Edited By ,Updated: 11 Nov, 2023 06:12 AM

पटाखों पर नियंत्रण के संदर्भ में कोर्ट, शासन और प्रशासन के फैसलों पर अक्सर अनेक लोग आपत्ति जताते रहते हैं। ऐसे लोग त्यौहार पर पटाखों को नियंत्रित करने के फैसले को खोखला आदर्शवाद मानते हैं। ऐसे लोगों का मानना होता है कि दीपावली पर एक-दो दिन पटाखों का...
पटाखों पर नियंत्रण के संदर्भ में कोर्ट, शासन और प्रशासन के फैसलों पर अक्सर अनेक लोग आपत्ति जताते रहते हैं। ऐसे लोग त्यौहार पर पटाखों को नियंत्रित करने के फैसले को खोखला आदर्शवाद मानते हैं। ऐसे लोगों का मानना होता है कि दीपावली पर एक-दो दिन पटाखों का इस्तेमाल करने से कौन सी बड़ी आफत आ जाएगी। ये लोग पटाखों पर नियंत्रण के प्रयासों को हिन्दू धर्म पर कुठाराघात और हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के रूप में देखते हैं।
सवाल यह है कि क्या खुशी पटाखों के द्वारा ही प्रदर्शित की जा सकती है ? दरअसल दीपावली के दौरान पटाखों के प्रदूषण से दमा और ब्रोंकाइटिस से पीड़ित मरीजों की हालत बहुत खराब हो जाती है। जो लोग दीपावली पर पटाखों को रोकने के प्रयासों पर अपना विरोध जताते हैं, उन्हें दीपावली के दौरान सांस के मरीजों की हालत देखनी चाहिए। तर्कसंगत तो यह है कि हम सभी ऐसे विषयों को समुदाय और धर्म की राजनीति में न फंसा कर सभी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर अपना व्यवहार करें। इस समय तो दिल्ली-एन.सी.आर. तथा देश के अनेक हिस्सों में खतरनाक स्तर तक प्रदूषण मौजूद है। इसलिए दीपावली के दौरान पटाखों के कारण यह और बढ़ेगा। दरअसल वायु प्रदूषण बढऩे से सांस के रोगियों की समस्या बढ़ जाती है और स्वस्थ व्यक्ति को भी सांस संबंधी बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।
इस साल दीपावली से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में पटाखा फैक्टरियों में हुई अलग-अलग दुर्घटनाओं में अनेक लोग मारे गए। ये तो प्रकाश में आईं कुछ बड़ी दुर्घटनाओं की तस्वीर भर है। इसके अलावा दीपावली से पहले पटाखा फैक्टरियों में ऐसी छुटपुट दुर्घटनाएं भी हुई होंगी जिनमें लोग मारे गए या फिर घायल हुए और वे प्रकाश में नहीं आ पाईं। हर साल दीपावली के दौरान पटाखों से घायल होने या फिर मौत होने की खबरें भी अक्सर प्रकाश में आती ही रहती हैं। इस तरह की दुर्घटनाओं से पीड़ित परिवारों के लिए दीपावली खुशी की बजाय दुख का कारण बन जाती है। यह तो तस्वीर का एक पहलू है। दूसरी तरफ दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से सांस के मरीजों एवं हृदय रोगियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है और इन लोगों के लिए दीपावली प्रकाश की जगह अंधेरे का त्यौहार बन जाता है। दरअसल कोई भी त्यौहार जहां एक ओर हमारी आस्था से जुड़ा होता है वहीं दूसरी ओर ईश्वर और प्रकृति में हमारे विश्वास को और अधिक पुष्ट भी करता है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि ईश्वर पृथ्वी, जल, वायु और प्रकृति के कण-कण में विराजमान है।
इस बदलते समय में जबकि प्रकृति का दोहन निरन्तर बढ़ता जा रहा है, प्रकृति को मात्र परम्परावादियों के भरोसे छोडऩा सबसे बड़ी बेवकूफी होगी। इसलिए अब समय आ गया है कि हम अपने और प्रकृति के अस्तित्व के लिए दीपावली मनाने के ढंग पर पुर्नविचार करें। दीपावली के दौरान होने वाले वायु प्रदूषण से वातावरण में हानिकारक गैसों एवं तत्वों की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। दीपावली के कई दिनों बाद तक भी वातावरण में इन हानिकारक गैसों एवं तत्वों का अस्तित्व बना रहता है। पटाखों के जलने पर वातावरण में सल्फर डाईआक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है।
सल्फर डाईआक्साइड की अधिकता आंखों में जलन, सिरदर्द, श्वसन संबंधी रोग, कैंसर और हृदय रोग उत्पन्न करती है। दीपावली के दौरान वातावरण में सस्पैंडिड परटिकुलेट मैटर (एस.पी.एम.) तथा रेस्पाइरेबल परटिकुलेट मैटर (आर.पी.एम.) की मात्रा बढऩे से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। एस.पी.एम. से दमा, कैंसर, फेफड़ों के रोग तथा आर.पी.एम. से श्वसन संबंधी रोग एवं हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। इस दौरान वातावरण में नाइट्रोजन डाईऑक्साइड की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। नाइट्रोजन डाईऑक्साइड की अधिकता से फेफड़ों के रोग, छाती में जकडऩ एवं विषाणु संक्रमण होने का खतरा बना रहता है। दूसरी तरफ पटाखों में कैडमियम, लैड, कापर, जिंक, आर्सेनिक, मरकरी एवं क्रोमियम जैसी अनेक जहरीली धातुएं भी पाई जाती हैं। ये सभी जहरीली धातुएं भी पर्यावरण पर बहुत बुरे प्रभाव डालती हैं। कापर श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है।
कैडमियम गुर्दों को नुकसान पहुंचाता है तो लैड तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। जिंक से उल्टी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं जबकि आर्सेनिक एवं मरकरी कैंसर जैसे रोग उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त पटाखा उद्योग में प्रयोग किया जाने वाला गन पाऊडर भी हानिकारक होता है। इस उद्योग में कार्य करने वाले बच्चों पर इसके हानिकारक प्रभाव देखे गए हैं। पटाखे छुड़ाते समय आग लगने की घटनाओं से भी जान-माल का नुकसान होता है। दीपावली के दौरान होने वाले ध्वनि प्रदूषण से जहां एक ओर मानव शरीर में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर पशु-पक्षियों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। आइए कोशिश करें कि इस बार प्रदूषण रूपी अंधेरे की दीवाली सच्चे अर्थों में प्रकाशमय बने।-रोहित कौशिक