घर की बॉस महिलाएं

Edited By Updated: 08 Sep, 2026 03:30 AM

boss women of the house

हाल ही में सांख्यिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट आई। इसे यह जानने के लिए तैयार किया गया था कि घर में महिलाओं की स्थिति क्या है। इसके लिए 3 सवालों को प्रमुखता से पूछा गया-1. घर के लिए सामान खरीदने में महिलाओं की भूमिका क्या है? सामान खरीदने के लिए क्या वे...

हाल ही में सांख्यिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट आई। इसे यह जानने के लिए तैयार किया गया था कि घर में महिलाओं की स्थिति क्या है। इसके लिए 3 सवालों को प्रमुखता से पूछा गया-1. घर के लिए सामान खरीदने में महिलाओं की भूमिका क्या है? सामान खरीदने के लिए क्या वे निर्णय लेती हैं? 2. क्या वे अपने स्वास्थ्य की ठीक से देखभाल कर पाती हैं? 3. कहीं आना-जाना हो, किसी रिश्तेदार से मिलना हो, तो क्या वे स्वयं यह फैसला ले पाती हैं? इस सर्वे में देश भर की महिलाओं ने भाग लिया। 

पता चला कि देश के अनेक भागों, जैसे उत्तर प्रदेश या दिल्ली में महिलाएं निर्णयकारी या बॉस की भूमिका में हैं। दिल्ली में 91.6 और उत्तर प्रदेश में 90.5 प्रतिशत महिलाएं बॉस की भूमिका में हैं। पूरे देश में भी बड़ी संख्या में महिलाएं इस भूमिका में दिखीं। जैसे कि असम में 93.5, आंध्र प्रदेश 83.2, बिहार में 84.4, छत्तीसगढ़ 96.54, गोवा 89.26, गुजरात 94.37, हरियाणा 90.5, हिमाचल प्रदेश 93.78, झारखंड 94.56, कर्नाटक 86.2, केरल 93.58, दिल्ली 91.96, मध्य प्रदेश 91.72, महाराष्ट्र 90.7, ओडिशा 89.85, पंजाब 93.27, राजस्थान 90.6, तमिलनाडु 91.76, तेलंगाना 88.87, पश्चिम बंगाल 96.7 प्रतिशत। इस सर्वे में शत-प्रतिशत शिक्षित राज्य केरल के मुकाबले छत्तीसगढ़ की महिलाएं आगे रहीं।  जबकि आंध्र प्रदेश की महिलाएं बिहार से पीछे रहीं। सभी महिलाओं से संबंधित आंकड़ों को देखें, तो यह औसत 88.70 प्रतिशत है। 

इससे भी दिलचस्प आंकड़े सम्पत्ति को लेकर मालिकाना हक के हैं। जिस उत्तर प्रदेश को अक्सर विद्वान लोग पिछड़ा-पिछड़ा कहते हैं, वहां 51 प्रतिशत महिलाओं के पास अकेले या संयुक्त रूप से सम्पत्ति का मालिकाना हक है, जबकि दिल्ली जैसे महानगर में यह अधिकार मात्र 21.9 प्रतिशत है। इसका एक बड़ा कारण सरकारों के वे निर्णय भी हैं, जहां महिलाओं के नाम सम्पत्ति खरीदने पर स्टाम्प ड्यूटी में छूट मिलती है। महिलाओं में बढ़ती शिक्षा और आत्मनिर्भरता ने भी उनके निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि की है। 

इस रिपोर्ट में यह भी देखा गया कि गांव के मुकाबले शहरी महिलाओं को ज्यादा आजादी है। शहरी महिलाओं के पास आवागमन और बाहर निकलने के अधिक साधन मौजूद हैं। गांवों या छोटे शहरों में अब भी अकेली निकलने में शायद महिलाओं को संकोच होता हो लेकिन शहरों में ये बंधन इसलिए भी टूट गए हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम करती हैं। यूं छोटे शहरों में भी महिलाएं नौकरियां और गांवों में खेती-बाड़ी के काम करती हैं लेकिन उनका दायरा सीमित रहता है। नाते-रिश्तेदारों से मिलने के लिए बड़े शहरों की महिलाओं के पास ज्यादा अवसर हैं। 

जहां तक खरीददारी में निर्णय लेने का सवाल है, अब जरूरी नहीं कि इसके लिए बाजार तक जाया जाए। ऑनलाइन खरीददारी लगातार बढ़ रही है। इससे अपनी मनपसंद चीजें तो खरीदी ही जा सकती हैं, आने-जाने का समय और खर्चा भी बचता है। भुगतान करने के लिए भी पर्स के मुकाबले बैंक में पैसा होना जरूरी है। और ऑनलाइन भुगतान की सुविधा भी है। यानी कि तकनीक ने भी महिलाओं को यह आजादी दी है।

हालांकि घर के सामान के मामले में खरीददारी के लिए पहले महिलाएं चाहे बाजार न जाती हों,  क्योंकि उनके हाथ में पैसा नहीं रहता था लेकिन घर में क्या चाहिए, नमक खत्म हुआ या चीनी, सब्जी चाहिए या दाल, दूध की जरूरत है अथवा घी की, यह महिलाओं को पता होता था, क्योंकि रसोई भी वही संभालती थीं। फिर घर के अन्य सामान जैसे कि साबुन, क्रीम, पाऊडर, कपड़े, चादर, तौलिया फट गए, खराब हो गए, इसकी जानकारी भी उन्हें ही होती थी। इसलिए चाहे वे खरीददार न हों लेकिन सामान के लिए निर्णय लेने की भूमिका उनके ही पास थी। खाना कब किसके लिए क्या बनेगा, बच्चों को क्या खाना है, उनकी जरूरतें क्या हैं, इसका निर्णय भी आम तौर पर वही करती थीं। वार, त्यौहार, शादी-ब्याह, उत्सव में कौन घर आएगा, किसके यहां जाना है, यह भी उन्हें पता रहता था लेकिन इस बारे में आंकड़े अपलब्ध नहीं थे। अब सांख्यिकी मंत्रालय ने इन्हें उपलब्ध कराया है, तो सही तस्वीर सामने आई है।

हां, महिलाओं का स्वास्थ्य जरूर ऐसी समस्या रहा है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता था। चिकित्सा की इतनी सुविधाएं भी मौजूद नहीं थीं। लेकिन अब घर वालों और सरकारों की तरफ से भी महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाता है। आमतौर पर महिलाएं जचगी के दौरान या तो जान गंवा देती थीं, या तरह-तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से जूझती थीं। लेकिन बच्चे के स्वास्थ्य के साथ मां के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की बातें न केवल भारत में, बल्कि विश्वभर में हो रही हैं। इसके लिए तमाम सर्वे किए गए हैं। जननी सुरक्षा योजनाएं भी चलाई गई हैं। क्योंकि यदि घर की महिला स्वस्थ है, तो समझिए कि पूरा घर स्वस्थ है, क्योंकि वह घर और परिवार की महत्वपूर्ण चालक फोर्स है। फिर चाहे अखबार हों, टी.वी. चैनल्स, सोशल मीडिया हो, इसमें भी महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह से शिक्षित करने के प्रकल्प मौजूद हैं। महिलाएं शिक्षित हो रही हैं, तो अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दे रही हैं। यह न केवल परिवार, बल्कि देश के लिए भी बहुत अच्छी बात है।-क्षमा शर्मा
 

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