Edited By ,Updated: 12 Oct, 2026 03:24 AM

सर्दियां नजदीक आते ही दिल्ली एक जानी-पहचानी और डरावनी समस्या का सामना करने लगती है। हवा भारी हो जाती है, आसमान मटमैला, आंखों में जलन होने लगती है, गले में खराश और सांस लेना दूभर हो जाता है। बच्चे छींकने और खांसने लगते हैं। अस्थमा से पीड़ित बुजुर्ग...
सर्दियां नजदीक आते ही दिल्ली एक जानी-पहचानी और डरावनी समस्या का सामना करने लगती है। हवा भारी हो जाती है, आसमान मटमैला, आंखों में जलन होने लगती है, गले में खराश और सांस लेना दूभर हो जाता है। बच्चे छींकने और खांसने लगते हैं। अस्थमा से पीड़ित बुजुर्ग सांस लेने के लिए संघर्ष करते हैं। यहां तक कि स्वस्थ वयस्क भी सिरदर्द, चिड़चिड़ेपन और असामान्य थकान की शिकायत करते हैं। यह काफी खतरनाक और बहुत दुखद है। दिल्ली के लोगों के लिए सॢदयां अब उनके और उनके परिवारों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता का मौसम बन चुकी हैं। बाहर की गतिविधियां, जिनका हम पहले आनंद लिया करते थे, जैसे लोधी गार्डन या नेहरू पार्क में पिकनिक और सैर, वे अब जहर बन चुकी हैं। माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं, वरिष्ठ नागरिक अपनी सुबह की सैर के लिए बाहर निकलने में हिचकिचाते हैं और सांस की तकलीफ से जूझ रहे लोग सोचते हैं कि वे आने वाले महीने कैसे गुजारेंगे।
हर सर्दी में वही चेतावनियां जारी की जाती हैं, आपातकालीन बैठकें होती हैं, पाबंदियों की घोषणा की जाती है और नागरिकों को मास्क पहनने, घरों के अंदर रहने और एयर प्यूरीफायर खरीदने की सलाह दी जाती है। फिर, जैसे ही मौसम बदलता है, यह संकट अस्थायी रूप से जनता के ध्यान से ओझल हो जाता है। अगली सर्दी, यह कहानी फिर से शुरू हो जाती है। क्या सच में एक राजधानी अपने निवासियों को यही सबसे बेहतर दे सकती है? पर्यटक भी यहां आने से कतराते हैं, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है।
नागरिकों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे खुद को घरों में बंद कर लें, अपनी बचत को महंगे उपकरणों पर खर्च करें और सांस की बीमारियों को दिल्ली में रहने का एक सामान्य हिस्सा मानकर स्वीकार कर लें। लोग अपने स्तर पर प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं। बाहर निकलने से पहले एयर क्वालिटी इंडैक्स (ए.क्यू.आई.) देखना एक समझदारी भरी दैनिक आदत है। जब प्रदूषण का स्तर अधिक हो, तो बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा या दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को बाहर कड़ी मेहनत या व्यायाम करने से बचना चाहिए। बाहर जाना जब अपरिहार्य हो, तो एक सही फिटिंग वाला एन95 मास्क बारीक कणों के संपर्क को कम कर सकता है। घर पर, सही आकार का HEPA फिल्टर वाला एयर प्यूरीफायर किसी बंद कमरे में हवा में मौजूद कणों को कम करने में मदद कर सकता है।
परिवारों को घर में धूम्रपान करने और अगरबत्ती या अन्य सामग्रियां बेवजह जलाने से बचना चाहिए। अस्थमा से पीड़ित लोगों को अपने तय उपचार का पालन करना चाहिए और लक्षण बिगडऩे पर तुरंत डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। जब हवा की गुणवत्ता खराब हो, तो स्कूलों को खेलकूद की बाहरी गतिविधियों को अंदर स्थानांतरित कर देना चाहिए और माता-पिता के साथ स्पष्ट संवाद रखना चाहिए। हालांकि, इन सावधानियों की अपनी सीमाएं हैं। एयर प्यूरीफायर पर पैसे खर्च होते हैं, मास्क बार-बार बदलना पड़ता है और हर कोई वर्क फ्रॉम होम नहीं कर सकता। उन ट्रैफिक पुलिसकर्मियों, रेहड़ी-पटरी वालों, डिलीवरी कर्मियों, निर्माण मजदूरों और हजारों अन्य लोगों का क्या, जो अपने काम के घंटे बाहर बिताने के लिए मजबूर हैं? वे सिर्फ इसलिए कमाना बंद नहीं कर सकते क्योंकि हवा खतरनाक हो गई है। जाहिर है कि उनके स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ेगा। इसलिए, बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है। उसका काम सिर्फ यह समझाना नहीं है कि नागरिक खुद को प्रदूषण से कैसे बचाएं। उसका काम उन स्रोतों को नियंत्रित करना है, जो हवा को प्रदूषित करते हैं।
प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ सख्ती और बेहतर सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से लगाम लगाई जानी चाहिए। दिल्ली को भरोसेमंद बसों, कुशल मैट्रो कनैक्टिविटी और सुगम लास्ट-माइल कनैक्टिविटी की जरूरत है, ताकि लोगों के पास निजी वाहनों के व्यावहारिक विकल्प हों। बिना विकल्प दिए लगाई गई पाबंदियां आम यात्रियों के लिए और अधिक कठिनाई पैदा कर सकती हैं। निर्माण सामग्री को ठीक से ढककर, सड़कों की प्रभावी सफाई, धूल नियंत्रण और निर्माण स्थलों की कड़ी निगरानी के जरिए निर्माण की धूल को नियंत्रित किया जाना चाहिए। औद्योगिक उत्सर्जन के लिए नियमित निरीक्षण और उल्लेखित नियमों के उल्लंघन पर कड़े जुर्माने की आवश्यकता है। लेकिन दुख की बात है कि यहां भी बिल्डरों, पुलिस और एम.सी.डी. के बीच का भ्रष्ट गठजोड़ इन सब को नजरअंदाज कर देता है।
दिल्ली का प्रदूषण एक क्षेत्रीय समस्या भी है। सरकार को पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन.सी.आर.) में पराली जलाने, औद्योगिक प्रदूषण, परिवहन उत्सर्जन और अन्य स्रोतों से निपटने के लिए पड़ोसी राज्यों के साथ मिलकर काम करना होगा। आपातकालीन पाबंदियां कभी-कभी जरूरी हो सकती हैं लेकिन उनकी योजना सावधानी से बनाई जानी चाहिए। निर्माण कार्यों पर रोक से दिहाड़ीदार प्रभावित हो सकते हैं, जबकि अचानक लगाई गई पाबंदियां व्यवसायों और आजीविका को बाधित कर सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घोषणाओं के बाद मापने योग्य परिणाम दिखने चाहिएं। क्रियान्वयन के लिए अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
दिल्लीवासियों को हर सर्दी दिलासे के शब्दों की जरूरत नहीं है। उन्हें एक ऐसी सरकार चाहिए जो बार-बार तालमेल बिठाने के लिए कहने की बजाय प्रदूषण को रोके। सरकार मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकती लेकिन वह उत्सर्जन को नियंत्रित कर सकती है, नियमों को लागू कर सकती है, परिवहन में सुधार कर सकती है और क्षेत्रीय कार्रवाई का समन्वय कर सकती है। साफ हवा कोई ऐसी विलासिता नहीं, जिसे नागरिकों को मास्क, दवाओं और महंगे प्यूरीफायर खरीदकर पाना पड़े। यह एक बुनियादी जरूरत और सार्वजनिक जिम्मेदारी है। दिल्ली एक स्थायी समाधान की हकदार है। दिल्ली के लोगों को साल-दर-साल जहरीली हवा में जीवित रहने का तरीका सीखने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। उस हवा को सांस लेने योग्य बनाना सरकार का कत्र्तव्य है। हमें इससे मिलकर लडऩा होगा, जीवित रहना होगा और अपनी आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर पर्यावरण देने के लिए सरकार की मदद करने हेतु अपने स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना होगा।-देवी एम. चेरियन