'अहंकार मिटा तो कौन भोगेगा मुक्ति का आनंद?': प्रेमानंद महाराज ने समझाया जीवन का सबसे बड़ा रहस्य

Edited By Updated: 18 Feb, 2026 06:53 PM

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वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक मार्गदर्शक पूज्य श्री प्रेमानंद महाराज अपने सरल लेकिन गूढ़ प्रवचनों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनके दरबार में अक्सर भक्त ऐसी पहेलियां लेकर आते हैं, जो बड़े-बड़े विद्वानों को भी सोच में डाल दें। हाल ही...

नेशनल डेस्क: वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक मार्गदर्शक पूज्य श्री प्रेमानंद महाराज अपने सरल लेकिन गूढ़ प्रवचनों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनके दरबार में अक्सर भक्त ऐसी पहेलियां लेकर आते हैं, जो बड़े-बड़े विद्वानों को भी सोच में डाल दें। हाल ही में एक जिज्ञासु भक्त ने मोक्ष और अस्तित्व को लेकर एक ऐसा ही गहरा सवाल किया, जिसका महाराज जी ने अपनी चिरपरिचित शैली में बहुत ही सुंदर समाधान दिया।

जिज्ञासा: 'मैं' के मिटने के बाद अनुभव किसे होगा?
प्रेमानंद महाराज के सत्संग में पहुंचे एक भक्त ने एक मौलिक दुविधा सामने रखी। उसने पूछा कि अध्यात्म में कहा जाता है कि साधना का अंतिम लक्ष्य अहंकार यानी 'मैं' भाव का पूरी तरह नष्ट हो जाना है। भक्त का तर्क था कि यदि साधना करते-करते 'मैं' ही मर गया या मिट गया, तो फिर मुक्ति का सुख या अनुभव आखिर किसे होगा? क्या मुक्ति के बाद कोई अस्तित्व शेष रहता है?

महाराज जी का उत्तर: 'मैं' मरता नहीं, बल्कि शुद्ध होता है
इस सवाल पर महाराज जी ने मुस्कुराते हुए समझाया कि साधना में 'मैं' का नाश नहीं होता, बल्कि उस 'मैं' के साथ जो भ्रम और अशुद्धियां जुड़ी हैं, वे मिटती हैं। महाराज जी ने 'जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई' चौपाई का उदाहरण देते हुए कहा कि जब साधक भजन करता है, तो उसकी अविद्या, माया और देह का अभिमान (जैसे- मैं धनवान हूं, मैं बलवान हूं) नष्ट हो जाता है। यह 'अशुद्ध अहंकार' है जो दुख का कारण है।

जब साधना अपने चरम पर पहुंचती है, तो इस अशुद्ध 'मैं' के आगे से प्रकृति का संयोग हट जाता है। इसके बाद जो शेष बचता है, वह है 'शुद्ध ब्रह्म स्वरूप मैं'। महाराज जी ने स्पष्ट किया कि आत्मा कभी नष्ट नहीं होती; वह तो अविनाशी है।

 महाराज जी ने बताया कि मुक्ति का अनुभव वह 'शुद्ध चेतना' ही करती है। जब व्यक्ति का देहाभिमान यानी शरीर से जुड़ा लगाव खत्म हो जाता है, तब वह अपने असली स्वरूप—जो कि आनंदमय और ब्रह्मस्वरूप है—को पहचान लेता है। सरल शब्दों में, जब तक आप खुद को यह शरीर मान रहे हैं, तब तक आप बंधन में हैं; और जैसे ही यह भ्रम मिटा, आप स्वयं को अनंत चैतन्य के रूप में अनुभव करने लगते हैं। यही वह 'शुद्ध अस्तित्व' है जो मुक्ति के असीम सुख का अनुभव करता है।

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