Edited By Ramkesh,Updated: 14 Jul, 2026 03:22 PM

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह राजा रघुवंशी की हत्या के मामले में आरोपी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत को चुनौती देने वाली मेघालय सरकार की याचिका पर 21 जुलाई को सुनवाई करेगा। सोनम पर 2025 में हनीमून के दौरान अपने पति की हत्या का आरोप है। मध्य...
नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह राजा रघुवंशी की हत्या के मामले में आरोपी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत को चुनौती देने वाली मेघालय सरकार की याचिका पर 21 जुलाई को सुनवाई करेगा। सोनम पर 2025 में हनीमून के दौरान अपने पति की हत्या का आरोप है। मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली आरोपी महिला को पिछले साल जून में अपने बिजनेसमैन पति राजा रघुवंशी की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था।
भाड़े के हत्यारे संग मिलकर कराई थी हत्या
दंपति पिछले साल 23 मई को मेघालय के सोहरा इलाके में लापता हो गया था। इसके बाद दो जून 2025 को राजा रघुवंशी का शव एक गहरी खाई में मिला। पुलिस का आरोप है कि सोनम रघुवंशी ने पैसे के लालच में भाड़े के हत्यारों के साथ मिलकर अपने पति की हत्या की साजिश रची थी। मेघालय सरकार की याचिका मंगलवार को न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आई। मेघालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से मामले की सुनवाई अपराह्न दो बजे करने का अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट में 21 जुलाई को होगी सुनवाई
हालांकि, आरोपी की ओर से पेश वकील ने आग्रह किया कि मामले की सुनवाई अगले सप्ताह की जाए। पीठ ने मामले की सुनवाई के लिए 21 जुलाई की तारीख तय की। शीर्ष अदालत ने मामले में नौ जुलाई को सुनवाई करते हुए कहा कि वह इस कानूनी सवाल को एक बड़ी पीठ को भेज सकती है कि क्या गिरफ्तारी ज्ञापन में विशेष रूप से टाइपिंग की त्रुटि के कारण गलत कानूनी धारा का उल्लेख करना, किसी की गिरफ्तारी को अमान्य करने और मामले में आरोपी को जमानत देने के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है। शीर्ष अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि वह बारीकी से जांच करेगी कि क्या गिरफ्तारी ज्ञापन में टाइपिंग की त्रुटि के आधार पर रघुवंशी को जमानत देना उच्च न्यायालय के लिए उचित था।
जमानत याचिका पर रोक लगाने से इनकार
शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ ने तीन जुलाई को उच्च न्यायालय के जमानत के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सॉलिसिटर जनरल ने नौ जुलाई को यह सवाल उठाया कि क्या गिरफ्तारी ज्ञापन में विशेष रूप से एक टाइपिंग की त्रुटि के कारण गलत वैधानिक धारा का उल्लेख मात्र, इस ''सनसनीखेज'' हत्या के मामले में गिरफ्तारी को अमान्य करने और जमानत देने के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है। उच्च न्यायालय ने रघुवंशी की जमानत को बरकरार रखते हुए कहा था कि पुलिस गिरफ्तारी के उचित लिखित आधार उपलब्ध कराने में विफल रही।
अदालत ने इस मामले में ''न्यायिक विवेक का पूर्ण अभाव'' बताते हुए कहा कि गिरफ्तारी ज्ञापन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(1) (हत्या के लिए दंड) के स्थान पर धारा 403 का उल्लेख किया गया है जबकि इस संदर्भ में ऐसी कोई धारा मौजूद नहीं है। सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी थी कि यह त्रुटि विशुद्ध रूप से लिपिकीय थी। मेघालय उच्च न्यायालय ने 29 जून को आरोपियों को जमानत देने से संबंधित अधीनस्थ अदालत के आदेश को बरकरार रखा था। उच्च न्यायालय ने राज्य द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें अधीनस्थ अदालत द्वारा 27 अप्रैल को दी गई जमानत को रद्द करने का अनुरोध किया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा था कि गिरफ्तारी के आधार तैयार करने के तरीके में ''न्यायिक विवेक का पूर्ण अभाव'' दिखता है।