मैटरनिटी लीव के बाद प्रमोशन रोकना पड़ेगा भारी, दिल्ली HC ने महिलाओं के हक में सुनाया बड़ा फैसला

Edited By Updated: 03 Sep, 2026 12:22 AM

promotion will have to be stopped after maternity leave

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला कर्मचारी को मैटरनिटी लीव लेने या गर्भावस्था के कारण नौकरी, पद, जिम्मेदारियों या प्रमोशन के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व से जुड़ी कानूनी सुरक्षा केवल वेतन और पदनाम तक सीमित...

नेशनल डेस्क : दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला कर्मचारी को मैटरनिटी लीव लेने या गर्भावस्था के कारण नौकरी, पद, जिम्मेदारियों या प्रमोशन के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व से जुड़ी कानूनी सुरक्षा केवल वेतन और पदनाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महिला की नौकरी की स्थिति, रिपोर्टिंग हायरार्की, सुपरवाइजरी जिम्मेदारियां और करियर में आगे बढ़ने के अवसर भी शामिल हैं।

जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को 10 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की। महिला का आरोप था कि अपनी प्रेग्नेंसी की जानकारी देने और मैटरनिटी लीव से वापस लौटने के बाद उसे पेशेवर नुकसान का सामना करना पड़ा।

छुट्टी से लौटने पर उसी पद पर लौटने का अधिकार

कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी लीव से वापस आने वाली महिला कर्मचारी सामान्य तौर पर उसी पद पर लौटने की हकदार है, जिस पर वह छुट्टी पर जाने से ठीक पहले काम कर रही थी। अदालत ने कहा कि मां बनने को कार्यस्थल पर किसी महिला के साथ अलग व्यवहार या उसके करियर को नुकसान पहुंचाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी महिला कर्मचारी को केवल प्रेग्नेंसी या मैटरनिटी लीव के कारण नुकसान पहुंचाया जाता है, उसे प्रोफेशनल ग्रोथ से दूर रखा जाता है, प्रमोशन नहीं दिया जाता, जिम्मेदारियां कम कर दी जाती हैं या नौकरी से जुड़े प्रतिकूल परिणाम झेलने पड़ते हैं, तो ऐसी कार्रवाई मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की भावना के खिलाफ है। साथ ही, यह मनमानी कार्रवाई और संविधान के अनुच्छेद 14 में दी गई समानता की गारंटी के भी खिलाफ हो सकती है।

सिर्फ सैलरी और पदनाम बनाए रखना पर्याप्त नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि कानून में इस्तेमाल किया गया ‘सर्विस की शर्तें’ शब्द नौकरी से जुड़ी महत्वपूर्ण परिस्थितियों को भी शामिल करता है। इसलिए किसी कर्मचारी का वेतन, पदनाम और वरिष्ठता बरकरार रखते हुए उससे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां, अधिकार या करियर में आगे बढ़ने के अवसर छीन लेना कानून की भावना को कमजोर करने जैसा होगा।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी नियोक्ता को केवल नाम और वेतन बनाए रखने की अनुमति देकर वास्तविक जिम्मेदारियां और प्रोफेशनल ग्रोथ छीनने दी जाए, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से वही हासिल कर सकता है, जिसे कानून सीधे तौर पर करने से रोकता है।

महिला ने 14 साल के अनुभव का दिया हवाला

याचिकाकर्ता के मुताबिक, उसके पास करीब 14 साल का प्रोफेशनल अनुभव था। दिसंबर 2023 में मैटरनिटी लीव पर जाने के समय वह मैनेजर, अकाउंटिंग के पद पर काम कर रही थी। जुलाई 2024 में छुट्टी से लौटने के बाद उसे बताया गया कि उसका पहले वाला काम अब उपलब्ध नहीं है। महिला का आरोप था कि इसके बाद उसे पहले की तुलना में काफी कम महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं।

वहीं, नियोक्ता ने दलील दी कि महिला के पदनाम, लेवल, वेतन और वरिष्ठता में कोई बदलाव नहीं किया गया था। कंपनी के अनुसार, उसे उसी मैनेजेरियल लेवल पर इन्वेस्टमेंट अकाउंटिंग और करेंसी रीवैल्यूएशन से जुड़े काम दिए गए थे और यह बदलाव संगठन में हुए पुनर्गठन का हिस्सा था।

केंद्र को प्रभावी मातृत्व सुरक्षा के लिए कदम उठाने का निर्देश

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट और कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020 के तहत मिलने वाली सुरक्षा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों पर भी लागू होने वाली संवैधानिक समानता की व्यापक गारंटी से जुड़ी है।

अदालत ने केंद्र सरकार से मातृत्व सुरक्षा को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए जरूरी नियम, योजनाएं या निर्देश तैयार करने पर विचार करने को कहा। इनमें मैटरनिटी लीव के बाद महिला की भूमिका और स्थिति की सुरक्षा, लैक्टेशन सपोर्ट, क्रेच की उपलब्धता और उसकी कार्यक्षमता की जानकारी, मातृत्व से जुड़ी शिकायतों के निपटारे की समयसीमा, प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से सुरक्षा और शिकायतों को प्राप्त करने तथा उन पर फैसला लेने के लिए सक्षम अधिकारियों की नियुक्ति जैसे उपाय शामिल हैं।

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