जयशंकर की UN को दो टूक, बोले- वैश्विक संकटों में मूकदर्शक बनकर न रहे संयुक्त राष्ट्र

Edited By Updated: 25 Oct, 2026 06:47 PM

the united nations must not remain a mute spectator to global crises

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को कहा कि आतंकवाद का इस्तेमाल ''किसी देश की नीतियों को आगे बढ़ाने के साधन'' के रूप में करना पूरी तरह अस्वीकार्य है तथा इसे कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही इसके पक्ष में कोई तर्क दिया जा सकता है।

नेशनल डेस्क : विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को कहा कि आतंकवाद का इस्तेमाल ''किसी देश की नीतियों को आगे बढ़ाने के साधन'' के रूप में करना पूरी तरह अस्वीकार्य है तथा इसे कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही इसके पक्ष में कोई तर्क दिया जा सकता है। जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद का खतरा इसलिए बना हुआ है, क्योंकि ''सभी देश इसे बिल्कुल न बर्दाश्त करने की नीति वास्तव में नहीं अपनाते हैं।'' उन्होंने यहां एक कार्यक्रम में किसी देश का नाम लिए बगैर कहा कि इतिहास में आतंकवाद से जुड़े कई सबक मिलने के बावजूद ''कुछ देश अब भी राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हैं।'' चिन्मय मिशन की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने शांति के महत्व पर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष जारी है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, ''कहीं भी युद्ध होना, हर जगह शांति के लिए खतरा है।'' उन्होंने दुनिया में हो रहे दो बड़े संघर्षों --यूक्रेन और पश्चिम एशिया -- का जिक्र करते हुए कहा कि दूर-दराज के समाजों, अर्थव्यवस्थाओं और ऐसे लोगों को, जिनका इन मामलों से बहुत कम लेना-देना है, असल में ''इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।'' विदेश मंत्री ने कहा, ''हम मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। जब हम यह कहते हैं कि बातचीत और कूटनीति ही एकमात्र समाधान है, तो भारत वैश्विक भावनाओं को ही व्यक्त कर रहा होता है।'' उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत शांति स्थापना की दिशा में प्रयास कर रहा है और इस उद्देश्य के लिए अन्य साझेदारों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।

जयशंकर ने कहा, ''आतंकवाद शांति के लिए एक और घातक खतरा है। आतंकवाद का इस्तेमाल किसी देश की नीतियों और उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के साधन के रूप में करना पूरी तरह अस्वीकार्य है। इसे कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता और न ही इसके पक्ष में कोई तर्क दिया जा सकता है। इसके बावजूद आतंकवाद जारी है, क्योंकि सभी देश इसे बिल्कुल न बर्दाश्त करने का रुख वास्तव में नहीं अपनाते। इतिहास में इतने सबक मिलने के बावजूद कुछ देश अब भी राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हैं।'' उन्होंने कहा कि इसलिए दुनिया को इस साझा खतरे के प्रति अधिक सजग होना चाहिए और सभी तरह के आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए अधिक दृढ़ संकल्प के साथ एकजुट होना चाहिए।

जयशंकर ने भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेजीडेंट समन्वयक स्टीफन प्रीसनर की मौजूदगी में अपना संबोधन दिया, जो उनके साथ मंच पर मौजूद थे। विदेश मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि प्रगति और समृद्धि, संघर्ष और हिंसा के ही दूसरे पहलू हैं और ये एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। उन्होंने आगाह किया, ''दुनिया आधी समृद्ध और आधी वंचित रहकर आगे नहीं बढ़ सकती। जटिल आपूर्ति श्रृंखला, वैश्वीकृत बाजारों और साझा संसाधनों के इस दौर में, यह स्थिति लगातार अस्थिरता को ही बढ़ावा देगी।''

जयशंकर ने कहा कि 'ग्लोबल साउथ' आज वित्त, ईंधन, भोजन और उवर्रक संकट का सामना कर रहा है तथा 'ग्लोबल नॉर्थ' को यह अवश्य समझना चाहिए कि समाधान तलाशने में यह ''समान रूप से हितधारक'' है। 'ग्लोबल साउथ' से तात्पर्य उन देशों से है जिन्हें अक्सर विकासशील, अल्प विकसित या अविकसित के रूप में जाना जाता है। ये मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में स्थित हैं। वहीं, 'ग्लोबल नॉर्थ' का इस्तेमाल दुनिया के अमीर, विकसित और औद्योगिक रूप से संपन्न देशों के लिए किया जाता है।

जयशंकर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व दिखाना चाहिए और वैश्विक संकटों के मामले में ''केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रहना'' चाहिए। उन्होंने कहा, ''संशोधित बहुपक्षवाद की आवश्यकता दिन-ब-दिन और मजबूत होती जा रही है। दुनिया के एक बड़े हिस्से को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व दिखाना चाहिए, न कि वैश्विक संकटों के दौरान केवल मूकदर्शक बनकर रहना चाहिए।''

दुनिया को नया स्वरूप देने में उभरती प्रौद्योगिकी, खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की भूमिका पर जयशंकर ने कहा कि मानव जाति अब सचमुच एक चौराहे पर खड़ी है। उन्होंने कहा, ''एआई सभी तरह के बदलावों की जननी बनने वाली है। लेकिन इतनी व्यापक और इतने बड़े परिणाम लाने वाली चीज को सिर्फ कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। यह पिछले 80 वर्ष में, दुनिया ने जो आजादी और लोकतंत्रीकरण का चलन देखा है, उसके बिल्कुल उलट होगा।'' जयशंकर ने कहा कि इसी वजह से भारत एक ''जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण'' का पुरजोर समर्थक है। 

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