पसंदीदा इकोनॉमिस्ट की सलाह मानें

Edited By Updated: 25 Jan, 2026 05:48 AM

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यह कोई रहस्य नहीं है कि प्रोफैसर अरविंद पनगढिय़ा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा अर्थशास्त्री हैं। वह दिल्ली में उनके दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक हैं। वह नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष थे (जनवरी 2015 से अगस्त 2017)। उन्होंने भारत के जी-20 शेरपा...

यह कोई रहस्य नहीं है कि प्रोफैसर अरविंद पनगढिय़ा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा अर्थशास्त्री हैं। वह दिल्ली में उनके दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक हैं। वह नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष थे (जनवरी 2015 से अगस्त 2017)। उन्होंने भारत के जी-20 शेरपा के रूप में काम किया (2015-2017)। उन्हें अप्रैल, 2023 में नालंदा विश्वविद्यालय का चांसलर और दिसम्बर, 2023 में 16वें वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वह सरकार द्वारा नियुक्त कई टास्क फोर्सेज के प्रमुख रहे। एन.डी.ए. सरकार में उनका लंबा कार्यकाल उल्लेखनीय है।

डा. पनगढिय़ा कोलंबिया विश्वविद्यालय में एक स्थायी प्रोफैसर हैं और अपने गुरु डा. जगदीश भगवती के नक्शे-कदम पर चलने वाले एक मुक्त व्यापारी हैं। मैं एक खुली अर्थव्यवस्था और मुक्त व्यापार के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता के लिए उनकी प्रशंसा करता हूं। चूंकि वह श्री मोदी के वफादार समर्थक हैं, इसलिए उनकी आलोचनाओं को चतुराई से ‘शाबाश, दिल मांगे मोर’ के रूप में छिपाया जाता है।
2025 - कोई सुधार नहीं : एक हालिया लेख में, डा. पनगढिय़ा ने सरकार की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘2025 को भारत में आॢथक सुधारों के वर्ष के रूप में इतिहास में याद किया जाएगा।’’ वह जानते हैं कि यह सच नहीं है। वर्ष 2025 में बहुत कम सुधार हुए। मीडिया और संसदीय कार्रवाई में खोजने पर पता चलेगा कि 2025 में ‘आॢथक सुधारों’ के नाम पर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं किया गया। उदाहरण के लिए-

-जी.एस.टी. दरों का सरलीकरण और उनमें कमी जुलाई 2017 में की गई मूल गलती का सुधार था;
-सीमा शुल्क का युक्तिकरण भी सीमा शुल्क में लगातार वृद्धि और संरक्षणवादी उपायों को आगे बढ़ाने के लिए एंटी-डंपिंग और सुरक्षा शुल्क के अंधाधुंध उपयोग का सुधार था;
-श्रम कानूनों का समेकन जान-बूझकर पूंजी के पक्ष में संतुलन बदलने का एक प्रयास था (जिसे पहले से ही फायदा था) और इसका भाजपा समॢथत भारतीय मजदूर संघ (बी.एम.एस.) सहित ट्रेड यूनियनों द्वारा कड़ा विरोध किया गया; और
-उच्चारण न किए जा सकने वाले वी.बी. जी-राम-जी अधिनियम का अधिनियमन, सुधार से बहुत दूर, ने दुनिया के सबसे बड़े कार्य-सह-कल्याण कार्यक्रम को नष्ट कर दिया, जिसने ग्रामीण गरीबों के बीच 8.6 करोड़ जॉब कार्ड धारकों के जीवन और आजीविका को बनाए रखा था। आदर के साथ, मैं 2025 में ऐसे किसी कदम पर उंगली नहीं रख पा रहा हूं जिसे सच में एक महत्वपूर्ण आॢथक सुधार कहा जा सके। असल में, सरकार पर हल्के से तंज कसते हुए, डा. पनगढिय़ा ने 6 ऐसे कदम बताए हैं, जो सरकार को 2026 में उठाने चाहिएं। यह एजैंडा पिछले 11 सालों में सरकार के सुधार-विरोधी रुख की आलोचना है। यह सिक्के का एक चालाक पलटवार है। ‘हैड्स’ कह कर, डा. पनगढिय़ा ने मान लिया है कि अब तक का फैसला ‘टेल्स’ था।

समझदारी भरी सलाह
आइए 6 सिफारिशों पर नजर डालते हैं :
कस्टम ड्यूटी वापस लें : चैप्टर-वाइज एक समान कस्टम ड्यूटी और ड्यूटी में कमी यू.पी.ए. सरकार ने शुरू की थी और सभी सामानों पर ट्रेड-वेटेड औसत कस्टम ड्यूटी घटाकर 6.34 प्रतिशत कर दी गई थी। यह बदलाव एन.डी.ए. सरकार के तहत हुआ और ट्रेड-वेटेड औसत कस्टम ड्यूटी बढ़कर लगभग 12 प्रतिशत हो गई। ज्यादातर मुख्यमंत्रियों की तरह, श्री मोदी गुजरात में स्वाभाविक रूप से संरक्षणवादी थे और उसी सोच को केंद्र सरकार में भी ले गए तथा उन्हें संरक्षणवादी लॉबी ने गर्मजोशी से सराहा और प्रोत्साहित किया। असल में, आत्मनिर्भरता स्वावलंबन और संरक्षणवाद का एक नया नाम था, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 3 दशकों तक व्यावहारिक रूप से बंद रखा था। डा. पनगढिय़ा ने सिफारिश की है कि सरकार आयात पर एक समान 7 प्रतिशत दर लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हो।
क्यू.सी.ओ. वापसी पूरी करें : क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर की एक सीरीज किसने शुरू की? क्यू.सी.ओज असल में आयात पर गैर-टैरिफ बाधाएं हैं। अगर यही क्वालिटी स्टैंडर्ड भारतीय उत्पादों पर लागू किए जाएं, तो कुछ ही पास हो पाएंगे। डा. पनगढिय़ा ने 2025 में 22 क्यू.सी.ओज वापस लेने के लिए सरकार की तारीफ की, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ये 22 क्यू.सी.ओज पहली बार कब घोषित किए गए थे। ये वही 22 क्यू.सी.ओज थे, जिन्हें निम्नलिखित वर्षों में नोटिफाई किया गया था : 2021 में 6, 2022 में 9, 2023 में 4, 2024 में 2, 2025 में एक।
बाकी कहानी और भी खराब है। 22 क्यू.सी.ओज वापस लेने के बाद, अनुमान है कि अभी भी लगभग 700 से ज्यादा लागू हैं!
ट्रेड डील पर साइन करें : डा. पनगढिय़ा ने ‘आयात उदारीकरण के प्रति हमारे सहज विरोध’ को स्वीकार किया। हमारा कौन है? कोई और नहीं बल्कि एन.डी.ए. सरकार। इसने दो दशकों के आयात उदारीकरण को उलट दिया, विदेश व्यापार नीति को सख्त किया, 2018 में सी.पी.टी.पी.पी. पर साइन करने के निमंत्रण को ठुकरा दिया और 2019 में आर.सी.ई.पी. से हट गया, और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के प्रति अरुचि व्यक्त की। 

डी.जी.टी.आर. पर लगाम लगाएं : दुनिया के मर्चेंडाइज ट्रेड में मामूली हिस्सेदारी (2.8 प्रतिशत) के बावजूद, भारत ने उत्पादों पर लगभग 250 एंटी-डंपिंग ड्यूटीज लगाई हैं। कस्टम, काऊंटरवेङ्क्षलग और सेफगाॄडग ड्यूटी को जोड़ दें, तो भारत में ऊंचे टैरिफ बैरियर हैं। डी.जी.टी.आर. को संरक्षणवादी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया गया था और सभी नौकरशाही अधिकारियों की तरह, उसने अपनी भूमिका का आनंद लिया। डी.जी.टी.आर. को दिए गए जनादेश को फिर से लिखना होगा।
रुपए का ज्यादा मूल्यांकन न करें : विनिमय दर एक संवेदनशील मुद्दा है। यह विदेशी मुद्रा प्रवाह, आपूॢत और मांग, मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटे आदि से प्रभावित होता है। ज्यादा मूल्य वाला रुपया निर्यात को प्रभावित करेगा, गिरते रुपए के दूसरे दर्जे के प्रभाव होते हैं। रुपए का मूल्य बाजार और आर.बी.आई. पर छोड़ देना सबसे अच्छा है, केवल अत्यधिक अस्थिरता के समय ही हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

निर्यात की निगरानी करें : बहुत ज्यादा नीतिगत बदलाव, नियम, विनियम, निर्देश, फॉर्म, अनुपालन आदि ने निर्यात में बाधा डाली है। इसका जवाब है कि हर साल के आखिर में एक बड़ी आग लगाई जाए।
डा. पनगढिय़ा का लेख इस बात का संकेत हो सकता है कि बजट 2026-27 में क्या उम्मीद की जाए या यह उनकी निराशा की अभिव्यक्ति हो सकती है। अगर सरकार उनकी सलाह मानती है, तो मैं जश्न मनाऊंगा और उनसे अगले 6 या 60 कदम बताने का आग्रह करूंगा। याद रखें, भारत को अभी बहुत आगे जाना है।-पी. चिदम्बरम

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