केवल डिजिटलाइजेशन नहीं है ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनैस’

Edited By Updated: 04 Mar, 2026 05:30 AM

ease of doing business is not just about digitization

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और 2035 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य सामने है। बीते दशक में भारत ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनैस’ में उल्लेखनीय सुधार करते हुए विश्व बैंक की रैंकिंग में वर्ष 2014 के 142वें स्थान से...

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और 2035 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य सामने है। बीते दशक में भारत ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनैस’ में उल्लेखनीय सुधार करते हुए विश्व बैंक की रैंकिंग में वर्ष 2014 के 142वें स्थान से छलांग लगाकर 63वें पायदान तक पहुंच बनाई। यह सुधार केंद्र सरकार की नीतिगत इच्छा शक्ति का प्रमाण है लेकिन अभी भारत को वैश्विक निवेश के शीर्ष केंद्रों की श्रेणी में पहुंचने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। भारत के सभी राज्यों में भी कारोबारी सहजता की स्थिति समान नहीं है। 2015 से शुरू हुए केंद्र सरकार के बिजनैस रिफॉम्र्स एक्शन प्लान (बी.आर.ए.पी.) के तहत राज्यों की रैंकिंग बताती है कि कारोबार सुधार की दिशा में बड़े पैमाने पर डिजिटलाइजेशन व सिंगल विंडो सिस्टम अपनाने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश, तेलंगाना और हरियाणा के साथ पंजाब भी शामिल है लेकिन अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए जटिल व बोझिल नियमों में भी बदलाव की दरकार है। 

मुश्किलें बरकरार : पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने डिजिटलाइजेशन के माध्यम से प्रक्रियाओं को तेज और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया है। आज कंपनी रजिस्ट्रेशन, टैक्स फाइलिंग, जी.एस.टी. रिटर्न और कई लाइसैंस ऑनलाइन हो चुके हैं। इससे भ्रष्टाचार में कुछ कमी आई है और प्रक्रियाओं की पारदर्शिता बढ़ी है।
लेकिन डिजिटलाइजेशन केवल प्रक्रिया को ऑनलाइन करता है, उसे सरल नहीं बनाता। यदि नियम जटिल हैं, तो उनका डिजिटल स्वरूप भी जटिल ही रहेगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी कारोबारी को 25 अलग-अलग मंजूरियां लेनी हैं, तो ऑनलाइन पोर्टल केवल उन मंजूरियों को डिजिटल बना सकता है, उनकी संख्या और उनसे जुड़े विभागों की संख्या कम नहीं कर सकता। आज भी एक सामान्य कंपनी को 1536 कानूनों का पालन करना पड़ता है और 6000 से अधिक कंप्लायंस पूरे करने होते हैं। इनमें श्रम कानून, पर्यावरण मंजूरी, टैक्स कानून, उद्योग मानक और वित्तीय नियामकों के नियम शामिल हैं। एक छोटी फार्मा कंपनी को केवल कंप्लायंस पर हर साल 12 से 20 लाख रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जबकि एक छोटे ढाबे को भी 30 से अधिक नियमों का पालन करना पड़ता है।

वास्तविकता यह है कि लाइसैंस राज ने केवल अपना रूप बदला है। आज नियमों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका पूरी तरह से पालन करना छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए लगभग असंभव है। जब नियम अस्पष्ट और जटिल होते हैं, तो अधिकारियों के पास विवेकाधिकार बढ़ जाता है। यही विवेकाधिकार भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब प्रक्रियात्मक गलतियों को भी आपराधिक दंड बना दिया जाता है। जी.एस.टी. कानून की धारा 132 के तहत तकनीकी गलती भी 3 साल जेल की सजा जैसा आपराधिक मामला बन सकती है। 

सरकार ने इस समस्या को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ‘जन विश्वास एक्ट 2023’ लागू किया, जिसके तहत 26,000 से अधिक आपराधिक प्रावधानों में से 4623 को अपराध की श्रेणी से बाहर कर आर्थिक दंड में बदला गया। पंजाब ने 1,498 कंप्लायंस समाप्त कर सुधार की दिशा में कदम उठाया है, हरियाणा ने 17 विभागों के 42 कानूनों के 164 प्रावधानों को डिक्रिमिनलाइज करने की प्रक्रिया शुरू की है लेकिन अभी भी हजारों जटिल नियम और आपराधिक प्रावधान कारोबार की सहजता में रुकावट हैं। 

राज्यों की प्रतिस्पर्धा : ‘बिजनैस रिफॉम्र्स एक्शन प्लान’ के तहत मध्य प्रदेश, तेलंगाना और हरियाणा लगातार ‘टॉप अचीवर्स’ की श्रेणी में शामिल रहे हैं। हरियाणा ने सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, श्रम सुधार और औद्योगिक नीतियों में व्यापक बदलाव किए हैं। गुडग़ांव, फरीदाबाद और सोनीपत जैसे औद्योगिक केंद्र इस सुधारवादी दृष्टिकोण के उदाहरण हैं।  कारोबार की सहजता के लिए सबसे प्रभावी समाधान डिरैगुलेशन कमीशन हो सकता है। डिरैगुलेशन का मतलब नियमों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें ताॢकक, स्पष्ट और सीमित बनाना है। जब नियम कम और स्पष्ट होंगे, तो अफसरशाही का विवेकाधिकार कम होगा और भ्रष्टाचार के रास्ते अपने आप कम हो जाएंगे। डिरैगुलेशन कमीशन केंद्र और राज्यों के नियमों में तालमेल स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ केंद्र सरकार के सिंगल विंडो सिस्टम को और अधिक कारगर बना सकता है।  

आगे की राह : विश्व स्तर पर निवेशक सबसे पहले यह देखते हैं कि किसी देश का रैगुलेटरी सिस्टम कितना सरल और स्थिर है। सिंगापुर, वियतनाम और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने इसी आधार पर वैश्विक निवेश आकॢषत किया है। भारत को युवा आबादी, विशाल घरेलू बाजार और प्रतिभा की क्षमता का पूरा लाभ लेने के लिए रैगुलेटरी सिस्टम को और सहज करने की जरूरत है। विकसित भारत का सपना सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास से ही साकार होगा।(लेखक कैबिनेट मंत्री रैंक में पंजाब इकोनॉमिक पॉलिसी एवं प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन भी हैं)-डा. अमृत सागर मित्तल (वाइस चेयरमैन सोनालीका) 
 

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