बता, इसमें कौन सा हिंदू का खून है और कौन सा मुसलमान का? नाना पाटेकर के वे दो डायलॉग... 32 साल बाद भी गूंज रहे हैं

Edited By Updated: 08 Oct, 2026 10:37 AM

nana patekar krantiveer movie pratap narayan tilak aa gaye meri maut ka tamasha

साल 1994 में जब मेहुल कुमार के निर्देशन में बनी फिल्म 'क्रांतिवीर' पर्दे पर आई, तो यह सिर्फ दर्शकों के मनोरंजन का साधन भर नहीं थी। यह देश में पनपते धर्म-जाति के तनाव, दंगों की कड़वी सच्चाई और सामाजिक दोगलेपन पर किया गया एक सीधा और तीखा हमला थी।

मुंबई: साल 1994 में जब मेहुल कुमार के निर्देशन में बनी फिल्म 'क्रांतिवीर' पर्दे पर आई, तो यह सिर्फ दर्शकों के मनोरंजन का साधन भर नहीं थी। यह देश में पनपते धर्म-जाति के तनाव, दंगों की कड़वी सच्चाई और सामाजिक दोगलेपन पर किया गया एक सीधा और तीखा हमला थी। 

इस फिल्म में अभिनेता नाना पाटेकर द्वारा निभाया गया 'प्रताप नारायण तिलक' का किरदार किसी आम इंसान का नहीं, बल्कि एक गुस्से से भरे, टूटे हुए और जुल्म के सामने कभी न झुकने वाले आम हिंदुस्तानी की बुलंद आवाज बन गया था। तीन दशक (30 वर्ष) से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी इस क्लासिक फिल्म के दो ऐतिहासिक दृश्य आज भी भारतीय समाज की सोई हुई चेतना को जगाने का काम करते हैं।

1. फांसी के फंदे से जनता पर तंज: आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...जब समाज ही कटघरे में खड़ा हो गया
फिल्म के सबसे जबरदस्त क्लाइमैक्स में जब मुख्य किरदार प्रताप फांसी के फंदे के पास खड़ा होता है, तो उसका पहला ही संवाद पूरे माहौल को सुन्न कर देता है- "आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!" यह महज एक फिल्मी संवाद नहीं था, बल्कि तमाशा देख रही भीड़ के मुंह पर पड़ा एक जोरदार थप्पड़ था।

 प्रताप इस दृश्य के जरिए संदेश देता है कि देश को सिर्फ भ्रष्ट नेता या पेशेवर अपराधी ही बर्बाद नहीं कर रहे, बल्कि वे आम नागरिक भी उतने ही गुनहगार हैं जो हर गलत काम और अन्याय को आंखों के सामने देखकर भी चुप्पी साधे रखते हैं। फिल्म यह साफ संदेश देती है कि केवल बड़े-बड़े देशभक्ति के नारे लगा देने से कोई देशभक्त नहीं बनता, असली देशभक्ति तो हर अन्याय का विरोध करने और इंसानियत को बचाने में निहित है।

2. "हिंदू का खून, मुसलमान का खून... बताओ कौन सा?" 
फिल्म का सबसे प्रभावशाली और अमर पल वह बनता है जब प्रताप अपनी हथेली काटकर खून की दो बूंदें निकालता है और वहां मौजूद लोगों से तीखा सवाल करता है- "हिंदू का खून, मुसलमान का खून... बता इसमें से कौन सा किसका है?"

प्रताप का यह सीधा सवाल सीधे दिल पर चोट करता है, "जब ऊपर वाले ने सबकी शारीरिक बनावट और खून का रंग एक जैसा बनाया है, तो फिर मजहब के नाम पर इंसान एक-दूसरे की जान का दुश्मन क्यों बन जाता है?" 1990 के दशक में हुए मुंबई दंगों की कड़वी पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म बड़ी बेबाकी से उजागर करती है।

'क्रांतिवीर' की रिलीज को 30 साल से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन प्रताप नारायण तिलक द्वारा उठाए गए सामाजिक सवाल आज भी उतने ही प्रासंगिक और प्रामाणिक महसूस होते हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि इंसानियत का कोई अलग रंग या धर्म नहीं होता।  

Related Story

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!