सर्दी-बुखार में भी हजारों की दवा! राजधानी के अस्पतालों में ‘कमीशन वाली पर्ची’ का खेल?

Edited By Updated: 07 May, 2026 12:43 PM

medicines cost thousands even for colds and fevers is the game of commission p

राजधानी रायपुर में इलाज के नाम पर मरीजों की जेब पर भारी बोझ डालने का मामला फिर चर्चा में है। आरोप है कि कुछ निजी ही नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी मरीजों को जरूरत से ज्यादा महंगी दवाएं लिख रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि सामान्य सर्दी,...

नेशनल डेस्क: राजधानी रायपुर में इलाज के नाम पर मरीजों की जेब पर भारी बोझ डालने का मामला फिर चर्चा में है। आरोप है कि कुछ निजी ही नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी मरीजों को जरूरत से ज्यादा महंगी दवाएं लिख रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि सामान्य सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बीमारियों में भी ब्रांडेड और महंगे इंजेक्शन व दवाएं लिखे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

ये कमीशनखोरी तो नहीं
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इसके पीछे दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच कमीशन का खेल हो सकता है। आरोप है कि कुछ खास फार्मा कंपनियों की दवाएं ज्यादा लिखने पर लाभ मिलने की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं। वहीं कई मरीजों को यह कहकर भ्रमित किया जाता है कि जेनेरिक दवाएं असरदार नहीं होतीं।
कोरोना काल के दौरान भी इसी तरह के कई मामले सामने आए थे। उस समय रेमडेसिवीर जैसे इंजेक्शन जरूरत न होने के बावजूद बड़ी संख्या में लगाए गए। कई मरीजों और उनके परिजनों से हजारों रुपये वसूले जाने की शिकायतें हुई थीं। कुछ मामलों में तीन हजार रुपये के इंजेक्शन के लिए 35 से 40 हजार रुपये तक लिए जाने के आरोप लगे थे।

सरकारी अस्पताल भी सवालों के घेरे में
पड़ताल में सामने आया कि राजधानी के बड़े सरकारी अस्पतालों में भी महंगी दवाएं लिखे जाने के मामले दर्ज हुए। एक मामले में गंभीर मरीज को लंबे समय तक भारी मात्रा में एंटीबायोटिक इंजेक्शन लिखे गए, जिस पर मेडिकल कमेटी ने सवाल उठाए। कमेटी का कहना था कि इतनी अवधि तक ऐसी दवा देना मेडिकल मानकों के खिलाफ हो सकता है। एक अन्य मामले में डेंगू मरीज के इलाज में बेहद महंगी दवाएं लिखी गईं, जिसके बाद मेडिकल बिल की जांच के दौरान मामला उजागर हुआ। जांच में कई दवाओं को गैरजरूरी बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है चिंता
महंगी दवाओं के मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत भी सख्त टिप्पणी कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) से कहा था कि डॉक्टरों द्वारा अनावश्यक महंगी दवाएं लिखे जाने की शिकायतें गंभीर हैं और इस पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

 जेनेरिक बनाम ब्रांडेड दवा की बहस
सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन लगातार सरकारी अस्पतालों में जेनेरिक दवाएं लिखने पर जोर दे रहे हैं। इसके बावजूद कई अस्पतालों में अब भी ब्रांडेड दवाओं का चलन जारी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों को सस्ती और प्रभावी दवा उपलब्ध कराना व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं
रिटायर्ड स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. सिंह का कहना है कि किस मरीज को कौनसी दवा देनी है, यह डॉक्टर तय करता है, लेकिन यदि दवा चयन में किसी प्रकार का व्यावसायिक दबाव या कमीशन शामिल है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!