शिक्षा बच्चों को जिंदगी के लिए तैयार करने वाली होनी चाहिए, उनका बचपन छीनने वाली नहीं

Edited By Updated: 26 Jan, 2026 04:33 AM

education should prepare children for life

यह बहुत दुखद दृश्य होता है जब आप छोटे बच्चों पर इतना ज्यादा दबाव देखते हैं। नर्सरी फॉर्म से लेकर कॉलेज कट-ऑफ तक-चिंता का लंबा सफर। यह अब पहले से कहीं ज्यादा जल्दी शुरू हो जाता है। यह एक डरावनी कहानी है जब आप युवा माता-पिता को टैंशन में देखते हैं,...

यह बहुत दुखद दृश्य होता है जब आप छोटे बच्चों पर इतना ज्यादा दबाव देखते हैं। नर्सरी फॉर्म से लेकर कॉलेज कट-ऑफ तक-चिंता का लंबा सफर। यह अब पहले से कहीं ज्यादा जल्दी शुरू हो जाता है। यह एक डरावनी कहानी है जब आप युवा माता-पिता को टैंशन में देखते हैं, बोर्ड एग्जाम या करियर चुनने के लिए नहीं, बल्कि नर्सरी एडमिशन फॉर्म के लिए। एक बच्चा जो अभी-अभी डायपर से बाहर निकला है, उससे अचानक उम्मीद की जाती है कि वह सीधा बैठे, सवालों के जवाब दे और क्लासरूम इंटरव्यू में अजनबियों को इम्प्रैस करे। माता-पिता के लिए, खासकर मांओं के लिए, यह शिक्षा प्रणाली का पहला अनुभव होता है जो न सिर्फ बच्चे का, बल्कि पूरे परिवार के धैर्य का इम्तिहान लेती है।

स्कूल एडमिशन का स्ट्रैस चुपचाप मॉडर्न पेरैंटिंग के सबसे थका देने वाले सफरों में से एक बन गया है। यह फाऊंडेशन क्लास और नर्सरी स्कूल से शुरू होता है और बिना रुके कॉलेज एडमिशन तक चलता रहता है। जो कभी एक दौर था, वह अब फॉर्म, इंटरव्यू, कोचिंग क्लास, तुलना और लगातार खुद पर शक करने की 10 साल लंबी मैराथन बन गया है। यह हर किसी को चिंतित और गुस्सा दिलाता है लेकिन फिर भी वे लाचार होते हैं। बच्चे के लिए, नर्सरी एडमिशन इंटरव्यू अक्सर डरावने की बजाय कन्फ्यूज करने वाले होते हैं। बच्चा नहीं समझ पाता कि अनजान बड़ों से भरा कमरा अचानक उससे उसका नाम, पसंदीदा रंग, या ऐसी चीजों की पहचान करने के लिए क्यों कह रहा है, जिन्हें उसने सिर्फ पिक्चर बुक में देखा है। कुछ बच्चे जम जाते हैं, कुछ रोते हैं, कुछ बोलने से मना कर देते हैं। ‘शर्मीला’, ‘आत्मविश्वास की कमी’ या ‘तैयार नहीं’ का लेबल चुपचाप लगा दिया जाता है, इससे बहुत पहले कि बच्चे को बड़ा होने का मौका मिले।

मां के लिए, यह दौर भावनात्मक रूप से बहुत मुश्किल होता है। यह एक तरह की यातना है। उसे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से बताया जाता है कि उसकी पेरैंटिंग की परीक्षा हो रही है। क्या उसने काफी कहानियां पढ़ीं? क्या उसने घर पर काफी इंगलिश बोली? क्या उसने ‘सही’ प्ले स्कूल चुना? मांएं इस अनदेखे दबाव को महसूस करती हैं कि 10 मिनट के इंट्रैक्शन में उनका बच्चा कैसा परफॉर्म करता है, इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। पिता भी चिंता करते हैं लेकिन अक्सर मां ही फॉर्म भरती है, इंटरव्यू में जाती है, स्कूलों से फॉलो-अप करती है और चुपचाप जजमैंट को सहती है।  छोटे बच्चों के लिए कोचिंग क्लास एक असहज सच्चाई बन गई है। छोटे बच्चे ‘इंटरव्यू की तैयारी’ सैशन में जाते हैं जहां उन्हें सवालों के जवाब देने और सीधे बैठने की ट्रेनिंग दी जाती है। माता-पिता जानते हैं कि यह गलत लगता है, फिर भी उन्हें होता है कि वे अकेले ऐसे न हों, जो इसमें हिस्सा न लें। यहीं से पहला दबाव शुरू होता है-मुकाबला करने का दबाव, जल्दी तैयारी करने का दबाव, पीछे न रह जाने का दबाव।

जैसे-जैसे बच्चे प्राइमरी स्कूल में जाते हैं, तनाव खत्म नहीं होता, बस अपना रूप बदल लेता है। असैसमैंट, रैंकिंग और तुलना धीरे-धीरे सामने आने लगती हैं। माता-पिता सैक्शन, टीचर और पीयर ग्रुप के बारे में चिंता करने लगते हैं। रिपोर्ट कार्ड में एक खराब टिप्पणी अचानक जरूरत से ज्यादा भारी लगने लगती है। जब तक मिडल स्कूल आता है, मुकाबला अब छिपा हुआ नहीं रहता। ओलिम्पियाड, एक्स्ट्रा क्लास, ट्यूशन और परफॉर्मैंस चार्ट रूटीन बन जाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को प्रोत्साहित करने और उन पर दबाव डालने के बीच तालमेल बिठाते हैं। इस बीच, बच्चे तारीफ को नंबरों से जोडऩे लगते हैं। आत्मविश्वास शॢतया हो जाता है। असली प्रैशर कुुकर वाला दौर बोर्ड एग्जाम और कॉलेज एडमिशन के साथ आता है। सालों का जमा हुआ तनाव चरम पर पहुंच जाता है। वही बच्चा जो कभी नर्सरी के इंटरव्यू में लडख़ड़ाता था, अब उससे उम्मीद की जाती है कि वह उन कम्पीटिटिव एग्जाम को पास करे जिनमें लाखों छात्र बैठते हैं। दाव बहुत ज्यादा ऊंचे लगते हैं। माता-पिता कट-ऑफ, फॉर्म, काऊंसलिंग की तारीखों और पैसों के बारे में चिंता करते हैं, बच्चे फेल होने, तुलना और अपने परिवार को निराश करने के बारे में।

जिस बात को शायद ही कभी माना जाता है, वह यह है कि एक चिंतित माता-पिता अनजाने में बच्चे में डर पैदा कर देते हैं। एक चिंतित बच्चा माता-पिता को और ज्यादा घबराहट देता है। दोनों एक ही चीज चाहते हैं-एक सुरक्षित, खुशहाल भविष्य-लेकिन सिस्टम उन्हें सर्वाइवल मोड में डाल देता है। और फिर भी, इस सब दबाव के बीच, माता-पिता से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे अपने बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करें। उनसे कहा जाता है, ‘तुम यह कर लोगे,’ भले ही वे खुद अनिश्चित हों। यह शायद सबसे मुश्किल भूमिका है, अनिश्चितता के बीच शांत, आशावादी और भरोसा दिलाने वाला बने रहना। बच्चों को ऐसे सिस्टम में लचीलापन सिखाना, जो सिर्फ नतीजों को ईनाम देता है। शिक्षा का सफर आदर्श रूप से सीखने और विकास के बारे में होना चाहिए। इसकी बजाय, यह अक्सर सहनशक्ति की परीक्षा बन जाता है। रिश्तेदारों, स्कूलों, समाज और सोशल मीडिया से मिलने वाले दबाव परिवारों को लगातार याद दिलाते रहते हैं कि ‘सबसे अच्छा’ क्या है। बहुत कम लोग यह पूछने के लिए रुकते हैं कि बच्चे के लिए सही क्या है।

इस प्रोसैस में सहानुभूति की बहुत जरूरत है। स्कूलों को इस बारे में फिर से सोचना चाहिए कि वे बच्चों का मूल्यांकन कितनी जल्दी शुरू करते हैं। पॉलिसी बनाने वालों को एडमिशन सिस्टम को आसान बनाना चाहिए और अच्छे संस्थानों को बढ़ाना चाहिए ताकि कम्पीटिशन क्रूर न हो जाए। माता-पिता को खुद को याद दिलाना चाहिए कि आत्मविश्वास दबाव से नहीं, बल्कि भरोसे, धैर्य और स्वीकार करने से बनता है। लेकिन अगर माता-पिता इस पूरे सफर में एक पक्का मैसेज दे सकें कि उनके बच्चे की कीमत रैंक और नतीजों से कहीं ज्यादा है, तो यह थोड़ा कम डरावना हो सकता है। एडमिशन आते-जाते रहेंगे। बच्चे जो याद रखेंगे, वह यह है कि उन्हें सपोर्ट मिला या उनका मूल्यांकन किया गया, उन्हें समझा गया या जज किया गया, उन्हें प्यार किया गया या परखा गया। आखिर में, शिक्षा को बच्चों को जिंदगी के लिए तैयार करना चाहिए, न कि उनसे उनका बचपन छीनना चाहिए।-देवी एम. चेरियन
       

IPL
Royal Challengers Bengaluru

190/9

20.0

Punjab Kings

184/7

20.0

Royal Challengers Bengaluru win by 6 runs

RR 9.50
img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!