अब नहीं होंगे बूढ़े... पहली बार इंसान को दी उम्र घटाने की दवा, जानें क्या मौत को देगा मात?

Edited By Updated: 11 Jun, 2026 03:52 PM

world s first human trial aimed at halting aging begins

चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के इतिहास में एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है जिसे कल तक सिर्फ साइंस फिक्शन फिल्मों का हिस्सा माना जाता था। वैज्ञानिकों ने अब इंसानी उम्र के बढ़ते असर को रोकने और बूढ़ी हो चुकी कोशिकाओं को वापस जवान बनाने की...

Science Fiction Now Reality : चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के इतिहास में एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया गया है जिसे कल तक सिर्फ साइंस फिक्शन फिल्मों का हिस्सा माना जाता था। वैज्ञानिकों ने अब इंसानी उम्र के बढ़ते असर को रोकने और बूढ़ी हो चुकी कोशिकाओं को वापस जवान बनाने की दिशा में पहली बार इंसानों पर परीक्षण (Clinical Trial) शुरू कर दिया है। 

अमेरिका की जानी-मानी बायोटेक्नोलॉजी कंपनी Life Biosciences ने आधिकारिक घोषणा की है कि दुनिया के पहले 'पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग' ट्रायल के तहत पहले इंसानी मरीज को दवा की खुराक दे दी गई है। चिकित्सा इतिहास के इस ऐतिहासिक पड़ाव को 'ER-100' नाम के एक एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट के जरिए अंजाम दिया जा रहा है।

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जानें कैसे दिया गया पहला डोज?

इस जादुई तकनीक का प्राथमिक परीक्षण उन मरीजों पर किया जा रहा है जो ग्लूकोमा (काला मोतिया) और उम्र बढ़ने के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो चुके हैं। ट्रायल के पहले चरण में ग्लूकोमा से पीड़ित एक मरीज की केवल एक आंख में सीधे यह प्रयोगात्मक जीन थेरेपी इंजेक्ट की गई है। इस शुरुआती ट्रायल में बोस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और चार्ल्सटन जैसे बड़े शहरों से 20 से भी कम मरीजों का चयन किया गया है। डॉक्टर कई महीनों तक इन पर नजर रखेंगे ताकि इसकी सुरक्षा की पुष्टि हो सके।

मरीज की आंख में इंजेक्शन देने के बाद उन्हें कुछ हफ्तों तक एंटीबायोटिक दवाओं का एक विशेष कोर्स कराया जाता है। यह एंटीबायोटिक दवा शरीर के भीतर जाकर उन तीन इलाज करने वाले जीनों के लिए 'ऑन स्विच' का काम करती है जो कोशिकाओं को रीप्रोग्राम (युवा) करना शुरू करते हैं। इससे पहले चूहों और बंदरों पर हुए टेस्ट में इसने उनकी रोशनी सफलतापूर्वक वापस लौटा दी थी।

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इस पूरे ट्रायल की नींव हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध जेनेटिक्स वैज्ञानिक डेविड सिंक्लेयर की 'इन्फॉर्मेशन थ्योरी ऑफ एजिंग' पर टिकी है। इस सिद्धांत के मुताबिक हमारा शरीर इसलिए बूढ़ा नहीं होता कि उसकी कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं बल्कि इसलिए होता है क्योंकि समय के साथ कोशिकाएं उस बायोलॉजिकल इंस्ट्रक्शन (जैविक निर्देशों) को भूल जाती हैं जो उन्हें ठीक से काम करने में मदद करते हैं।

ER-100 थेरेपी कोशिका की मूल पहचान को बदले बिना उसके भीतर जीन एक्सप्रेशन के उसी पुराने और युवा पैटर्न को वापस एक्टिव कर देती है जो वर्षों पहले मौजूद था। इसके लिए आंख को इसलिए चुना गया क्योंकि आंख शरीर के बाकी हिस्सों से अलग और सुरक्षित होती है जिससे साइड इफेक्ट्स पर नजर रखना आसान होता है।

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शिन्या यामानाका और नोबेल पुरस्कार का कनेक्शन

'सेलुलर रीप्रोग्रामिंग' का मूल विचार यह है कि कोशिका चाहे कितनी भी बूढ़ी हो जाए उसके भीतर अपनी जवानी के दिनों का एक डीएनए रिकॉर्ड हमेशा सुरक्षित रहता है। साल 2006-2007 में जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका ने खोजा था कि चार विशेष प्रोटीनों के मिश्रण का उपयोग करके किसी भी वयस्क (बूढ़ी) कोशिका को वापस कोरी स्लेट यानी स्टेम सेल (Blank-slate Stem Cells) में बदला जा सकता है। इन प्रोटीनों को 'यामानाका फैक्टर्स' कहा जाता है। इस युगप्रवर्तक खोज के लिए शिन्या यामानाका को साल 2012 में चिकित्सा (Medicine) का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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'पार्शियल रीप्रोग्रामिंग' का रास्ता 

कोशिकाओं को पूरी तरह से रिसेट करने या उन्हें वापस स्टेम सेल बनाने में मेडिकल साइंस के सामने एक बहुत बड़ा खतरा था जब कोशिकाएं पूरी तरह अपनी पहचान खो देती हैं तो वे अनियंत्रित रूप से विभाजित होने लगती हैं जिससे शरीर में ट्यूमर या कैंसर होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।

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इसी जानलेवा समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने 'पार्शियल रीप्रोग्रामिंग' (आंशिक रीप्रोग्रामिंग) की नई तकनीक विकसित की। इसके तहत कोशिकाओं को पूरी तरह कोरी स्लेट बनाने के बजाय उनकी उम्र को केवल कुछ कदम पीछे धकेला जाता है ताकि आंख की नस की कोशिका अपनी मूल पहचान खोए बिना काम कर सके।

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इस थेरेपी को चिकित्सा जगत में हाई-रिस्क माना जा रहा है क्योंकि यदि ये रीप्रोग्रामिंग जीन शरीर में जरूरत से ज्यादा समय तक एक्टिव रह गए, तो कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं की तरह व्यवहार कर सकती हैं। यही वजह है कि पहला चरण (Phase 1 Trial) केवल इंसानी सुरक्षा और सही डोज तय करने पर केंद्रित है।

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भविष्य की उम्मीदें

यदि यह परीक्षण पूरी तरह सुरक्षित और सफल साबित होता है तो आने वाले समय में इसी तकनीक का उपयोग करके अल्जाइमर, गठिया (Arthritis) और दिल की गंभीर बीमारियों जैसी उम्र से जुड़ी तमाम लाइलाज समस्याओं को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकेगा।

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