Edited By Tanuja,Updated: 15 Sep, 2026 11:52 AM

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक में भारत समेत 10 देशों को संभावित 100 प्रतिशत माध्यमिक टैरिफ के दायरे में शामिल करने का संशोधन पेश किया गया है। वहीं दूसरे सांसद ने टैरिफ वाला पूरा प्रावधान हटाने की मांग की है। विधेयक अभी...
Washington: रूस के साथ भारत के मजबूत ऊर्जा और व्यापारिक रिश्तों पर अमेरिका की नई टैरिफ नीति की तलवार लटकती नजर आ रही है। रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले प्रस्तावित अमेरिकी कानून में ऐसा संशोधन पेश किया गया है, जिसमें भारत समेत 10 देशों को उन देशों की सूची में शामिल करने की मांग की गई है, जिन पर रूस के साथ कारोबार के कारण 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, यह अभी प्रस्ताव है और कानून बनने से पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इसकी प्रक्रिया पूरी होनी बाकी है। मामला ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ से जुड़ा है। अमेरिकी सीनेट ने इस विधेयक को 7 अगस्त को 86-11 के भारी बहुमत से पारित किया था। इसमें रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर कड़े प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस के तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव है। ऐसे जहाजों के नेटवर्क को रूस का ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है।
भारत को 100% टैरिफ के दायरे में लाने का प्रस्ताव
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर ने एक संशोधन पेश किया है। इसमें भारत के साथ चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज गणराज्य को कानून में स्पष्ट रूप से शामिल करने का प्रस्ताव है। अगर यह संशोधन और संबंधित प्रावधान कानून का हिस्सा बनते हैं, तो रूस से तेल कारोबार करने वाले इन देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का रास्ता साफ हो सकता है।
निशाने पर रूस का तेल कारोबार
अमेरिका का तर्क है कि रूस के कच्चे तेल से होने वाली कमाई यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को आर्थिक मदद देती है। इसी वजह से प्रस्तावित कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख तेल खरीदार देशों पर माध्यमिक टैरिफ लगाने का अधिकार देने की बात कही गई है।भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी है। यही व्यापार अमेरिका की प्रस्तावित नीति में भारत को संभावित निशाने पर लाने का प्रमुख कारण बन सकता है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी संसद में ही इस प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था का विरोध हो रहा है। डेमोक्रेटिक सांसद ग्रेगरी मीक्स ने अलग संशोधन पेश करके विधेयक की धारा 113 को पूरी तरह हटाने की मांग की है।
भारत समेत 10 देशों के नाम क्यों अहम?
यही धारा राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझेदारों पर व्यापक माध्यमिक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव करती है। मीक्स के संशोधन को तीन अन्य सांसदों का समर्थन भी मिला है। यानी अमेरिकी संसद में एक तरफ रूस के व्यापारिक साझेदारों, जिसमें भारत भी शामिल है, पर 100 प्रतिशत शुल्क का रास्ता साफ करने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ उसी टैरिफ प्रावधान को हटाने की मांग भी सामने आ गई है। सीनेट से पारित मूल विधेयक में भारत या अन्य देशों के नाम सीधे तौर पर सूचीबद्ध नहीं किए गए थे। उसमें तेल और गैस के आयात की मात्रा के आधार पर पांच सबसे बड़े आयातकों का उल्लेख किया गया था। प्रतिनिधि सभा में होयर के संशोधन से स्थिति बदल सकती है। भारत का नाम सीधे कानून में शामिल होने का अर्थ होगा कि रूस से ऊर्जा कारोबार करने वाले भारत जैसे देशों को संभावित माध्यमिक टैरिफ के दायरे में स्पष्ट रूप से लाने की कोशिश की जा रही है।
कानून बनने से पहले अभी...
सीनेट से पारित विधेयक अभी सीधे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए नहीं जा सकता। पहले इसे प्रतिनिधि सभा से पारित होना जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रतिनिधि सभा के पास मध्यावधि चुनाव से पहले इस प्रक्रिया के लिए सीमित कार्यदिवस बचे हैं। सोमवार को प्रतिनिधि सभा की रूल्स कमेटी ने विधेयक से जुड़े प्रस्तावित संशोधनों को सार्वजनिक किया। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि किन संशोधनों को सदन में आगे बढ़ाया जाता है और अंतिम विधेयक का स्वरूप क्या रहता है।
प्रतिबंधों में राष्ट्रीय सुरक्षा वाली छूट भी
ग्रेगरी मीक्स ने एक अन्य संशोधन भी पेश किया है। इसमें राष्ट्रपति को किसी विदेशी व्यक्ति पर लागू प्रतिबंधों से 90 दिनों तक छूट देने का अधिकार देने का प्रस्ताव है। यदि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हो, तो इस छूट को 90-90 दिनों की अतिरिक्त अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है। इससे संकेत मिलता है कि प्रस्तावित प्रतिबंध व्यवस्था में भी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक परिस्थितियों के आधार पर राष्ट्रपति को कुछ लचीलापन देने की कोशिश की जा रही है।
यूक्रेन के लिए 15 अरब डॉलर का प्रस्ताव
मीक्स ने यूक्रेन से जुड़ा एक और संशोधन भी पेश किया है। इसमें यूक्रेन को 15 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष कर्ज उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। इस धन का इस्तेमाल यूक्रेन को रक्षा संबंधी सामान और सेवाएं खरीदने के लिए वित्तीय सहायता देने में किया जा सकेगा। इससे साफ है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ यूक्रेन की रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में भी अमेरिकी संसद में नए प्रस्ताव सामने आ रहे हैं।