पंजाब में आपातकाल : जब सत्ता प्रैस को खामोश करना चाहती है

Edited By Updated: 24 Jan, 2026 06:00 AM

emergency in punjab when the government wants to silence the press

लोकतंत्र रातों-रात खत्म नहीं होता। अक्सर यह धीरे-धीरे-चुप्पी, डराने-धमकाने, कानूनों के चयनात्मक प्रवर्तन और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाओं का दम घोंटने के माध्यम से नष्ट होता है। पंजाब के हालिया घटनाक्रम संवैधानिक शासन को महत्व देने वाले हर...

लोकतंत्र रातों-रात खत्म नहीं होता। अक्सर यह धीरे-धीरे-चुप्पी, डराने-धमकाने, कानूनों के चयनात्मक प्रवर्तन और सत्ता को जवाबदेह ठहराने वाली संस्थाओं का दम घोंटने के माध्यम से नष्ट होता है। पंजाब के हालिया घटनाक्रम संवैधानिक शासन को महत्व देने वाले हर नागरिक को रुकने और यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या राज्य एक मौन, अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियों का गवाह बन रहा है, जिसे उद्घोषणा के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रशासनिक जबरदस्ती के माध्यम से लागू किया गया है? वर्तमान चिंता के केंद्र में ‘पंजाब केसरी ग्रुप’ के साथ किया गया व्यवहार है, जो उत्तर भारत के सबसे सम्मानित और व्यापक रूप से प्रसारित समाचार पत्र समूहों में से एक है। मुद्दा केवल एक मीडिया हाऊस या एक परिवार के बारे में नहीं है, यह प्रैस के स्वतंत्र रूप से, डर, दबाव या राजनीतिक प्रतिशोध से मुक्त होकर काम करने के मौलिक अधिकार के बारे में है।

घटनाओं का क्रम नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 31 अक्तूबर, 2025 को, ‘पंजाब केसरी’ ने पंजाब में सत्ताधारी प्रतिष्ठान से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी के खिलाफ विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों से संबंधित एक संतुलित और तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की। वह रिपोर्ट हर लिहाज से पत्रकारिता के मानदंडों के अनुरूप थी और जिम्मेदार रिपोॄटग की सीमाओं को पार नहीं करती थी। फिर भी, उसके तुरंत बाद, 2 नवम्बर, 2025 से-‘पंजाब केसरी ग्रुप’ के सभी सरकारी विज्ञापन अचानक बंद कर दिए गए।

जनवरी, 2026 में जो हुआ उसने इन चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया। कुछ ही दिनों के भीतर, ‘पंजाब केसरी ग्रुप’ से जुड़ी संस्थाओं के खिलाफ असाधारण संख्या में कार्रवाई शुरू की गई। कई विभागों-FSSAI, GST, आबकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कारखाना विभाग और बिजली अधिकारियों-ने जालंधर, लुधियाना और बठिंडा में होटल और प्रिटिंग प्रैसों पर छापे मारे, निरीक्षण किए, नोटिस जारी किए, लाइसैंस रद्द किए, बिजली के कनैक्शन काट दिए और संचालन में बाधा डाली। ये घटनाक्रम शून्य में नहीं हो रहे हैं। इससे पहले, जालंधर के एक प्रमुख समाचार पत्र और उसके मालिक को निरंतर प्रशासनिक दबाव और उत्पीडऩ का सामना करना पड़ा था। बताया जाता है कि वह दबाव तभी कम हुआ जब समाचार पत्र को सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के साथ एक समझौते पर पहुंचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस तरह की घटनाएं मीडिया जगत को जो संदेश देती हैं वह स्पष्ट है- स्वतंत्रता प्रतिशोध को आमंत्रित करती है, समझौता अस्तित्व सुनिश्चित करता है। यह एक गहरा खतरनाक रास्ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि प्रैस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(ए) में निहित है। जो प्रैस डर के साए में काम करता है, वह प्रैस नहीं, सत्ता का प्रतिध्वनि कक्ष बन जाता है। पंजाब में हम जो देख रहे हैं वह एक वास्तविक आपातकाल जैसा दिखता है, जहां संवैधानिक अधिकारों को औपचारिक रूप से निलंबित नहीं किया गया, लेकिन कार्यकारी अतिरेक के माध्यम से प्रभावी रूप से कम कर दिया गया है। 1975 का आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक काला अध्याय बना हुआ है क्योंकि इसने दिखाया कि जब असहमति को अवज्ञा माना जाता है तो संस्थाओं को कितनी आसानी से झुकाया जा सकता है। पंजाब, अन्य सभी स्थानों की तुलना में, इस खतरे को गहराई से समझता है। राज्य ने दशकों की उथल-पुथल, आतंकवाद और आघात को सहन किया है। उन सबसे काले वर्षों के दौरान, जब सड़कों पर डर का राज था और गोलियों ने सच्चाई को खामोश करने की कोशिश की थी, पत्रकारों ने डटकर मुकाबला किया। विशेष रूप से ‘पंजाब केसरी ग्रुप’ ने एक भारी कीमत चुकाई। इसके संस्थापक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। उनके बेटे, श्री रमेश चंद्र चोपड़ा भी मारे गए। संगठन के 60 से अधिक सदस्य-कर्मचारी, एजैंट, हॉकर, रिपोर्टर-निर्भीक पत्रकारिता को न छोडऩे के कारण अपनी जान गंवा बैठे। वह विरासत केवल संस्थागत नहीं, नैतिक है। प्रशासनिक शक्ति के माध्यम से ऐसे मीडिया हाऊस को डराना केवल जबरदस्ती का कार्य नहीं, यह लोकतंत्र की रक्षा में दिए गए बलिदानों का अपमान है।

ऐसी कार्रवाइयों के समर्थक अक्सर तर्क देते हैं कि कानून से ऊपर कोई नहीं। वे सही हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कोई भी सरकार संविधान से ऊपर नहीं है। कानून को समान रूप से लागू किया जाना चाहिए, बिना प्रतिशोध के और बिना ऐसी टाइमिंग के, जो राजनीतिक प्रेरणा को उजागर करती हो। चयनात्मक प्रवर्तन सत्ता के दुरुपयोग की सटीक परिभाषा है। आज यह एक समाचार पत्र समूह हो सकता है, कल कोई अन्य संस्था, कोई अन्य आवाज, कोई अन्य आलोचक हो सकता है। इतिहास हमें सिखाता है कि सत्तावादी प्रवृत्तियां, एक बार सामान्य हो जाने के बाद, शायद ही कभी अपने मूल लक्ष्यों तक सीमित रहती हैं। इसलिए यह अनिवार्य है कि संवैधानिक अधिकारी इन घटनाक्रमों का तत्काल संज्ञान लें। नियामक संस्थाओं को राजनीतिक दिशा से अलग किया जाना चाहिए। मीडिया घरानों को प्रतिशोध के डर के बिना काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए। जवाबदेही दोनों तरफ से होनी चाहिए-सत्ता में बैठे लोगों को भी जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।

यह एक समाचार पत्र की रक्षा करने या एक सरकार का विरोध करने के बारे में नहीं है। यह एक संवैधानिक लोकतंत्र के रूप में भारत के विचार की रक्षा करने के बारे में है, जहां असहमति को दंडित नहीं किया जाता, आलोचना को अपराध नहीं माना जाता और सत्ता जांच के अधीन रहती है।प्रैस पर हमला नागरिक पर हमला है। सच्चाई पर हमला लोकतंत्र पर हमला है। पंजाब को ऐसे माहौल में फिसलने नहीं दिया जाना चाहिए, जहां बोलना चुप रहने से ज्यादा खतरनाक हो। विचार करने और सुधार करने का समय अब है। आइए इस प्रवृत्ति का विरोध करें और प्रैस की स्वतंत्रता के लिए खड़े हों।-इकबाल सिंह लालपुरा

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