Edited By ,Updated: 21 Jan, 2026 03:53 AM

फूट में एकता या एकता में फूट? हैरान हैं! किंतु बृहन मुंबई नगर पालिका (बी.एम.सी.) के चुनाव परिणामों से ऐसा दिखाई देता है। महाराष्ट्र के नगर पालिका चुनाव आने वाले समय में राजनीति का निर्धारण कर सकते हैं। इसके चलते विपक्ष खंडित हो रहा है तथा उसके...
फूट में एकता या एकता में फूट? हैरान हैं! किंतु बृहन मुंबई नगर पालिका (बी.एम.सी.) के चुनाव परिणामों से ऐसा दिखाई देता है। महाराष्ट्र के नगर पालिका चुनाव आने वाले समय में राजनीति का निर्धारण कर सकते हैं। इसके चलते विपक्ष खंडित हो रहा है तथा उसके सहयोगी भी घबरा रहे हैं। यह शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की राकांपा के लिए भी खतरे की घंटी है।
इस जीत से मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस का कद बढ़ा है। फडऩवीस ने शिवसेना और राकांपा में विभाजन कराया और महा विकास अघाड़ी अर्थात कांग्रेस, ठाकरे शिव सेना और शरद पवार की राकांपा को 2022 में धराशाई किया और 2024 में विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की तथा अब स्थानीय निकायों के चुनावों में भारी जीत दर्ज की है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुड्डुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को एक नई ऊर्जा मिली है। विपक्ष के लिए महाराष्ट्र एक खोए अवसर के समान है और इससे वह और विखंडित हो गया है। भाजपा के इस विजयी रथ को रोकने के लिए पुराने तौर-तरीके, संरक्षण या विरासत से काम नहीं चलेगा और पवार ने इस बात को समझा है, इसीलिए चुनाव परिणामों के बाद राकांपा के दोनों धड़ों की बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया गया है कि आगामी पंचायत और जिला परिषद चुनावों में दोनों के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन बनेगा। राकांपा को इस जनाधार को बचाना होगा और अजीत पवार तथा शरद पवार के साथ होने से इसमें मदद मिल सकती है किंतु यह मदद भी अल्पकालिक रहेगी।
शरद पवार क्षत्रप केन्द्रित राजनीति का प्रबंधन करने में कुशल रहे हैं और उनकी राजनीति सहकारिता के इर्द-गिर्द रही है, किंतु अब स्थिति बदल रही है। अब राज्य में राजनीति और जटिल तथा केन्द्रीयकृत हो गई है। परिवार के प्रति निष्ठा से अब राजनीतिक समर्थन नहीं मिलता। राकांपा को ब्रांड पवार से परे सोचना होगा और अपनी पहचान और प्रभाव को बनाए रखने के लिए नई तरह की राजनीति पर विचार करना होगा। कांग्रेस के लिए और भी मुसीबत है। नि:संदेह 2024 के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा, किंतु बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में उसके खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी में यह आवाज उठने लगी है कि राहुल गांधी का नेतृत्व प्रभावी नहीं है। कांग्रेस इस भ्रम में भी है कि उसने 250 लोकसभा सीटों पर भाजपा से सीधा मुकाबला किया है। इसलिए उसके बिना कोई भी भाजपा विरोधी गुट नहीं बन सकता।
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की प्रभावहीनता भाजपा के लिए लाभकारी है और इसके साथ ही किसी भी क्षेत्रीय क्षत्रप द्वारा अखिल भारतीय भूमिका निभाने में विफल रहने से भी भाजपा को मदद मिल रही है क्योंकि अनेक राज्यों में ये क्षत्रप कांग्रेस के साथ मुकाबला कर रहे हैं और कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता क्षेत्रीय दलों को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं न कि भाजपा विरोधी गठबंधन में अपना सहयोगी। क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस उपयोगी सहयोगी है किंतु वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि कांग्रेस फिर से उभर कर शक्तिशाली न बने। तेलंगाना और कर्नाटक में वह क्षेत्रीय दलों के विरुद्ध सफल रही है। इसके अलावा बिहार और तमिलनाडु में उसे क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू बनने के लिए बाध्य होना पड़ा। यही स्थिति महाराष्ट्र में भी है, जहां पर राकांपा और शिवसेना-उद्धव विभाजन के बाद कमजोर हुई हैं, किंतु वह कांग्रेस के किसी भी तरह के नखरे सहने के लिए तैयार नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी कठिन सौदेबाजी कर रही है और इस बात को सुनिश्चित कर रही है कि सीटों के बंटवारे में उसके हितों को आंच न आए।
बिहार में स्थानीय नेताओं में निराशा और गुस्सा है क्योंकि उनका मानना है कि उनके साथ धोखा हुआ है। जहां तक शिवसेना का संबंध है, चुनावी दृष्टि से उसकी विरासत अब पूर्णत: शिंदे के हाथ है क्योंकि ठाकरे बंधुओं के एकजुट होने के बावजूद वे अपने वोट बैंक को आकॢषत नहीं कर पाए। तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी स्वयं को राष्ट्रीय स्तर की नेता के रूप में प्रस्तुत करने के लिए आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में जीत पर निर्भर है। उनकी योजनाएं दो युक्तियों पर आधारित हैं। पहला, सभी गैर-भाजपा दलों के बीच व्यापक तालमेल बनाया जाए ताकि भाजपा को एकजुट होकर चुनौती दी जा सके और साथ ही अन्य क्षत्रपों के साथ संबंध स्थापित कर अपना कद बढ़ाया जाए। जिसके चलते उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में देखा जा सके, जिसका अपना एक ट्रैक रिकार्ड, नैटवर्क है और गठबंधन का चेहरा बनने की विश्वसनीयता है।
भाजपा की जीत के रिकॉर्ड को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसे पराजित नहीं किया जा सकता, जबकि विपक्ष ने अभी तक जीत के लिए नैरेटिव निर्धारित नहीं किया है क्योंकि वह अभी भी भाजपा द्वारा संस्थानों को पंगु कर माहौल को खराब करने के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। स्पष्टत: विरोधाभासों की इन बारूदी सुरंगों में रणनीतियां, वोट बैंक के लाभ को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं इसलिए विपक्ष में एकता की बात कहना आसान है, जबकि एकता स्थापित होना कठिन। विपक्ष में एकता स्थापित करने के लिए दूरदॢशता और लचीलेपन की आवश्यकता है। कमजोर और विभाजित विपक्ष चाहे आप उसको कोई भी नाम दो, वह कमजोर विपक्ष ही बना रहेगा। तथापि अधिक क्षेत्रीय क्षत्रपों का उभरना भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा है। भारत के भविष्य का निर्माण गणित नहीं अपितु राजनीति है।-पूनम आई. कौशिश