Edited By ,Updated: 25 Aug, 2026 03:22 AM

आयरलैंड के बेलफास्ट शहर की क्वींस यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री प्रोफैसर डेविड आचर्ड ने ‘बच्चों को कैसे पालें’ इस पर विशेष अध्ययन किया है। उनका कहना है कि अतीत में बच्चों की परवरिश से संबंधित कई प्रयोग किए गए हैं। ढाई हजार सालों से ऐसे प्रयोग हो रहे...
आयरलैंड के बेलफास्ट शहर की क्वींस यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री प्रोफैसर डेविड आचर्ड ने ‘बच्चों को कैसे पालें’ इस पर विशेष अध्ययन किया है। उनका कहना है कि अतीत में बच्चों की परवरिश से संबंधित कई प्रयोग किए गए हैं। ढाई हजार सालों से ऐसे प्रयोग हो रहे हैं। जैसे कि यूनान के दार्शनिक प्लेटो का कहना था कि यदि बच्चों का पालन-पोषण राज्य या सरकारें करें तो माता- पिता अपने बच्चों को पहचानेंगे ही नहीं। इससे समाज का ढांचा अधिक निष्पक्ष होगा। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सफल नहीं हो सका क्योंकि माता- पिता और बच्चों के बीच जो नाभि-नाल संबंध होता है, वह खत्म नहीं हो पाया।
इसी तरह का प्रयोग उन्नीसवीं सदी में अमरीका की वनाइडा कम्युनिटी में किया गया। यहां बच्चों को माता-पिता के मुकाबले समूह में पालने की योजना बनाई गई, लेकिन यह प्रयोग भी असफल रहा। अमरीका में ही एक प्रयोग के तहत बहुत से बच्चों को उनके माता-पिता से दूर गांवों में बसाया गया। सोचा गया था कि इससे उनका भविष्य अच्छा बनेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। बाद में पता चला कि इसके लिए कई बच्चों को उनके माता-पिता से जबरदस्ती दूर किया गया था। बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ा। जब वे बड़े हुए तो इनमें से बहुत से चिड़चिड़े हो गए थे। उनमें मानसिक कमजोरी भी थी। प्रोफैसर डेविड का मानना है कि हो सकता है, बच्चों को पालने के मामले में परिवार में कुछ कमियां हों, लेकिन बच्चे अपने माता-पिता के पास ही सुरक्षित महसूस करते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसा कोई भी मॉडल या प्रयोग सफल नहीं हो सका है, जहां माता-पिता के अलावा कोई और बच्चे को सुरक्षित ढंग से पाल सकता है।
अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में भी प्रोफैसर जैक श्राफ ने ऐसे ही प्रयोग किए हैं। उनका भी कहना है कि यदि बच्चे का मानसिक, शारीरिक विकास सही दिशा में हो, तो इसके लिए जरूरी है कि कम से कम एक वयस्क उनकी देखभाल करे। यह भूमिका माता-पिता की ही होती है। अमरीकन एकैडमी आफ पीडियाट्रिक्स का भी मानना है कि बच्चों के शुरूआती वर्षों में भावनात्मक लगाव, बच्चे के सामाजिक, मानसिक, शारीरिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। कुल मिलाकर कहा यह जा रहा है कि बच्चों को माता-पिता हर हाल में चाहिएं। यह पढ़-सुनकर आश्चर्य भी होता है कि पश्चिमी दुनिया ने 100 सालों से अधिक के समय में पारिवारिक व्यवस्थाओं पर सबसे अधिक चोट की है। इस बारे में तमाम विमर्श भी पैदा किए हैं, जो कहते हैं कि बच्चों और स्त्रियों के लिए परिवार सबसे अधिक शोषण मूलक हैं। परिवार की बहुत अधिक पूछताछ, हर बारे में अपनी राय, पढ़ाई-लिखाई, खान-पान से लेकर रहन-सहन के मामले में अत्यधिक हस्तक्षेप, बच्चों और युवाओं को पसंद नहीं आता। इससे उनका मानसिक विकास अवरुद्ध होता है। वे कभी भी अपने पांवों पर ठीक से खड़े नहीं हो पाते। लेकिन अब वही पश्चिम परिवार-परिवार चिल्ला रहा है।
अमरीका में तो 1993 से परिवार की वापसी का आंदोलन चल रहा है। संयुक्त राष्ट्र परिवार दिवस घोषित कर रहा है। परिवार के महत्व पर तमाम सैमीनार आयोजित किए जा रहे हैं। पहले ऐसे विचारों को खूब हवा दी गई, जिन्होंने परिवार के पूरे ढांचे को ही शोषण कारक बताया। अब उसी परिवार की वापसी के लिए चिल्ला रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि वहां बहुत से बच्चे बालपन से ही तरह-तरह के नशे के चक्कर में पड़ जाते हैं। बहुत छोटी उम्र में माता-पिता बन जाते हैं। टीनेज प्रैग्नैंसी वहां की बड़ी समस्या है। बच्चे अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं। वे मामूली सी बात पर गोलियां चला देते हैं। बच्चों के अधिकार और आजादी के नाम पर कोई उनसे कुछ कह भी नहीं सकता।
अर्से से वहां के समाज शास्त्री, पुलिस वाले, मनोचिकित्सक आदि कह रहे हैं कि अगर स्वस्थ समाज लाना है, तो बच्चों को परिवार दीजिए। लेकिन ये हो कैसे। परिवार जैसी संस्था चलाने के लिए मेहनत, समावेशिता और एक-दूसरे से एडजस्टमैंट चाहिए। अधिकारों के नाम पर जिस बात का सबसे अधिक हनन हुआ है, वह है एडजस्टमैंट। फिर इस बदलती दुनिया में जहां वयस्क ही बहुत अकेले हैं, वहां बच्चों के अकेलेपन की कल्पना तो सहज ही की जा सकती है। उनके साथ समय बिताने वाला कोई नहीं, उनसे बातचीत करने वाला, उनके साथ खेलने वाला, उनकी समस्या सुनने वाला भी जैसे ढूंढे नहीं मिलता। फिर व्यक्तिवाद का विचार इतना हावी है कि अपने के अलावा कोई और दिखाई नहीं देता। अपनी इंडिविज्युएलिटी बचाने के नाम पर हम लगातार अकेले होते जाते हैं।
इसके अलावा पश्चिमी देश , जापान, रूस, चीन व दक्षिण कोरिया आदि भी बच्चों की कमी से जूझ रहे हैं। वहां लोग बच्चे ही नहीं पैदा करना चाहते। बहुत से विवाह में दिलचस्पी ही नहीं रखते। बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ रही ह़ै, जबकि देश चलाने के लिए युवा चाहिएं।
और ऐसे समाज हमें बहुत आकर्षित करते हैं। भारत में विदेश जाने की इच्छा और उन्हीं जैसा बनने की इच्छा बहुत प्रबल है। एकल परिवार और अब तो सिंगल मदर और सिंगल फादर जैसी बातें अपने यहां भी चलन में आ रही हैं। पश्चिम में ये बातें बहुत पहले से हैं, वे इनसे दूर भाग रहे हैं और हम इन्हीं की तरफ दौड़ रहे हैं।-क्षमा शर्मा