पुलिसिंग में क्या महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं?

Edited By Updated: 19 Jun, 2026 02:37 AM

are women better than men in policing

तमिलनाडु के नवनियुक्त मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अपने राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘सिंगाप्पन’ नामक एक सर्व-महिला पुलिस इकाई का उद्घाटन किया है। यह एक ऐसा वादा था जो उन्होंने टी.वी.के. नामक अपनी नई राजनीतिक पार्टी...

तमिलनाडु के नवनियुक्त मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अपने राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘सिंगाप्पन’ नामक एक सर्व-महिला पुलिस इकाई का उद्घाटन किया है। यह एक ऐसा वादा था जो उन्होंने टी.वी.के. नामक अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने के बाद चुनाव प्रचार के दौरान किया था। ‘सिंगाप्पन’ की निगरानी सीधे मुख्यमंत्री द्वारा की जाएगी! चूंकि पुलिस सड़क पर सरकार की सबसे दिखाई देने वाली एजैंसी है और सत्ताधारी पार्टी की छवि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी पुलिस उन लोगों के साथ अपने दैनिक व्यवहार में कैसा बर्ताव करती है, जिनकी सेवा करने की उन्होंने शपथ ली है, इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री ‘गृह’ विभाग अपने पास रखना पसंद करते हैं।

विजय ने एक अधिक दृढ़ कदम उठाया है। उन्होंने सर्व-महिला इकाई का नेतृत्व करने के लिए भुवनेश्वरी नाम की एक महिला आई.पी.एस. अधिकारी को नियुक्त किया है और आदेश दिया है कि वह सीधे उन्हें रिपोर्ट करें। वह व्यवस्था व्यावहारिक या उचित हो या न हो लेकिन शुरुआत के तौर पर यह पहल आवश्यक संदेश देने के लिए बाध्य है : ‘महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा उनके और अन्य विचारशील नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और वह (विजय) यह सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि महिलाएं बिना किसी डर के सड़कों पर चल सकें।’
मेरे शहर मुंबई में, पुलिस ने एक ‘दीदी’ परियोजना विकसित की है। हर पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में महिला पुलिसकर्मियों को ‘दीदी’ के रूप में चिह्नित किया गया है, ताकि वे स्कूल प्रशासन के संपर्क में रहकर स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा की निगरानी कर सकें, जब तक कि वे अपने घर से निकलते और वापस नहीं लौटते। स्कूल बसों में जाने वाले बच्चों के साथ अक्सर छेड़छाड़ की घटनाएं होती हैं। 

सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा एक अलग समस्या है। पी.सी.जी.टी. (पब्लिक कंसर्न फॉर गवर्नैंस ट्रस्ट) के ट्रस्टी के रूप में, मैं एक अन्य एन.जी.ओ. के संपर्क में था, जो कई वर्षों से इस काम में शामिल था। हमने मिलकर काम किया और शहर में कई असुरक्षित स्थानों को चिह्नित करने और शुरुआत के तौर पर वहां रात में बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग की व्यवस्था करवाने में सफल रहे। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है। इसके सटीक कारणों को बता पाना मुश्किल है लेकिन यह निश्चित है कि हमें अपने समाज के सभी वर्गों के युवाओं को अपनी माताओं, बहनों और बेटियों का सम्मान करने और यह सम्मान सभी महिलाओं तक विस्तारित करने के महत्व के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता है।

मुख्यमंत्री विजय की मंशा नेक है। लेकिन विशेष महिला इकाई की निगरानी मुख्यमंत्री के लिए एक अतिरिक्त बोझ साबित हो सकती है। वह जल्द ही इसे समझ जाएंगे और उस समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हालांकि तमिलनाडु में ‘सिंगाप्पन’ परियोजना पर नजर रखना बहुत दिलचस्प होगा लेकिन पंजाब में महिला पुलिस अधिकारियों का अपराधियों के खिलाफ प्रमुख अभियानों का नेतृत्व करना राज्य की जनता का ध्यान आकॢषत कर रहा है। दो प्रमुख अभियानों ‘गैंगस्टरां ते वार’ और ‘ऑपरेशन प्रहार’ में राज्य के 79 महिला पुलिस अधिकारियों में से 5 महिला अधिकारी फील्ड ऑप्रेशनों का नेतृत्व कर रही हैं। फरीदकोट की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एस.एस.पी.) प्रज्ञा जैन, (अब चंडीगढ़ में ए.आई.जी. कानून-व्यवस्था) ऐसी ही एक अधिकारी हैं, जिनका मानना है कि लिंग का उस भूमिका से कोई लेना-देना नहीं, जिसे निभाने के लिए उन्हें कहा गया है।

ए.आई.जी. कहना है कि पुलिसिंग योग्यता, साहस और प्रतिबद्धता के बारे में है। मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूं। पुलिसिंग में बहुत कुछ नेतृत्व पर निर्भर करता है। यदि वह अपने सभी कनिष्ठों को लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए साथ लेकर चल सकता/सकती है, तो नेता का ङ्क्षलग, धर्म, जाति या आॢथक स्थिति पूरी तरह से अप्रासंगिक है। क्या पुलिसिंग में महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं? इसका उत्तर है नहीं। यह सब व्यक्तियों पर निर्भर करता है। मैंने बल के विभिन्न स्तरों पर उत्कृष्ट महिलाओं और पुरुषों को देखा है। मैंने दोनों लिंगों के बीच सुस्त लोगों को भी देखा है। यहां तक कि भ्रष्टाचार ने भी दोनों ङ्क्षलगों को प्रभावित किया है। बहुत कुछ पदानुक्रम में शीर्ष पर बैठे लोगों पर निर्भर करता है। पुरुष और महिलाएं दोनों उसकी ओर देखेंगे। यदि नेता अखंडता वाला व्यक्ति है और आगे बढ़कर नेतृत्व करने को तैयार है, तो वह उसकी देखभाल में सौंपे गए पुरुषों और महिलाओं के पूरे समूह का स्वरूप बदल सकता/सकती है।

पुरुषों और महिलाओं के बीच कुछ स्वाभाविक अंतर हैं जिन्हें सेवा वितरण के चरण में समायोजित किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, पुरुषों को शारीरिक रूप से अधिक मजबूत बनाया गया है। अधिक ङ्क्षहसक किस्म के लाठीचार्ज का जिम्मा केवल पुरुषों को दिया जाना चाहिए। काम पूरा करने के लिए आवश्यक अन्य अधिकांश गुण, जैसे अखंडता, निष्पक्ष खेल, पहल, प्रतिबद्धता, दोनों के लिए समान हैं। पंजाब पुलिस ने पाया कि महिलाएं अपने इलाके में अपराधियों के बारे में खुफिया जानकारी सांझा करने में महिला पुलिस अधिकारियों के प्रति अधिक खुली थीं। यह अपेक्षित है। इसी तरह, हमारी भारतीय संस्कृति में यौन उत्पीडऩ की शिकार महिलाएं शायद पुलिसकर्मियों के साथ अपनी पीड़ा का विवरण सांझा करना पसंद न करें लेकिन महिला पुलिसकर्मियों के साथ अधिक सहज होंगी। तत्काल निर्णय लेने के लिए मजबूर नेताओं को इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

मेरे समय में मुंबई की एक जुझारू भाजपा नेता जयवंतीबेन मेहता ने उस फ्रीवे को रोक दिया था, जिस पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जाने वाली थीं। मुझे सड़क खाली करने के लिए डी.सी.पी. के रूप में भेजा गया था। मैंने जयवंतीबेन के साथ बहस की लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रहीं। उन्होंने महिला पुलिस की मांग की, जो उन दिनों आज की तरह अधिक संख्या में नहीं थीं। मैंने उनसे कहा कि मेरे पास कोई महिला पुलिस नहीं है और उनसे प्रधानमंत्री को आगे बढऩे की अनुमति देने का अनुरोध किया। उनके इंकार करने पर मुझे पुरुषों को आदेश देना पड़ा कि वे महिलाओं को परेशान करने के लिए अपनी लाठियों को जमीन पर पटकें और जोर-जोर से शोर मचाएं। यह सबसे व्यवहार्य विकल्प था जो मुझे सूझा। जयवंतीबेन मेहता कई वर्षों बाद वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री बनीं। मुझे राजधानी जाने का मौका मिला तो उन्होंने मुझे दिल्ली में अपने आधिकारिक आवास पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। जाहिर है, उन्होंने मेरे खिलाफ कोई द्वेष नहीं रखा, ठीक वैसे ही जैसे मैंने उनके खिलाफ कोई द्वेष नहीं रखा। हम दोनों अपने-अपने कत्र्तव्यों का पालन कर रहे थे।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)

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