मुफ्त चुनावी उपहार यानी तुष्टीकरण, अर्थव्यवस्था जाए ‘भाड़’ में

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 04:06 AM

free election gifts mean appeasement the economy can go to hell

मतदाता सावधान हो जाएं। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में शीघ्र ही हाई वोल्टेज राजनीतिक तमाशा होने वाला है। अपने बटुए खोल कर रखिए क्योंकि राजनीतिक दल और नेता चुनावी उपहार बांटने की तैयारी में व्यस्त हैं, जिनके अंतर्गत लोकप्रिय योजनाओं की घोषणा...

मतदाता सावधान हो जाएं। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में शीघ्र ही हाई वोल्टेज राजनीतिक तमाशा होने वाला है। अपने बटुए खोल कर रखिए क्योंकि राजनीतिक दल और नेता चुनावी उपहार बांटने की तैयारी में व्यस्त हैं, जिनके अंतर्गत लोकप्रिय योजनाओं की घोषणा और नि:शुल्क चुनावी उपहार शामिल होंगे। वे इन राजनीतिक उपहारों को वोट प्रतिशत में बदलने की तैयारी कर रहे हैं, जहां पर सामाजिक और आॢथक उत्थान को वोट के तराजू पर तोला जाएगा क्योंकि तर्कयुक्त नीतियों की बजाय लोकप्रिय उपहार और योजनाओं से बेहतर चुनावी परिणाम प्राप्त होते हैं। 

यह बात तमिलनाडु द्वारा दायर एक मामले में देश में नि:शुल्क उपहारों की संस्कृति के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय की कठोर टिप्पणी के रूप में सामने आई, जहां पर बुधवार को तमिलनाडु ने रियायती दरों पर बिजली उपलब्ध कराने के अपने अधिकार का बचाव किया, जिस पर एक केंद्रीय कानून द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। न्यायालय ने राज्य सरकारों को फटकार लगाई कि वे धनी और निर्धन व्यक्तियों के बीच अंतर किए बिना ऐसी नि:शुल्क योजनाएं और उपहार बांट रहे हैं।  न्यायालय ने पूछा कि किस प्रकार राजस्व घाटे से जूझ रहे राज्य इस तरह के उपहारों के लिए पैसा लाते हैं। क्या ऐसी कल्याण योजनाएं लक्षित, पारदर्शी और वित्तीय दष्टि से अर्थक्षम हैं? क्या चुनावों से पहले सरकारी खजाने पर विचार किए बिना आप ऐसी तुष्टीकरण की नीतियां अपना रहे हैं? धनी वर्ग को ऐसी रियायतें क्यों? क्या यह राज्यों का कत्र्तव्य नहीं है कि वे धन को अवसंरचना के विकास पर खर्च करें? गरीबों के लिए आवश्यक सेवाएं ऐसी अविवेकपूर्ण योजनाओं से अलग हैं क्योंकि ऐसी योजनाओं का लक्ष्य केवल चुनावी लाभ होता है। क्या समय नहीं आ गया कि राज्य ऐसी नीतियों पर पुनॢवचार करें? 

क्या हमारी मेहनत की कमाई के कर के पैसों का उपयोग राजनीतिक दलों को अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए करना चाहिए? क्या नेताओं और पारर्टियों को ऐसी योजनाओं का पैसा अपनी जेब से नहीं देना चाहिए? क्या ऐसी योजनाएं सबसिडी से अलग हैं? इसका निर्णय कौन करेगा?  यह सच है कि संविधान में अनुच्छेद 38 के माध्यम से भारत को एक कल्याणकारी राज्य माना गया है जिसके अंतर्गत राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे सामाजिक, आॢथक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा दें और असमानता कम करें। अनुच्छेद 39 में यह सुनिश्चित किया गया है कि संसाधनों का समान वितरण हो और संपत्ति का केन्द्रीयकरण रोका जाए। इसलिए ये उपाय तुष्टीकरण नहीं, अपितु जरूरतमंद लोगों के लिए वास्तविक सहायता हैं। यह सच है कि सरकार नि:शुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और नकद अंतरण के माध्यम से कमजोर वर्गों की मदद करती है और उन्हें आॢथक संकट से बचाती और समावेशी विकास को बढ़ावा देती है तथा दीर्घकाल में सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देती है। क्या ऐसे देश में, जहां पर 70 प्रतिशत लोग गरीबी, असमानता और भूख से जूझ रहे हों, वहां पर ऐसी रियायतें आवश्यक नहीं हैं? क्या नागरिकों की देखभाल करना हमारे नेताओं का कत्र्तव्य नहीं है? किंतु तुष्टीकरण की दृष्टि से आप राजनीतिक शोर-शराबा और आश्वासनों को वास्तविकता समझने की भूल नहीं कर सकते। 

ये नि:शुल्क उपहार सामान्यता खपत आधारित होते हैं न कि उत्पादकता आधारित, क्योंकि इनका उद्देश्य दीर्घकालीन संपत्ति या आय सृजन क्षमता विकसित करने की बजाय तत्काल भौतिक लाभ पहुंचाना होता है। इसके अलावा ऐसे अत्यधिक नि:शुल्क उपहारों से राज्य की वित्तीय व्यवस्था पर दबाव पड़ता है और अवसंरचना और स्वास्थ्य जैसी दीर्घकालीन सुविधाओं के विकास के लिए धन की कमी होती है। ऐसी योजनाओं में लाभाॢथयों को ठीक से लक्षित न करने और अनियोजित व्यय से घाटा और लोक ऋण बढ़ता है और दीर्घकाल में ऐसे उपायों से निर्भरता बढ़ती है और सतत आर्थिक विकास की बजाय अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसी नि:शुल्क योजनाओं के कारण विकास कार्यों के लिए धन की कमी हो जाती है। 

वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस दौरान राज्यों द्वारा विभिन्न नकद अंतरण और अन्य लोकप्रिय नि:शुल्क योजनाओं पर लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इसके अलावा ऐसी योजनाओं में धनी और गरीब वर्ग के बीच अंतर नहीं किया जाता। इसलिए इन दोनों वर्गों के बीच अंतर किए बिना नि:शुल्क उपहार देना कल्याणकारी उपाय की बजाय तुष्टीकरण के समान है। यदि राज्य सबसिडी देना चाहते हैं तो उसका प्रावधान बजट में किया जाना चाहिए। 

जब कल्याणकारी उपाय प्रतिस्पर्धी लोकप्रियता में बदल जाता है, तो इससे आर्थिक स्थिरता को खतरा पैदा होता है। इस तरह की घोषाणाएं विनाश का बुलावा होती हैं क्योंकि लोकप्रिय योजनाओं का मूल्य करों की उच्च दरों या बढ़ती महंगाई के रूप में चुकाना पड़ता है। देश की जनता विकास, बेहतर शैक्षिक संस्थानों, स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं, अस्पतालों और अवसरंचना के विकास के लिए कर देती है। मतदाताओं को नि:शुल्क उपहार देकर नागरिक नेताओं पर निर्भर हो जाते हैं जिससे नागरिकों को वास्तविक अधिकार संपन्न नहीं बनाया जाता, फलत: लोग नेताओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन नहीं कर पाते। यदि ऐसी योजनाओं और उपहारों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो समग्र विकास और जनता की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर बढ़ता जाएगा।-पूनम आई. कौशिश      

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