Edited By ,Updated: 02 Nov, 2026 05:11 AM

राजधानी चंडीगढ़ से सटे हरियाणा के नगर पंचकूला के एक राजकीय विद्यालय में हाल ही में हुई वीभत्स घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है, जिसमें स्कूल के एक कमरे में करीब 8 वर्षीय एक नन्हे छात्र द्वारा करीब 6 वर्षीया नन्ही छात्रा को बेरहमी से पीटा गया।...
राजधानी चंडीगढ़ से सटे हरियाणा के नगर पंचकूला के एक राजकीय विद्यालय में हाल ही में हुई वीभत्स घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है, जिसमें स्कूल के एक कमरे में करीब 8 वर्षीय एक नन्हे छात्र द्वारा करीब 6 वर्षीया नन्ही छात्रा को बेरहमी से पीटा गया। इस घटना की वायरल हुई वीडियो को देखना भी आसान नहीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तीसरी कक्षा में पढऩे वाले एक 8 वर्षीय छात्र ने के.जी. की 6 वर्षीया छात्रा पर स्कूल परिसर में हमला कर दिया। बच्ची को गंभीर चोटें आईं और उसे इलाज के लिए पी.जी.आई. चंडीगढ़ ले जाना पड़ा।
यहां सवाल सिर्फ एक बच्चे की ङ्क्षहसा का नहीं, हमारी शिक्षा और संस्कार व्यवस्था का भी है। इस घटना ने अभिभावकों, स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों और समाज को कठघरे में खड़ा किया है। आखिर स्कूलों में बच्चे कितने सुरक्षित हैं? स्कूल को बच्चे का दूसरा घर कहा जाता है। माता-पिता अपने जिगर के टुकड़ों को इस विश्वास के साथ स्कूल भेजते हैं कि वहां वे सुरक्षित रहेंगे, शिक्षा प्राप्त करेंगे और अच्छे संस्कार सीखेंगे। लेकिन सामने आई इस घटना ने इस विश्वास को गहरा झटका दिया है। वर्तमान में तो यह भी कहा जा सकता है कि होम स्कूङ्क्षलग ही अच्छी।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि स्कूल परिसर में इतनी छोटी बच्ची के साथ यह सब कैसे हो गया? क्या उस समय संबंधित कक्षा और गलियारों में शिक्षकों की निगरानी नहीं थी? सी.सी.टी.वी. कैमरे लगे होने के बावजूद घटना समय रहते सामने क्यों नहीं आई? स्कूल में केवल सी.सी.टी.वी. कैमरे लगा देना पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित निरीक्षण, पर्याप्त स्टाफ और बच्चों की गतिविधियों पर सतत् निगरानी भी जरूरी है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह भी है कि आज के वक्त स्कूलों में शिक्षकों पर पढ़ाई के अलावा भी कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, जो समय-समय पर शिक्षकों की बगैर इच्छा के ही उन्हें दे दी जाती हैं। शिक्षकों से गैर-शिक्षण कार्य लिए जा रहे हैं और इसके चलते खासतौर पर राजकीय विद्यालयों में कई बार एक शिक्षक को अपनी कक्षा के साथ अन्य कक्षाओं के बच्चों को भी संभालना पड़ता है। ऐसे में कई तरह की लापरवाहियां न चाहते हुए भी होती हैं। सरकारी स्कूलों में तो कई जगह पूरा स्टाफ ही नहीं है। मुद्दा तब बनता है जब कोई बड़ी घटना होती है। इस स्कूल की घटना को लेकर सभी पहलुओं को जांचना होगा और निष्कर्ष पर अमल करना होगा, ताकि ऐसी घटनाएं फिर न हों। इस घटना में एक और गंभीर पहलू है। जिस बच्चे पर हमले का आरोप है, उसकी उम्र भी महज 8 वर्ष बताई जा रही है, जो खेलकूद, सीखने और अच्छे संस्कार ग्रहण करने की होती है।
हमें यह भी समझना होगा कि इतनी कम उम्र में किसी बच्चे के व्यवहार में इतनी आक्रामकता किन परिस्थितियों में पैदा हुई। क्या आसपास का वातावरण, पारिवारिक परिस्थितियां, ङ्क्षहसक दृश्य, डिजिटल सामग्री अथवा भावनात्मक समस्याएं इसके पीछे हो सकती हैं? इन सभी संभावनाओं की विशेषज्ञों द्वारा जांच होनी चाहिए। आरोपी बच्चा भी एक नाबालिग है। उसके साथ केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और व्यवहार संबंधी दृष्टिकोण से भी काम लेना जरूरी है। बच्चों का पहला विद्यालय उनका घर होता है। माता-पिता को यह देखना होगा कि बच्चे क्या देख रहे हैं, किस प्रकार की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं और दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार करते हैं। बच्चों को बचपन से ही सहानुभूति, संयम, सम्मान और अहिंसा का पाठ पढ़ाना होगा। हरियाणा सरकार और शिक्षा विभाग को इस मामले की निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार शिक्षा विभाग ने जांच समिति गठित की है और हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया है। बच्चों के मामलों में उनकी समझ और परिपक्वता का आकलन महत्वपूर्ण होता है।
पंचकूला की यह घटना किसी एक स्कूल, एक परिवार या दो बच्चों तक सीमित नहीं है, यह हमारी पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है। सरकार को स्कूलों में सुरक्षा के स्पष्ट नियम बनाने होंगे। प्रत्येक बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पर्याप्त शिक्षक होने चाहिएं। छोटे बच्चों को कभी भी बिना निगरानी के नहीं छोड़ा जाना चाहिए। साथ ही स्कूलों में नियमित काऊंसलिंग और बाल मनोवैज्ञानिकों की सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए।अब समय केवल अफसोस जताने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने और व्यवस्था सुधारने का है, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा कोई सुविधा नहीं, हमारा नैतिक और सामाजिक दायित्व है।-संजय भुटानी