Edited By Pardeep,Updated: 31 Aug, 2026 06:21 AM

नेपाली नागरिक बिना भारतीय नागरिकता लिए सेना में कैसे बनते हैं गोरखा? जानिए पूरा इतिहास और कानून
नेशनल डेस्क: भारतीय सेना में नेपाली गोरखा सैनिकों की सेवा का इतिहास बेहद शानदार और गौरवशाली रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नेपाली गोरखा बिना भारतीय नागरिकता लिए भी भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे सकते हैं? वर्तमान समय में जहां नेपाल बाढ़ की भीषण मार झेल रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ उसका यह खास सैन्य रिश्ता दो सदियों से भी अधिक पुराना है। नेपाली नागरिक अपनी नेपाली नागरिकता को बरकरार रखते हुए भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट में भर्ती होते आ रहे हैं।
क्या है इसका कानूनी और ऐतिहासिक आधार?
नेपाली गोरखाओं की भारतीय सेना में भर्ती का मुख्य कानूनी और ऐतिहासिक आधार भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच साल 1947 में हुआ त्रिपक्षीय समझौता है। भारत की आजादी के बाद, पूर्व ब्रिटिश भारतीय सेना की गोरखा रेजीमेंट को भारत और ब्रिटेन के बीच विभाजित कर दिया गया था। इस ऐतिहासिक समझौते में दोनों देशों की सेनाओं में नेपाली गोरखाओं की सेवा से जुड़ी तमाम शर्तें तय की गई थीं।
इस समझौते की एक सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि भारतीय सेना में सेवा देने वाले नेपाली गोरखाओं को भारतीय सैनिकों के समान ही वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवा से जुड़े अन्य सभी लाभ दिए जाएंगे। इसी विशेष व्यवस्था के कारण नेपाली नागरिकों को बिना भारतीय नागरिक बने भारत की सेना में देश सेवा का मौका मिलता है और उनकी राष्ट्रीयता पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है।
सुगौली की संधि और खुली सीमा की भूमिका
गोरखा सैन्य सेवा का यह इतिहास भारत की आजादी से भी एक सदी से ज्यादा पुराना है। साल 1816 में हुए एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद हुई 'सुगौली की संधि' ने नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंधों को एक नया मोड़ दिया था। गोरखा सैनिकों की अदम्य वीरता, लड़ने की क्षमता और उनके कड़े अनुशासन से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया, जिसे आजादी के बाद स्वतंत्र भारत ने भी निरंतर जारी रखा।
इसके अलावा, भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा का एक बेहद खास रिश्ता है। दोनों देशों के नागरिक आमतौर पर बिना किसी वीजा के एक-दूसरे के देश में आ-जा सकते हैं। इसी खुली सीमा की वजह से नेपाली नागरिकों के लिए रोजगार, शिक्षा और भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए भारत आना हमेशा से आसान रहा है। हालांकि, इस खुली सीमा का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वे स्वतः भारतीय नागरिक बन जाते हैं; वे अपनी नेपाली नागरिकता को पूरी तरह बनाए रख सकते हैं।
अग्निपथ योजना के बाद क्यों खड़ा हुआ विवाद?
साल 2022 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई 'अग्निपथ भर्ती योजना' ने इस पारंपरिक और ऐतिहासिक सैन्य भर्ती व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। इस नई स्कीम के तहत सैनिकों (अग्निवीरों) को केवल 4 साल के सीमित समय के लिए भर्ती किया जाता है। इसके बाद प्रत्येक बैच के केवल कुछ ही प्रतिशत जवानों को लंबी सेवा के लिए रखा जाता है। इसके साथ ही, 4 साल बाद सेवामुक्त होने वाले जवानों को सेना की पारंपरिक पेंशन और अन्य लाभ नहीं दिए जाते हैं।
नेपाल की आपत्ति और रुकी हुई भर्ती
नेपाल सरकार ने अग्निपथ सिस्टम के तहत अपने नागरिकों की भारतीय सेना में भर्ती पर कड़ी आपत्ति जताई है। नेपाली सरकार का तर्क है कि यह नई व्यवस्था साल 1947 के त्रिपक्षीय समझौते की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। नेपाल की मुख्य चिंता 4 साल के छोटे कार्यकाल और इसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले युवाओं के लिए पारंपरिक पेंशन न होने को लेकर है। इसी नीतिगत असहमति के कारण वर्तमान में भारतीय सेना में नए नेपाली गोरखाओं की भर्ती पूरी तरह से रुकी हुई है।