Edited By ,Updated: 21 Apr, 2026 05:30 AM

कौमों और समाजों की असली ताकत सिर्फ धन-दौलत या ओहदों में नहीं होती, वह विरासत में होती है, वह विरासत जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों, सेवा और कुर्बानियों के रूप में आगे बढ़ती रहती है। जब हम इतिहास के पन्नों को पढ़ते हैं, तो कई बार यह महसूस होता है कि...
कौमों और समाजों की असली ताकत सिर्फ धन-दौलत या ओहदों में नहीं होती, वह विरासत में होती है, वह विरासत जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कारों, सेवा और कुर्बानियों के रूप में आगे बढ़ती रहती है। जब हम इतिहास के पन्नों को पढ़ते हैं, तो कई बार यह महसूस होता है कि बुजुर्गों द्वारा बोए गए बीजों की फसल अगली पीढिय़ां काटती हैं।
17 अप्रैल, 2026 को सुबह 1:40 बजे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रम्प द्वारा ट्रुथ सोशल पर पोस्ट डाली गई : ‘तरनजीत संधू को दिल्ली के नए लैफ्टिनैंट गवर्नर बनने पर बधाई! एक अनुभवी डिप्लोमैट और अमरीका में पूर्व राजदूत के रूप में, उन्होंने हमेशा अमरीका-भारत संबंधों को मजबूत करने के लिए गहरी प्रतिबद्धता दिखाई है। दिल्ली की प्रगति को आगे बढ़ाने और ग्लोबल सांझेदारी को और मजबूत करने में उनकी कामयाबी की कामना!’
लगभग 3-4 साल पहले यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसमें अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडेन व्हाइट हाऊस में एक भारतीय डैलिगेशन का स्वागत करते नजर आ रहे थे। वह पहले भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से हाथ मिलाते हैं, फिर विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बातचीत करते हैं। इसके बाद वह वहां खड़े अमरीका में भारत के राजदूत की ओर बढ़ते हैं।
राजदूत से हाथ मिलाते हुए राष्ट्रपति मुस्कुराते हुए कहते हैं : ‘राजदूत, आप कैसे हैं?’
फिर वह उनके व्यक्तित्व की तारीफ करते हुए कहते हैं : ‘वह बहुत ही विशिष्ट दिखते हैं... राजदूतों को ऐसा ही दिखना चाहिए।’
यह सिर्फ एक व्यक्ति की तारीफ नहीं थी। यह असल में उस सिख पहचान के लिए भी एक गर्व का पल था, जो दस्तार (पगड़ी) के रूप में दुनिया के सामने अपनी विशिष्टता दर्शाती है। एक सिख होने के नाते, जैसे दुनिया भर के सिखों ने यह दृश्य देखकर गर्व महसूस किया होगा, वैसे ही ये शब्द सुनकर मेरे दिल में भी गौरव की लहर दौड़ गई।
कुछ दिन पहले वही भारतीय राजदूत दिल्ली के लैफ्टिनैंट गवर्नर के रूप में शपथ लेते नजर आए। गहरे नीले रंग की दस्तार और स्लेटी रंग के बंद गले के सूट में, यह थे तरनजीत सिंह संधू। एक अनुभवी डिप्लोमैट, जिन्होंने 3 दशकों से अधिक समय तक भारत की विदेश सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जब हम सैंट्रल दिल्ली या अक्सर लुटियंस दिल्ली की सड़कों से गुजरते हैं, तो एक सड़क महान सिख नेता बाबा खड़क सिंह के नाम पर है। और जब हम श्री हरिमंदिर साहिब के पवित्र परिसर में प्रवेश करते हैं, तो वहां एक महत्वपूर्ण हॉल है, तेजा सिंह समुंद्री हॉल, जहां शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की अहम बैठकें होती हैं।
यहां यह जानने की जरूरत है कि इस हॉल के नाम से जुड़े महान नेता तेजा सिंह समुंद्री दरअसल तरनजीत सिंह संधू के दादा जी थे। तेजा सिंह समुंद्री सिख धार्मिक और सामाजिक सुधारों के महान योद्धा थे। वह गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक रहे और 1920 में बनी एस.जी.पी.सी. के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। उनकी जिंदगी सेवा, संघर्ष और कुर्बानी की मिसाल थी। उन्होंने ब्रिटिश इंडियन फौज में सेवा निभाई, पर बाद में अपनी जिंदगी कौम और धार्मिक सुधारों के लिए समॢपत कर दी।
अकाली आंदोलन के दौरान, चाबियों के मोर्चे (नवम्बर 1921 से जनवरी 1922) में भाग लेने के कारण ब्रिटिश सरकार ने तेजा सिंह समुंद्री को गिरफ्तार कर लिया। 13 अक्तूबर, 1923 को उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह एस.जी.पी.सी.-अकाली अभियान में शामिल थे, जिसका मकसद नाभा रियासत के महाराजा रिपुदमन सिंह को फिर से तख्त पर बहाल करवाना था।
ब्रिटिश सरकार ने एस.जी.पी.सी. और अकाली दल को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और तेजा सिंह समुंद्री सहित अन्य नेताओं को ‘साम्राज्य के खिलाफ जंग छेडऩे’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उन्हें मुकद्दमे के लिए लाहौर किले में रखा गया। दुखद घटना 17 जुलाई, 1926 को हुई, जब कैद के दौरान तेजा सिंह समुंद्री का देहांत हो गया। वह लगभग 40 साल की उम्र में ही कौम के लिए संघर्ष करते हुए सदा के लिए इतिहास का हिस्सा बन गए।
उनकी विरासत उनके पुत्र बिशन सिंह तक पहुंची, जो गुरु नानक देव यूनिवॢसटी के संस्थापक उप-कुलपति और खालसा कॉलेज अमृतसर के पिं्रसीपल रहे। शिक्षा और ज्ञान की यह लौ अगली पीढ़ी तक जलती रही। आज यही विरासत तरनजीत सिंह संधू के रूप में एक नए अध्याय को जन्म देती है।
लैफ्टिनैंट गवर्नर के रूप में शपथ लेने के बाद संधू ने एक्स (ट्विटर) पर अपने संदेश में लिखा :
‘दिल्ली के लैफ्टिनैंट गवर्नर के रूप में देश की सेवा करने की जिम्मेदारी सौंपे जाने पर मैं खुद को विनम्र महसूस करता हूं। अपने दादा जी सरदार तेजा सिंह समुंद्री को याद किया और रकाबगंज मोर्चे की कामयाबी में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को नमन किया।’
यह पल सिर्फ एक ओहदे की प्राप्ति नहीं थी, यह पीढिय़ों की विरासत को नमन करने का पल था।
किसी लेखक ने बिल्कुल ठीक लिखा है :
‘सबसे बड़ी विरासत जो कोई मनुष्य अपने बच्चों और पोते-पोतियों के लिए छोड़ सकता है, वह पैसा या जिंदगी में इकटठी की गई अन्य भौतिक चीजें नहीं होतीं, बल्कि अच्छे चरित्र और विश्वास की विरासत होती है।’ समुंद्री परिवार की कहानी इस बात को सच साबित करती है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि ओहदे बदलते रहते हैं, समय भी बदलता रहता है, पर संस्कार और सेवा की विरासत कभी नहीं मरती। और शायद इसीलिए आज भी पंजाबी कहावत सच लगती है :
‘कदे दादे दिआं, कदे पोते दिआं।’
बड़े-बुजुर्ग अपने अनुभव से परिवार और समाज को सही दिशा देते हैं, जबकि नई पीढ़ी नए विचारों और उत्साह के साथ प्रगति लाती है। यह कहावत हमें सिखाती है कि जब बड़ों का अनुभव और छोटों की सोच इक_ी हो, तो समाज और मजबूत बनता है। इस तरह हर पीढ़ी की अपनी महत्ता होती है और सब मिलकर आगे बढ़ते हैं।-हरजोत सिंह सिद्धू