Edited By ,Updated: 18 Oct, 2026 05:31 AM

भारतीय न्यायिक व्यवस्था बेहिसाब खर्चीली, बेहद पेचीदा, आधुनिक प्रगतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक युग में देशवासियों का अनावश्यक कीमती समय बर्बाद करने वाली, शरीर को पूरी तरह थका देने वाली और मानसिक बेचैनी और परेशानियों से संतुलन बिगाडऩे वाली तथा विकसित...
भारतीय न्यायिक व्यवस्था बेहिसाब खर्चीली, बेहद पेचीदा, आधुनिक प्रगतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक युग में देशवासियों का अनावश्यक कीमती समय बर्बाद करने वाली, शरीर को पूरी तरह थका देने वाली और मानसिक बेचैनी और परेशानियों से संतुलन बिगाडऩे वाली तथा विकसित समाज के रास्ते में एक बड़ी रुकावट है। यह बेदर्दाना नवाबी नजरिया फरियादियों के लिए निहायत निराशाजनक, अफसोसनाक और हैरतअंगेज ही नहीं, बल्कि समूचे समाज के लिए अविश्वसनीय, अकथनीय और अत्यधिक परेशानियों का सबब बना हुआ है, जो समूची व्यवस्था के लिए तौर-तरीकों पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। तारीख पर तारीख की संस्कृति न्याय के इच्छुक लोगों के जज्बातों को भी मजरूह करती है।
स्वतंत्रता के पश्चात संविधान लागू होने से अब तक (1950-2026), भारत की सभी अदालतों में 5 करोड़ 49 लाख के करीब मुकद्दमे विचाराधीन हैं, इनमें से कई केस 10 से 30 वर्षों से लटके हुए हैं और कई लोग न्याय की इंतजार में अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके हैं। अब उनकी दूसरी पीढ़ी इंसाफ पाने के लिए ठोकरें खा रही है। हकीकत में भारत में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 100 करोड़ लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। जबकि भारत की कुल आबादी 1 अरब 45 करोड़ है। इतनी भारी संख्या में लंबित मामले विश्व के शायद ही किसी अन्य देश में हों। एक सर्वे के अनुसार वर्तमान लंबित मुकद्दमों से निपटने के लिए कम से कम 500 वर्ष लगेंगे जबकि औसतन भारतीय की आयु 68 वर्ष है। अगर इसी धीमी गति से व्यवस्था चलती रही तो जीवित व्यक्ति के लिए न्याय पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन हो जाएगा। विश्व के 10 छोटे देशों की इतनी आबादी नहीं, जितने भारत में न्यायालयों में मुकद्दमे दर्ज हैं। चीन में 4 करोड़ 60 लाख केस प्रति वर्ष न्यायालयों में दर्ज होते हैं, जिनमें से 99 प्रतिशत केसों का 1 वर्ष में निपटारा कर दिया जाता है, जबकि चीन की आबादी 142 करोड़ है।
विश्व के सबसे शक्तिशाली और प्रजातांत्रिक देश अमरीका में 3.98 करोड़ के करीब दीवानी केस हर वर्ष दाखिल होते हैं, जिन पर बड़ी तेजी से फैसले लिए जाते हैं, केवल फौजदारी मुकद्दमों में देरी होती है। अमरीका की आबादी 35 करोड़ के करीब है। मुकद्दमों के शीघ्र निपटारे से जहां लोगों का समय और धन बचता है, वहीं दूसरी तरफ आॢथक विकास में आश्चर्यजनक इजाफा होता है। यदि अमरीका और चीन में करोड़ों मुकद्दमों का 1 वर्ष में फैसला किया जा सकता है, तो भारत में क्यों नहीं?
इस समय केवल सुप्रीम कोर्ट में 26,979 याचिकाएं पड़ी हैं और देश की हाईकोर्टों में इनकी संख्या कई हजारों में है। इन याचिकाओं को निजी स्वार्थ, धन लोलुपता या बदलाखोरी के लिए दुरुपयोग किया जाता है। न्यायपालिका में केवल 11.8 प्रतिशत याचिकाओं को स्वीकृति प्रदान की जाती है, जबकि 88.2 प्रतिशत को खारिज कर दिया जाता है। ताज्जुब यह है कि स्वीकृत याचिकाओं में भी 61 प्रतिशत खारिज हो जाती हैं। यह याचिकाएं केवल न्यायालयों पर गैर जरूरी बोझ ही नहीं, बल्कि लोगों के लिए भी अत्यधिक परेशानियां पैदा होती हैं। कई बार सत्ता पक्ष के नेता अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाने के लिए झूठे और बेबुनियाद केस डाल देते हैं, जिनके फैसले में पूरा जीवन इंतजार करना पड़ता है।
सरकार को बंद ज्यूरी ट्रायल कोर्ट्स पुन: बहाल करनी चाहिएं ताकि जल्द फैसले किए जा सकें। कुल मुकद्दमों में 1 प्रतिशत तलाक के मामले दर्ज हैं जिन्हें बड़ी आसानी और कम समय में निपटाया जा सकता है, जबकि भारत में इन केसों को निपटाने के लिए 10 से 15 साल लग जाते हैं। भारत के एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को तलाक लेने में 17 वर्ष लगे। विकसित देशों में इन केसों का कुछ ही महीनों में फैसला कर दिया जाता है।
मुकद्दमों में देरी और पेचीदगियों के कारण न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता में कमी आ रही है, जिसे दुरुस्त करना समय की जरूरत है। अमरीका में 10 लाख आबादी पर 130 न्यायाधीश हैं, चीन में 300, जबकि भारत मे केवल 15 हैं। लंबित मामलों का निपटारा करने के लिए सरकार को अतिशीघ्र न्यायधीशों के खाली पद भरने चाहिएं और जरूरत के अनुसार इनकी संख्या में वृद्धि करनी चाहिए।
कई प्रदेशों की सरकारें दीवानी केसों को अपने स्तर पर निपटाने की बजाय लोगों को कोर्टों में जाने के लिए मजबूर कर देती हैं, जिससे न्याय पालिका में मुकद्दमों की तादाद तीव्र गति से बढ़ती रहती है। केंद्र सरकार को सभी प्रादेशिक सरकारों को सख्त हिदायत देनी चाहिए ताकि वे उन केसों का अपने अधिकारियों के जरिए निपटारा करें, समय की बर्बादी से बचें और लोग कोर्टों में ठोकरें खाने से निजात पा सकें। सभी प्रकार के न्यायिक मामलों के लिए समय निश्चित किया जाए और माननीय न्यायाधीशों को जिम्मेदारी और जवाबदेही की व्यवस्था में लाया जाए। भारतीयों के लिए यह गर्व का विषय है कि माननीय न्यायाधीश योग्य, कार्यकुशल और अपने फैसलों के लिए विश्व में विशेष स्थान रखते हैं, परंतु लंबित मामले समाज के लिए अति दुखदायी हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लार्ड ग्लैडस्टोन ने लोगों की न्यायिक परेशानियों पर संसद में अपने भाषण में कहा था हकीकत में न्याय में देरी न्याय से ही इंकार है।-प्रो. दरबारी लाल