JPSC विवाद: छात्रों के भविष्य पर संकट, CBI जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

Edited By Updated: 20 Aug, 2026 07:33 PM

jpsc controversy students future in jeopardy matter reaches supreme court

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

नई दिल्ली: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सोशल एक्टिविस्ट हरिशरण देवगन की ओर से अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत ने याचिका दायर कर मामले की जांच झारखंड CID से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि छात्रों के भविष्य से जुड़े इस मामले की निष्पक्षता और जांच के परिणामों पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए राज्य मशीनरी से स्वतंत्र एजेंसी से जांच जरूरी है।

OMR शीट वायरल होने के बाद उठे गंभीर सवाल

पूरा विवाद 19 अप्रैल 2026 को आयोजित JPSC प्रारंभिक परीक्षा के बाद शुरू हुआ। 2 जुलाई को परीक्षा के नतीजे घोषित किए गए। इसके बाद एक अभ्यर्थी की OMR आंसर शीट की कार्बन कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। दावा किया गया कि अभ्यर्थी ने 100 में से केवल 48 सवालों के जवाब दिए थे, फिर भी वह परीक्षा में सफल हो गया। OMR शीट सामने आने के बाद परीक्षा के मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर अभ्यर्थियों और छात्रों के बीच सवाल उठने लगे। छात्रों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग तेज कर दी।

रांची में सड़कों पर उतरे छात्र

पूरे मामले को लेकर रांची में छात्रों का विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ। शुरुआती प्रदर्शन बापू वाटिका में हुए, जिसके बाद छात्रों ने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में भी आंदोलन किया। एक छात्र नेता ने 3 अगस्त से भूख हड़ताल शुरू कर भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच के साथ-साथ परीक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार की मांग की। लगातार बढ़ते विरोध और छात्रों के दबाव के बीच JPSC के तीन सदस्यों के इस्तीफे की बात सामने आई। इसके बाद राज्य सरकार ने 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के साथ 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जताई।

CBI जांच की मांग क्यों?

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि मामला केवल एक परीक्षा के परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के भविष्य और भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता जुड़ी हुई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अगर जांच उसी राज्य तंत्र के अधीन रहती है, जिसके स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो जांच के निष्कर्षों को लेकर छात्रों और आम लोगों के मन में संदेह बना रह सकता है।

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!