसकी बारूदी तोपों की आवाज़ सुनकर भारतीय सैनिकों के छक्के छूट गए। जबकि बाबर की तुलना में लोधी की सेना तीन गुना ज्यादा थी। माना जाता है कि अगर उससे पहले भारत में मंदिरों और शहरों में त्योहारों आदि पर पटाख़़े फोड़ने की परम्परा रही होती तो शायद लोधी के वीर सिपाही तेज़ आवाज़ से इतना न डरते। मुग़ल काल के दस्तावेजों में शामिल दारा शिकोह की शादी के एक उपलब्ध चित्र में भी लोग पटाखे जलाते दिख रहे हैं। लेकिन अयोध्या में राम आगमन पर कभी पटाखे चलाने जैसा उल्लेख नहीं मिला, वहां घी के दीए जलाने का ही विवरण मिलता है। दिलचस्प ढंग से राम के ससुराल यानी मिथिला /जनकपुरी, जो अब नेपाल में है, वहां वर्तमान में पटाखे जलाने पर प्रतिबंध है। खैर मुगलों के साथ जब यह चीज़ भारत आयी तो सम्भवतया बाद में लोगों ने दिवाली और फिर कालांतर में शादी-ब्याह और ख़ुशी जाहिर करने के अन्य आयोजनों पर पटाखे जलाने शुरू कर  दिए होंगे। 

 

दिलचस्प ढंग से 1667 में औरंगजेब ने दिवाली पर सार्वजनिक रूप से दीयों और पटाखों के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी थी। यानी तब तक यह सब भारतीयों की शान से जुड़ गयी होगी। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने एक्स्प्लोसिव एक्ट पारित किया। इसमें पटाखों के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को बेचने और पटाखे बनाने पर पाबंदी लगा दी गई। बाद में जब 1940 में इस एक्ट में संशोधन हुआ तो उसी साल तमिलनाडु के शिवकाशी में पहली आधिकारिक पटाखा फैक्ट्री की शुरुआत हुई। इसे नादर ब्रदर्स के नाम से शुरू किया गया था। उसके बाद इस उद्योग ने आतिशबाजी की तरह  विस्तार लिया और अब जबसे बाल मजदूरी और पर्यावरण को लकेर उंच-नीच शुरू हुई है, यह उद्योग ढलान पर है।  

 

बड़ा सवाल : कब आएंगे ग्रीन पटाखे 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में ग्रीन पटाखों का भी उल्लेख किया था। हकीकत यह है कि ग्रीन पटाखे अभी देश में उपलब्ध नहीं है। वे सिर्फ प्रायोगिक अवस्था में ही हैं। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) इन पर शोध कर रहा है। नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं। पानी पैदा करने वाले पटाखे, सुगंध बिखेरने वाले एरोमा क्रैकर्स, कम एल्युमिनियम पैदा करने वाले पटाखे और कम सल्फर और नाइट्रोजन पैदा करने वाले पटाखे। ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं, जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे। लेकिन इस सबके बावजूद सच्चाई यही है कि ग्रीन पटाखे बाज़ार में आने में अभी समय लेंगे। तब तक आपको पटाखों और पर्यावरण के बीच संतुलन खुद बनाना होगा, ताकि त्योहार का मजा भी मिले और वातावरण भी खराब न हो। शायद यही सुप्रीम कोर्ट की मंशा भी है, तभी तो उसने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था। हालांकि हरित पंचाट ने इस फैसले ने थोड़ी और वृद्धि कर दी है। वैसे आप अधिक से अधिक पेड़ लगाकर/बचाकर भी पटाखों वाली दिवाली और पर्यावरण, दोनों बचा सकते है

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