एक छात्र के प्रश्न और पूरा तंत्र

Edited By Updated: 07 Jun, 2026 05:18 AM

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भारत की सभ्यता में परीक्षा केवल अंकों का खेल नहीं रही। हमारे यहां परीक्षा का अर्थ रहा है स्वयं को सिद्ध करना, अपनी योग्यता को समाज के समक्ष प्रमाणित करना और अपने श्रम को सम्मान दिलाना। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में परीक्षा केवल विद्यार्थी नहीं...

भारत की सभ्यता में परीक्षा केवल अंकों का खेल नहीं रही। हमारे यहां परीक्षा का अर्थ रहा है स्वयं को सिद्ध करना, अपनी योग्यता को समाज के समक्ष प्रमाणित करना और अपने श्रम को सम्मान दिलाना। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में परीक्षा केवल विद्यार्थी नहीं देता, उसके साथ पूरा परिवार परीक्षा देता है। मां अपनी नींद त्यागती है, पिता अपनी इच्छाएं स्थगित करता है और छात्र अपनी किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा पुस्तकों के बीच छोड़ आता है। किन्तु आज प्रश्न यह है कि क्या हमारी परीक्षा प्रणाली भी उतनी ही ईमानदार है जितनी मेहनत हमारे बच्चे करते हैं?

यह प्रश्न इसलिए नहीं उठ रहा कि किसी परीक्षा में कुछ त्रुटियां हुई हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि देश की दो सबसे बड़ी परीक्षा प्रणालियां सी.बी.एस.ई. और नीट लगातार विवादों में घिरी हैं। सी.बी.एस.ई. की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओ.एस.एम.) प्रणाली को लेकर उठा विवाद केवल डिजिटल मूल्यांकन की त्रुटि का नहीं है। मामला केवल किसी सॉफ्टवेयर, किसी टैंडर या किसी तकनीकी गड़बड़ी का भी नहीं है। बात यह है कि जिस देश में प्रशासनिक ढांचे पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च होते हों, जहां विशेषज्ञ समितियों, सलाहकारों, तकनीकी वैंडरों और निरीक्षण एजैंसियों का पूरा तंत्र मौजूद हो, वहां एक 17 वर्षीय छात्र ऐसी कमियों की ओर संकेत कर देता है, जिन्हें पूरा सिस्टम समय रहते पहचान नहीं पाता। यही इस पूरे विवाद का सबसे असुविधाजनक सत्य है।

भारत में लगभग 4 करोड़ विद्यार्थी हर वर्ष किसी न किसी बोर्ड, प्रवेश या प्रतियोगी परीक्षा में बैठते हैं। केवल सी.बी.एस.ई. की बोर्ड परीक्षाओं में 42 लाख से अधिक विद्यार्थी शामिल होते हैं। नीट में 22 लाख से अधिक अभ्यर्थी बैठते हैं। जे.ई.ई. मेन में 15 लाख से अधिक विद्यार्थी भाग लेते हैं। अर्थात भारत का परीक्षा तंत्र कई देशों की कुल आबादी से बड़ा है। ऐसे में परीक्षा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, वह राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का अनुबंध होती है। लेकिन जब एक छात्र सार्वजनिक रूप से यह प्रश्न पूछता है कि मूल्यांकन प्रणाली, टैंडर प्रक्रिया और तकनीकी संरचना में इतनी स्पष्ट विसंगतियां मौजूद थीं तो उन्हें पहले क्यों नहीं देखा गया, तब उसका प्रश्न केवल सी.बी.एस.ई. से नहीं, पूरे शासन-तंत्र से होता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह नहीं कि तकनीकी गड़बडिय़ां हुईं, यह कि जिन कमियों को पहचानने के लिए पूरा प्रशासनिक ढांचा मौजूद था, उन्हें उजागर करने का काम एक 17 वर्षीय छात्र को करना पड़ा। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे असहज और सबसे महत्वपूर्ण सत्य है। 

भारत में प्रशासनिक सेवा को देश का सबसे सक्षम तंत्र माना जाता है। हजारों अभ्यॢथयों में से चुनकर आने वाले अधिकारी नीति निर्माण से लेकर अरबों रुपए की परियोजनाओं तक का संचालन करते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि जिस व्यवस्था के पास विशेषज्ञ, सलाहकार, तकनीकी समितियां और निगरानी तंत्र मौजूद हों, वहां एक छात्र को ऐसी खामियां क्यों दिखाई देती हैं जो अधिकारियों को नहीं दिखतीं? उत्तर असुविधाजनक है। समस्या क्षमता की नहीं, संवेदनशीलता की है। हमारी नौकरशाही का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे उस वास्तविक दुनिया से दूर होता गया है, जिसके लिए वह बनाई गई थी। फाइलों में सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। प्रस्तुतियों में सब कुछ सफल दिखाई देता है। रिपोर्टों में सब कुछ नियंत्रित दिखाई देता है। लेकिन जमीन पर खड़ा विद्यार्थी अक्सर एक अलग वास्तविकता देख रहा होता है। यही दूरी अंतत: संकट को जन्म देती है और यह संकट है ‘सब ठीक है’ की मानसिकता का। प्रैजैंटेशन में सब ठीक है! डैशबोर्ड में सब ठीक है! लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है, यह जानने की कोशिश ही नहीं की जाती।

यही कारण है कि अक्सर चेतावनी के संकेत पहले छात्रों, शिक्षकों, पत्रकारों या आम नागरिकों को दिखाई देते हैं और बाद में अधिकारियों को। यह घटना एक प्रतिभाशाली छात्र की जीत से अधिक, एक व्यवस्था की हार की कहानी है क्योंकि परीक्षा में हुई गड़बड़ी सुधारी जा सकती है। सॉफ्टवेयर बदला जा सकता है। अधिकारियों का तबादला किया जा सकता है। नई समिति बनाई जा सकती है। लेकिन यदि छात्रों का विश्वास टूट जाए, तो उसकी भरपाई किसी प्रशासनिक आदेश से नहीं की जा सकती। जिस दिन उन्हें यह लगने लगे कि उनकी मेहनत से अधिक महत्व व्यवस्थागत कमजोरियों का है, उसी दिन संस्थाओं की नैतिक शक्ति कमजोर होने लगती है। सुधार किसी नए पोर्टल से शुरू नहीं होगा। सुधार किसी नई समिति से भी शुरू नहीं होगा। सुधार तब शुरू होगा, जब व्यवस्था यह स्वीकार करेगी कि पारदॢशता कोई कृपा नहीं, लोकतांत्रिक दायित्व है। और जब विफलताओं की जिम्मेदारी केवल सिस्टम की नहीं होगी, इसके व्यक्ति भी जवाबदेह होंगे। इस घटना से आज हम एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां छात्रों की परीक्षा के साथ, परीक्षा स्वयं व्यवस्था की भी चल रही है। दुर्भाग्य से इस बार प्रश्नपत्र व्यवस्था के सामने था और उत्तर एक छात्र ने दिया।-डॉ. नीलम महेंद्र्र 
 

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