जे.पी. नड्डा : एक शांत रणनीतिकार की विदाई

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 05:14 AM

j p nadda the departure of a quiet strategist

यह एक अनुभवी राजनेता जगत प्रकाश नड्डा के लिए भावुक विदाई है, एक ऐसी विदाई, जो राजनीतिक विडंबनाओं और उपलब्धियों के अनोखे संगम से सजी है। हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक और अभूतपूर्व जीत के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय...

यह एक अनुभवी राजनेता जगत प्रकाश नड्डा के लिए भावुक विदाई है, एक ऐसी विदाई, जो राजनीतिक विडंबनाओं और उपलब्धियों के अनोखे संगम से सजी है। हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक और अभूतपूर्व जीत के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली निर्णायक सफलता ने इस विदाई को राजनीतिक पुनस्र्थापन और संगठनात्मक विजय के पुष्पगुच्छ में बदल दिया।

अस्थिर राजनीति के बीच कार्यकाल : औपचारिक रूप से उनका कार्यकाल संतोष, आत्मविश्वास और शांत गर्व की अनुभूति कराता है। राजनीतिक अस्थिरता के दौर में पार्टी की कमान संभालते हुए उन्होंने न केवल संगठन की वैचारिक जड़ों को मजबूत किया बल्कि भाजपा के चुनावी विस्तार को नए क्षेत्रों तक पहुंचाया। उनके नेतृत्व में भाजपा ने अपने पारंपरिक गढ़ों को और सुदृढ़ किया, जिससे वह भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में और स्थापित हुई।

शांत परिश्रम और संगठनात्मक अनुशासन : नड्डा का कार्यकाल शांत परिश्रम, रणनीतिक जमीनी संगठन और वैचारिक अनुशासन के साथ डिजिटल नवाचार के संतुलन के लिए जाना जाएगा। उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बनाते हुए पार्टी को उसकी मूल हिंदुत्व विचारधारा में दृढ़ रखा और साथ ही डाटा-आधारित, तकनीक-सक्षम चुनावी रणनीति को आगे बढ़ाया। कोविड-19 महामारी के दौरान उनका नेतृत्व विशेष रूप से परखा गया, जब उन्होंने पार्टी कार्यकत्र्ताओं को देशव्यापी राहत और सेवा कार्यों के लिए संगठित किया और संकट को जनसंपर्क व सेवा के अवसर में बदला।

मार्गदर्शकों पर आस्था और मोदी-शाह नेतृत्व पर भरोसा : नड्डा अपनी सफलता का श्रेय ईश्वरीय कृपा को देते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वह मानते हैं कि अमित शाह द्वारा स्थापित संगठनात्मक मानकों को बनाए रखना उनके लिए बड़ी जिम्मेदारी थी और उन्होंने उसे निभाने का हरसंभव प्रयास किया। प्रधानमंत्री मोदी की ‘असाधारण क्षमता और प्रतिबद्धता’ पर उनका अटूट विश्वास है, जो खंडित जनादेश और आक्रामक विपक्ष के बीच भी एन.डी.ए. सरकार को स्थिर दिशा देने में सक्षम है। उन्होंने कहा, ‘‘जनता ने मोदी की गारंटी पर भरोसा जताया है, जो हर भाजपा अभियान को नई ऊर्जा और अजेय जुझारूपन देता है।’’ उनके अनुसार, मोदी के निर्णायक नेतृत्व में लोकसभा, बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा की जीतें, जनता के विश्वास का प्रमाण हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी मित्रता 1990 के दशक की शुरुआत से है, जब दोनों हिमाचल प्रदेश में पार्टी कार्यों के लिए लंब्रेटा स्कूटर पर साथ यात्रा करते थे।

पीढ़ीगत परिवर्तन और आर.एस.एस. के साथ तालमेल : नड्डा को भाजपा में पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन पर विशेष गर्व है। कई राज्यों में मौजूदा सांसदों को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने एक नया मानदंड स्थापित किया। उनके अनुसार, यह प्रयोग भाजपा कार्यकत्र्ताओं की अनुशासनबद्धता और किसी भी चुनौती के लिए तत्परता को दर्शाता है। आर.एस.एस. के साथ तालमेल को वह संगठन की वैचारिक रीढ़ बताते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी पार्टी को स्थिर रखती है। 

प्रचारक से संसद तक : आर.एस.एस. प्रचारक से राज्यसभा में सदन के नेता तक का नड्डा का सफर भाजपा की आदर्श सफलता की कथा है। अनुशासित कार्यशैली, रणनीतिक दृष्टि और वैचारिक दृढ़ता उनके उदय की पहचान रही है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मिली शानदार जीतें उनके संगठनात्मक कौशल का प्रमाण हैं। 2024 में पूर्ण बहुमत न मिलने के बावजूद एन.डी.ए. की सत्ता में वापसी, उनके कार्यकाल में रखी गई मजबूत नींव को दर्शाती है।

हिमाचल की परीक्षा और निष्ठा का उदाहरण : 2017 में हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आगे होने के बावजूद नड्डा ने कोई लॉबिंग नहीं की। प्रेम कुमार धूमल की हार के बाद भी उन्होंने नेतृत्व पर पूरा भरोसा दिखाया। नड्डा को 2019 में कार्यकारी अध्यक्ष और 2020 में पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी कहीं अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।

विभाजनकारी राजनीति और उत्तर-दक्षिण विमर्श का खंडन : नड्डा उत्तर-दक्षिण विभाजन की कोशिशों की तीखी आलोचना करते हैं। उनके अनुसार, दक्षिण भारत में भाजपा की बढ़ती उपस्थिति ने इस तरह की राजनीति को सिरे से खारिज कर दिया है। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव हारने का दर्द जरूर रहा लेकिन लोकसभा की चारों सीटों पर भाजपा की जीत ने उनकी प्रतिष्ठा बहाल कर दी। 

जे.पी. आंदोलन और ए.बी.वी.पी. से मिली वैचारिक दिशा : नड्डा की राजनीतिक यात्रा 1970 के दशक में पटना कॉलेज में जे.पी. आंदोलन से शुरू हुई, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना जगाई और इंदिरा गांधी की हार का मार्ग प्रशस्त किया। संघ की पृष्ठभूमि और 1990-91 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ए.बी.वी.पी.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्य ने उनकी संगठनात्मक क्षमता को निखारा। अटल बिहारी वाजपेयी, भैरों सिंह शेखावत और लाल कृष्ण अडवानी जैसे नेताओं के सान्निध्य में उनका राजनीतिक विकास हुआ।
अध्यक्ष पद से आगे भी जारी सफर : भाजपा अध्यक्ष पद से विदा होते हुए भी नड्डा की राजनीतिक यात्रा समाप्त नहीं हुई है। राज्यसभा में सदन के नेता के रूप में वह अपने अनुभव, वैचारिक निष्ठा और शांत दृढ़ता से पार्टी को दिशा देते रहेंगे, एक ऐसी विरासत, जो दिखावे से नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता से बनी है।-के.एस. तोमर
 

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