सुप्रीम कोर्ट के फैसले से SKS पावर दिवालियापन विवाद पर लगी अंतिम मुहर

Edited By Updated: 02 Mar, 2026 11:40 PM

the apex court upheld sarda s bid as valid

27 फरवरी को दिए गए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के फैसले ने SKS पावर के दिवालियापन मामले में कंपनी के नियंत्रण को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर पूर्ण विराम लगा दिया। साथ ही, इस निर्णय ने पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में पूर्व प्रमोटर अनिल गुप्ता की...

नेशनल डेस्क : 27 फरवरी को दिए गए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के फैसले ने SKS पावर के दिवालियापन मामले में कंपनी के नियंत्रण को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर पूर्ण विराम लगा दिया। साथ ही, इस निर्णय ने पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में पूर्व प्रमोटर अनिल गुप्ता की भूमिका पर भी एक बार फिर ध्यान केंद्रित कर दिया।

यह मामला SKS पावर जेनरेशन (छत्तीसगढ़) लिमिटेड की कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया से जुड़ा था, जिसमें कई बिडर्ज़ (बोलीदाताओं) – टॉरेंट पावर, जिंदल पावर, वैंटेज पॉइंट प्राइवेट लिमिटेड और सरडा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड – ने अपने-अपने समाधान प्रस्ताव प्रस्तुत किए थे।

विस्तृत बोली प्रक्रिया और स्पष्टीकरण के कई चरणों के बाद कर्जदाताओं की समिति (CoC) ने सरडा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड द्वारा प्रस्तुत समाधान योजना को पूर्ण बहुमत से मंजूरी दे दी। इस निर्णय को असफल बोलीदाताओं ने चुनौती दी, लेकिन उनकी याचिका पहले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), फिर नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (NCLAT) और अंततः सुप्रीम कोर्ट में भी टिक नहीं सकी।

फैसले के केंद्र में एक सीमित कानूनी प्रश्न था, कि क्या सफल बोलीदाता को प्रक्रिया लगभग समाप्त हो जाने के बाद अपनी पेशकश में सुधार करने की अनुमति दी गई थी? सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जिसे बोली में बदलाव बताया जा रहा है, वह वस्तुतः केवल एक स्पष्टीकरण था, न कि प्रस्ताव की शर्तों में वास्तविक परिवर्तन। इसी आधार पर अदालत ने कर्जदाताओं के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसने एक बार फिर दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत स्थापित उस सिद्धांत को रेखांकित किया है कि कर्जदाताओं की समिति की व्यावसायिक समझ (commercial wisdom) में अदालतें सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करेंगी, जब तक कि कानून का स्पष्ट उल्लंघन या प्रक्रिया में कोई गंभीर अनियमितता न हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कर्जदाताओं के व्यावसायिक निर्णय से असहमति के आधार पर असफल बोलीदाता पूरी समाधान प्रक्रिया को दोबारा नहीं खुलवा सकते। 

अदालत के कानूनी निष्कर्षों से परे, SKS पावर प्रकरण के साथ कंपनी के पूर्व प्रमोटर अनिल गुप्ता को लेकर बाहरी आरोपों की छाया भी जुड़ी रही है। हालांकि ये आरोप सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान आदेश का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अलग-अलग रिपोर्टों और पूर्व में सामने आए आरोपों में यह संकेत दिया गया था कि गुप्ता ने दिवालियापन प्रक्रिया के माध्यम से वैंटेज पॉइंट की बोली का समर्थन कर अपनी प्रमुख कंपनी पर दोबारा नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की थी। 

अनिल गुप्ता का नाम अतीत में कथित वित्तीय अनियमितताओं और घोटालों से जुड़ता रहा है। उन पर वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं और निर्यात उल्लंघन, कर अनियमितताओं तथा कोयला ब्लॉक आवंटन जैसे विभिन्न मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जांच का सामना करने की बात सामने आई है। यह भी समझा जाता है कि प्रवर्तन निदेशालय की जाँच फिलहाल स्थगित है, हालाँकि इसके कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए गए हैं।

अनिल गुप्ता और उनके भाई दीपक गुप्ता से जुड़ा विवाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA-II) के दौर के कोयला ब्लॉक आवंटन मामलों तक जाता है। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने राजस्थान और मध्य प्रदेश में कोयला ब्लॉक हासिल करने के लिए कथित रूप से कुछ सार्वजनिक अधिकारियों और मंत्रियों को वित्तीय लाभ पहुँचाए। एक अलग न्यायिक घटनाक्रम में जनवरी 2026 में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत ने कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े एक मामले में दीपक गुप्ता को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। 

इन पृष्ठभूमि आरोपों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने अपने विचार को न्यायिक समीक्षा की वैधानिक सीमाओं तक ही सीमित रखा। अदालत ने एनसीएलएटी (NCLAT’s) के अक्टूबर 2024 के आदेश की पुष्टि करते हुए एसईएमएल (SEML) को SKS पावर का वैध स्वामी माना। यह निर्णय दिवालियापन तंत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश की तरह है कि यदि प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से संचालित हो और कर्जदाता कानून के दायरे में रहकर व्यावसायिक निर्णय लें, तो अदालतें सामान्यतः उसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगी। 
 

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