Edited By ,Updated: 06 Mar, 2026 03:54 AM

1934 में, जब पंजाब में कानून प्रवर्तन के कामकाज को संचालित करने वाले पुलिस नियम बनाए गए थे, तब प्रशासकों ने एक ऐसा आधारभूत सिद्धांत निर्धारित किया था, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि भारत का आपराधिक कानून और उस...
1934 में, जब पंजाब में कानून प्रवर्तन के कामकाज को संचालित करने वाले पुलिस नियम बनाए गए थे, तब प्रशासकों ने एक ऐसा आधारभूत सिद्धांत निर्धारित किया था, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि भारत का आपराधिक कानून और उस पर आधारित पुलिस संगठन एक सरल लेकिन शक्तिशाली विचार पर टिके हैं-सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना कानून के दायरे में समुदाय के प्रत्येक सदस्य की सामूहिक जिम्मेदारी है। पुलिस और मैजिस्ट्रेट प्रणाली अलग-थलग अधिकार के साधन के रूप में नहीं, बल्कि इस सांझा जिम्मेदारी की सहायता, उसे लागू करने और मार्गदर्शन करने के लिए बनाई गई संस्थाओं के रूप में मौजूद हैं। पुलिस और जनता के बीच के इस रिश्ते को व्यवस्था की रीढ़ माना गया था।
नियमों ने आगे एक ऐसा आदर्श स्थापित किया, जिसमें कहा गया था कि प्रत्येक पुलिस अधिकारी को हर कानून का पालन करने वाले नागरिक द्वारा एक ‘बुद्धिमान और निष्पक्ष मित्र’ और जीवन व संपत्ति के रक्षक के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि जनता पुलिस को एक मित्र और रक्षक के रूप में देखती है, तो नागरिक जांच में सहायता करेंगे, अपराधों की तुरंत रिपोर्ट करेंगे और शांति बनाए रखने में सहयोग करेंगे। जब पुलिस और लोगों के बीच विश्वास मजबूत होता है, तो अपराध होने से पहले ही रुक जाते हैं क्योंकि समुदाय सतर्क और जिम्मेदार बन जाता है। लेकिन जब वह विश्वास खत्म हो जाता है, तो लोग अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, अपराधियों के साथ समझौता कर लेते हैं या निजी तौर पर मामले सुलझाने लगते हैं। ऐसी स्थितियों में, पुलिस अपराधों को रोकने और उनका पता लगाने के अपने प्रयासों में अलग-थलग पड़ जाती है और सफलता सीमित हो जाती है।
मुझे 39 वर्षों तक पंजाब पुलिस में सेवा करने का सौभाग्य मिला। मेरा करियर पंजाब के आधुनिक इतिहास के सबसे अशांत दौर में रहा-उग्रवाद के उदय से लेकर उसकी अंतिम हार तक। मैं उन कठिन वर्षों के दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाओं का हिस्सा रहा और मैंने पुलिस बल द्वारा दिखाए गए साहस, बलिदान और चुनौतियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा। जिला पुलिस अधीक्षक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मुझे एक ऐतिहासिक सार्वजनिक बैठक आयोजित करने का सम्मान मिला, जिसमें अस्सी हजार से अधिक नागरिक शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की शपथ लेने के लिए एकत्र हुए थे। वह क्षण मेरे करियर के सबसे प्रेरक अनुभवों में से एक है। इसने साबित किया कि जब पुलिस और जनता आपसी विश्वास के साथ एक साथ खड़े होते हैं, तो ङ्क्षहसा के सबसे काले दौर पर भी विजय पाई जा सकती है। हालांकि, यह देखना उतना ही कष्टकारी है कि पिछले कुछ वर्षों में विश्वास की वह भावना धीरे-धीरे कमजोर हुई है। सबसे परेशान करने वाले घटनाक्रमों में से एक, पुलिस प्रणाली के भीतर पेशेवर गरिमा का क्षरण होना है। पहले के समय में, अधिकारी अपनी प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता को महत्व देते थे। नियुक्तियों को जनता की सेवा करने की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता था। आज, दुर्भाग्य से, यह धारणा बढ़ रही है कि कुछ अधिकारी अनुकूल नियुक्तियों या पदों के लिए अपने आत्म-सम्मान का सौदा करते हैं। जब पेशेवर ईमानदारी से समझौता किया जाता है तो पुलिसिंग का पूरा ढांचा कमजोर होने लगता है।
इससे भी अधिक ङ्क्षचताजनक कुछ राजनीतिक वर्गों, आपराधिक नैटवर्क और प्रशासन के भीतर के तत्वों के बीच एक कथित गठजोड़ का उभरना है। जब ऐसे गठबंधन जड़ जमा लेते हैं, तो कानून के शासन को गंभीर क्षति पहुंचती है। आज पंजाब संगठित अपराध, नशा तस्करी और गैंगस्टर नैटवर्क से गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। कई क्षेत्रों में, ये तत्व खतरनाक आत्मविश्वास के साथ काम करते दिखाई देते हैं। जबरन वसूली, गिरोह ङ्क्षहसा और सीमा पार तस्करी की घटनाओं ने आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। जब ऐसी धारणा फैलती है, तो यह पुलिस की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है और राज्य में जनता के विश्वास को कम करती है। एक और चिंताजनक प्रवृत्ति उन सेवाओं का बढ़ता नौकरशाहीकरण है, जो कभी पुलिस नेतृत्व के विवेकाधीन अधिकार का हिस्सा थीं। सत्यापन सेवाएं और अन्य नियमित प्रक्रियाओं को तेजी से सुविधा केंद्रों जैसे केंद्रीकृत सेवा केंद्रों में स्थानांतरित कर दिया गया है। हालांकि इन केंद्रों का उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाना था लेकिन वे अक्सर पुलिसिंग को एक यांत्रिक लेनदेन तक सीमित कर देते हैं। पुलिसिंग को कागजी कार्रवाई और फीस तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह मूल रूप से राज्य और नागरिक के बीच का एक रिश्ता है। जब मानवीय तत्व गायब हो जाता है और सब कुछ प्रक्रियात्मक हो जाता है, तो पुलिसिंग की भावना फीकी पडऩे लगती है।
चुनौतियों से निपटने के लिए न केवल बेहतर तकनीक या सख्त कानूनों की आवश्यकता है, बल्कि उस मौलिक सिद्धांत को पुनर्जीवित करने की भी, जिस पर पुलिसिंग का निर्माण हुआ था-पुलिस और लोगों के बीच विश्वास। अधिकारियों को सुलभ, शिकायतें सुनने में धैर्यवान और कानून लागू करने में दृढ़ होना चाहिए। पर्यवेक्षण करने वाले अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कदाचार और भ्रष्टाचार की तुरंत जांच हो, साथ ही ईमानदार अधिकारियों के मनोबल और गरिमा की रक्षा भी की जाए। पंजाब के पुलिस बल का साहस और बलिदान का गौरवशाली इतिहास रहा है। उनके बलिदानों को हमें बल के भीतर व्यावसायिकता और ईमानदारी के उच्चतम मानकों को बहाल करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। (पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार)-इकबाल सिंह लालपुरा