Edited By Anu Malhotra,Updated: 28 Aug, 2026 09:20 AM

बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिवंगत बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत के मामले में मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिशा सालियन की मौत के मामले में मुंबई पुलिस की जांच को 'बेकार'...
नई दिल्ली: बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिवंगत बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत के मामले में मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिशा सालियन की मौत के मामले में मुंबई पुलिस की जांच को 'बेकार' बताया है और जांच में कई अनसुलझे सवालों को लेकर महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है।
गौरतलब है कि दिशा सालियन की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक रिहायशी इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद हुई थी। इसके बाद मुंबई पुलिस ने 'एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट' (ADR) दर्ज की थी। जांच के बाद पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने आत्महत्या की थी, लेकिन उनके पिता सतीश सालियन ने पिछले साल हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ गैंगरेप और हत्या की गई थी।
जस्टिस एस.वी. कोटवाल और जस्टिस आर.आर. भोसले की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए जांच में पाई गई खामियों पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 174 के तहत की गई 'एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट' (ADR) जांच की समीक्षा की। पब्लिक प्रॉसिक्यूटर शिशिर हिरे ने बताया कि 2021 में प्राथमिक रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद जनता के संदेहों को देखते हुए दिसंबर 2023 में जांच फिर शुरू की गई। इस पर बेंच ने CrPC की धारा 174 के तहत जांच दोबारा शुरू करने के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा, "आपने इसे दोबारा कैसे शुरू किया? CrPC की धारा 174 में ऐसा कहां लिखा है? इसमें कुछ अस्पष्टता है।" जजों ने कई सालों तक चली जांच की उपयोगिता और कानूनी महत्व पर भी सवाल उठाए। बेंच ने टिप्पणी की, "तो उस जांच का क्या मतलब है जो आपने छह साल तक की? यह सब बेकार है।"
कोर्ट ने कहा कि ADR जांच की अपनी सीमाएं होती हैं और ऐसी कार्यवाही के दौरान दर्ज बयानों की कानूनी अहमियत उतनी नहीं हो सकती जितनी औपचारिक आपराधिक जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों की होती है।
हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर हालात की मांग हो, तो पुलिस के पास FIR दर्ज करने और औपचारिक जांच करने का विकल्प खुला है। कोर्ट ने सवाल किया कि सही आपराधिक जांच की संभावना को पूरी तरह से क्यों खत्म किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को सालियन के पिता सही कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
बेंच ने शुरुआती मौके की जांच में कथित कमियों की ओर भी इशारा किया। कोर्ट ने गौर किया कि दिशा सालियन जहां से कथित तौर पर गिरी थीं, उस जगह का कोई सीधा CCTV फुटेज नहीं था। कोर्ट ने बंद दरवाजे के बारे में गवाहों के बयानों में विसंगतियों की भी जांच की। कोर्ट ने पाया कि जहां गवाहों ने बंद दरवाजे का ज़िक्र किया था, वहीं पंचनामा में उससे जुड़ा कोई भौतिक नुकसान दर्ज नहीं किया गया था। कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम जांच से जुड़ी चिंताओं की भी जांच की। बेंच ने कहा कि राज्य के नियमों के मुताबिक ऐसे मामलों में पोस्टमॉर्टम दो डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए, जबकि दिशा सालियन के मामले में पोस्टमॉर्टम कथित तौर पर एक डॉक्टर ने किया था।
दिशा सालियन की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, जांच उनकी मौत के तीन दिन बाद की गई थी। रिपोर्ट में उनके सिर, हाथों, पैरों और छाती पर चोटें दर्ज की गईं। इसमें कहा गया कि सिर की चोट जानलेवा थी और नाक व मुंह से खून बहने की बात भी दर्ज की गई। कार्यवाही के दौरान बताई गई रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यौन उत्पीड़न या रेप का कोई सबूत नहीं मिला।
वहीं, महाराष्ट्र सरकार की तरफ से सवाल उठाया गया कि सतीश सालियन ने अपनी बेटी की मौत के लगभग चार साल बाद कोर्ट का रुख क्यों किया और कहा कि उन्होंने शुरू में ऐसे आरोप नहीं लगाए थे। महाराष्ट्र सरकार द्वारा पिता की याचिका में 4 साल की देरी पर सवाल उठाने पर पीठ ने मानवीय रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि बेटी खोने वाले पिता की मानसिक स्थिति और सदमे को समझा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, "हमें नेताओं की परवाह नहीं है। हमारा ध्यान उनके मामले पर है। हम पूरी तरह से जांच पर ध्यान दे रहे हैं। एक पिता ने अपनी बेटी को खो दिया है।" हाई कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि उसका ध्यान याचिकाकर्ता की कानूनी जांच की मांग पर है, न कि नेताओं से जुड़े आरोपों पर।