क्या सच में 7.8% की दर से बढ़ रही है भारतीय अर्थव्यवस्था? पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने उठाए सवाल

Edited By Updated: 03 Sep, 2026 12:25 AM

is the indian economy really growing at 7 8

भारत की अप्रैल-जून तिमाही में सामने आई 7.8% की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) पर अब बड़े सवाल उठने लगे हैं। देश के पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस विकास दर की सटीकता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है। उनका कहना है कि सांख्यिकीय...

नई दिल्ली: भारत की अप्रैल-जून तिमाही में सामने आई 7.8% की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) पर अब बड़े सवाल उठने लगे हैं। देश के पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस विकास दर की सटीकता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है। उनका कहना है कि सांख्यिकीय आधार (statistical base) में बदलाव और पिछले साल के जीडीपी आंकड़ों में किए गए भारी संशोधनों के कारण इस 7.8% की हेडलाइन ग्रोथ को सही आर्थिक गतिविधि का पैमाना मानना बेहद मुश्किल है।

आधार वर्ष बदलने से तुलना हुई कठिन
गर्ग के अनुसार, पिछले साल की पहली तिमाही (Q1) के वास्तविक जीडीपी आंकड़े पुरानी सीरीज के तहत जारी किए गए थे, जबकि अब नए सीरीज के आंकड़ों को तुलना का आधार (base) मानकर चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही की वृद्धि दर की गणना की जा रही है। इस आधार परिवर्तन के कारण सीधे तौर पर तुलना करना बहुत कठिन हो जाता है। उनका मानना है कि इस विश्लेषण को बेहतर ढंग से समझने के लिए जीडीपी आंकड़ों को चालू कीमतों (current prices) पर भी परखा जाना चाहिए।

नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर वास्तव में 2.5% से भी कम!
गर्ग ने वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही के चालू कीमतों (nominal GDP) पर आधारित जीडीपी आंकड़ों में किए गए बड़े बदलावों की ओर इशारा किया है। सरकार के संशोधित आंकड़े अब इस तिमाही के लिए नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ 10.3% बताते हैं। लेकिन गर्ग ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा, "अगर पिछले साल जारी किए गए चालू कीमतों के वास्तविक आंकड़ों को आधार माना जाए, तो चालू कीमतों पर नॉमिनल जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर 2.5% से भी कम बैठती है"। इस भारी अंतर के चलते वह इस बात पर संशय जता रहे हैं कि क्या 7.8% की वृद्धि दर पूरी तरह वास्तविक है।

बिना स्पष्टीकरण के जीडीपी में 12 लाख करोड़ रुपये की कटौती
पूर्व वित्त सचिव ने स्पष्ट किया कि जब नई जीडीपी सीरीज शुरू की जाती है, तो आंकड़ों में बदलाव होना स्वाभाविक है क्योंकि इसमें नए उत्पादों और कंपनियों को शामिल किया जाता है और कुछ पुरानी कंपनियों को बाहर कर दिया जाता है। हालांकि, उनकी मुख्य चिंता इस संशोधन के विशाल आकार और इसके लिए सरकार द्वारा कोई स्पष्ट कारण न दिए जाने को लेकर है।

उन्होंने बताया कि नई सीरीज में बदलाव के बाद
वर्ष 2023-24 के लिए चालू कीमतों पर जीडीपी में करीब 12 लाख करोड़ रुपये की भारी कमी कर दी गई है। इसके अलावा, आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जहां कृषि और खनन क्षेत्र में बढ़ोतरी दिखाई गई है, वहीं विनिर्माण (manufacturing) में काफी कमी आई है और खपत (consumption) में भी भारी कटौती की गई है।

इन सभी बड़े बदलावों और विरोधाभासों के कारण ही अब पुरानी और नई जीडीपी सीरीज के अंतर को गहराई से समझने की आवश्यकता है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में अप्रैल-जून तिमाही की 7.8% विकास दर, नई जीडीपी सीरीज और आंकड़ों के संशोधनों के प्रभाव को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है।

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