Edited By ,Updated: 28 Jan, 2026 06:03 AM

पद्म पुरस्कारों पर अब सामान्य तौर पर ज्यादा हो-हल्ला नहीं मचता। यह भी कहने वाले कम हो गए कि मैं पद्म पुरस्कार (पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री) दिलवा सकता हूं। ज्यादा नहीं तो बीते दशक के पहले ये बातें अक्सर सुनने को मिल जाती थीं और सामने दिखने...
पद्म पुरस्कारों पर अब सामान्य तौर पर ज्यादा हो-हल्ला नहीं मचता। यह भी कहने वाले कम हो गए कि मैं पद्म पुरस्कार (पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री) दिलवा सकता हूं। ज्यादा नहीं तो बीते दशक के पहले ये बातें अक्सर सुनने को मिल जाती थीं और सामने दिखने वाली या बड़ी हस्तियों के आस-पास रहने वाले लोग इससे पुरस्कृत हो जाते थे। राष्ट्रीय स्तर के इन पुरस्कारों को पाने की जो होड़ पहले होती थी, अब भी होती है लेकिन अब शायद ज्यादा साफ प्रक्रिया होने से सचमुच समाज बदलने वाले या फिर जिन्होंने कला, संस्कृति, विज्ञान, सार्वजनिक जीवन, मैडीकल के अतिरिक्त अन्य विशिष्ट क्षेत्रों में बड़ा प्रदर्शन किया है, उनका नाम सामने ज्यादा आने लगा है (अपवाद तो अब भी हैं लेकिन अब आपको झटका नहीं लगता)।
पहले कहा ही जाता था कि पद्म पुरस्कार उन्हीं को मिलते हैं जो बड़े-बड़े घरों में रहा करते हैं। पहले दिल्ली या मुंबई का कब्जा ज्यादा होता था अथवा फिर फिल्मी दुनिया के आकर्षण का। कुछ खेल और फिर सार्वजनिक जीवन के नाम पर अफसरों और नेताओं का। कई बार ऐसा होता था कि मैडीकल के क्षेत्र में पद्म अवार्ड के आमतौर पर सवा सौ के आसपास में रहने वाली सूची में 20-20 नाम मैडीकल से होते थे और ज्यादातर महानगरों से या फिर प्रधानमंत्रियों के इलाकों के। 90 के दशक में 10 वर्षों में 117 डाक्टरों को इन पुरस्कारों से नवाजा गया और 2000 के पहले दशक में 122 को। फिल्मों में जब सैफ अली खान (2010) और अजय देवगन (2016) को यह सम्मान दिया गया तो उनके अतुलनीय योगदान पर सवाल उठे।
पाकिस्तान से आए गायक अदनान सामी, टी.वी. पर सास-बहू सीरीज की क्वीन और बोल्ड फिल्में बनाने वाली एकता कपूर और जमीन से उड़ी (जुड़ी नहीं) फिल्में बनाने वाले करण जौहर भी इसी श्रेणी में रहे। लेकिन पिछले एक दशक से इसमें पर्याप्त सुधार देखने को मिला। इसमें पारदर्शिता दिखी, जमीन से जुड़े लोग दिखे, जिन्होंने विस्तारित समाज के लिए सचमुच कुछ किया, वे दिखे। बीते 10 वर्षों में कृषि और जैविक खेती में नवाचार, स्वदेशी बीजों के संरक्षण और उत्पादकता बढ़ाने के लिए कई किसानों और वैज्ञानिकों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
इस बार भी पद्म पुरस्कारों को लेकर आप यह कह सकते हैं कि इनमें से कई ने गंभीर व्यक्तिगत उलझनों को किनारे करते हुए अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्टता पाई। इनमें से तो कई पिछड़े और दलित समुदायों के अलावा दूरस्थ और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों से आने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज और देश में कानून के कई सुधारों के प्रणेता रहे केरल के के.टी. थामस, वायलिन में दुनिया में नाम रोशन करने वाली एन. राजन, केरल के ही साहित्यकार पी. नारायणन, वामपंथी नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के नाम पद्मविभूषण के लिए हैं और इस पर कौन आपत्ति कर सकता है। अपने धरम भाजी इसी श्रेणी में हैं। उन्हें मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया गया। वैसे धर्मेंद्र को अपने कैरियर के चालीस साल में कोई पुरस्कार (फिल्मफेयर भी) नहीं मिला। बीते दशक में इन्हें अचानक पद्मभूषण दिया गया और अब पद्मविभूषण।
इसी तरह पद्मभूषण की सूची में गायिका अलका याज्ञनिक, फिल्म अभिनेता मम्मूटी, तमिलनाडु के मैडिसिन में कलीपत्ती रामास्वामी और अमरीका में रह रहे कैंसर विशेषज्ञ नोरी दत्तात्रेयदु के अलावा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशियारी भी शामिल हैं। विज्ञापन की दुनिया के अगुवा तथा ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे को जन-जनव्यापी बनाने वाले पियूष पांडेय को मरणोपरांत, तमिलनाडु के सोशल वर्कर एस.के.एन. महिलानंदन, कर्नाटक के भजन गायक सतावधानी गणेश तथा शिक्षाविद् और केरल के सबसे बड़े ङ्क्षहदू समुदाय एझावा के नेता वेलापल्ली नतेशन (केरल) को इसी श्रेणी में दिया गया। अब पद्मश्री से नवाजे गए अंके गोड़ा (जो कभी कंडक्टर थे और बाद में जिन्होंने 20 लाख पुस्तकों के साथ लाइब्रेरी बनाई), बिहार के लोक गायक भारत सिंह भारती और बिहार के ही लोक नृत्य के प्रणेता विश्वबंधु, ओडिशा के सामाजिक कार्यकत्र्ता चरन हेमराम, लीची किसान गोपाल जी त्रिवेदी, मेघालय के पर्यावरण संरक्षणकत्र्ता बांस के पुल बनाने वाले हैली वार, सफाई के लिए जीवन समॢपत करने वाले पूर्व आई.पी.एस. अफसर इंद्रजीत सिंह संधू, असम की लोकगायिका पोखिला लेखथेपी, शिल्पगुरु चिरंजी लाल यादव और विलुप्त होतीं 55 से अधिक सब्जियों के बीजों को बचाने के लिए रघुपत सिंह (मरणोपरांत) ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने अलग से कुछ काम किया।
इस बार भी विवाद के लिए एक बात है। कहने वाले सिर्फ इतना ही कह सकते हैं कि केरल के लोगों को ज्यादा (8) पद्म पुरस्कार मिले हैं (खास तौर से पद्मविभूषण से सम्मानित अच्युतानंदन समेत 3)। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी 11 विभूतियों को पुरस्कृत किया गया है। और दोनों ही राज्यों में अगले साल चुनाव हैं। आरोप है कि जिन 5 राज्यों में (देश की आबादी का 18 फीसदी भूभाग) चुनाव हैं, वहां 37 फीसदी पुरस्कार दिए गए। आरोप तो यह भी है कि कई विवादित मामलों में फंस चुके शिबू सोरेन को भी पुरस्कृत झारखंड की आगे की राजनीति के मद्देनजर किया गया। दूसरी तरफ मोदी सरकार भी कह सकती है कि हमने तो पूर्व मेें शरद पवार, तरुण गोगई, मुलायम सिंह यादव, प्रणव मुखर्जी, गुलाम नबी आजाद समेत राजनीतिक विरोधियों को सम्मानित किया है। इस बार 30 राज्यों के 84 जिलों से 39,000 से ज्यादा आवेदन आए और समिति ने इसमें से चयन किया। लेकिन पद्म पुरस्कारों को लेकर यह बात तो कही जा सकती है कि पद्म पुरस्कार अब खुद सम्मानित हो रहे हैं।-अकु श्रीवास्तव