Edited By ,Updated: 05 Jun, 2026 05:11 AM

नैशनल हैल्थ मिशन (एन.एच.एम.) के तहत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल पहलों को मजबूती से लागू करके पंजाब बच्चों की जान बचाने के मामले में अग्रणी राज्यों में से एक बनकर उभरा है। एन.एच.एम. द्वारा समॢथत इस स्वास्थ्य ढांचे को ‘मदर अप्रोच’ के तहत तैयार किया...
नैशनल हैल्थ मिशन (एन.एच.एम.) के तहत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल पहलों को मजबूती से लागू करके पंजाब बच्चों की जान बचाने के मामले में अग्रणी राज्यों में से एक बनकर उभरा है। एन.एच.एम. द्वारा समॢथत इस स्वास्थ्य ढांचे को ‘मदर अप्रोच’ के तहत तैयार किया गया है। इसमें एन.एच.एम. की सभी पहलों को शामिल किया गया है ताकि बेहतर परिणामों के लिए मां और नवजात बच्चे को हर तरह से संपूर्ण सेवाएं प्रदान की जा सकें। परिणामस्वरूप, राज्य ने पिछले दशक के दौरान नवजात शिशु और बाल स्वास्थ्य संकेतकों में बड़ा सुधार किया है।
हाल ही में जारी किए गए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एस.आर.एस.) 2024 के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में शिशु मृत्यु दर (आई.एम.आर.) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 16 दर्ज की गई है, जो 24 के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। इसके अलावा, प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर नवजात मृत्यु दर (एन.एम.आर.) 11 और 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (यू.5एम.आर.) 19 दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि राज्य ने नवजात मृत्यु दर को कम करने के सतत् विकास लक्ष्य को 2030 की समय-सीमा से पहले ही हासिल कर लिया है।
मातृ स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण : इसके तहत उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की शीघ्र पहचान और प्रबंधन को प्राथमिकता दी गई है, साथ ही प्रसव और नवजात शिशु की देखभाल तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करने के लिए रैफरल ढांचे को मजबूत किया गया है। जन्मजात और क्रोमोसोमल (गुणसूत्र) संबंधी विकारों की शीघ्र पहचान करने के लिए सभी उच्च-जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को ए.ए.एम./ए.ए.सी. स्तर तक मुफ्त लैवल-2 अल्ट्रासोनोग्राफी की सुविधा प्रदान की गई है।
पहुंच और जागरूकता : इसके तहत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सी.एच.सी.) स्तर तक ‘केयर कंपैनियन प्रोग्राम’ का विस्तार करके सामुदायिक स्तर की गतिविधियों को तेज किया गया। इन प्रयासों के माध्यम से माताओं और देखभाल करने वालों के बीच स्तनपान, नवजात शिशु की देखभाल, पोषण, साफ-सफाई और खतरे के संकेतों की शीघ्र पहचान करने के बारे में जागरूकता बढ़ाई गई है।
तकनीक-सक्षम नवजात देखभाल : इसके तहत समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए सभी जिला अस्पतालों में सी.पी.ए.पी. सहायता शुरू करके, नवजात शिशु स्थिरीकरण सेवाओं में सुधार करके और गंभीर रूप से बीमार बच्चों के लिए रैफरल प्रणाली को मजबूत करके तकनीक-आधारित राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों को लागू किया गया।
नवजात शिशुओं के लिए बुनियादी ढांचे का विस्तार : स्वास्थ्य प्रणाली के हर स्तर पर बीमार और समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए विशेष देखभाल सुनिश्चित करने हेतु डिलीवरी पॉइंट्स पर 24 स्पैशल न्यूबोर्न केयर यूनिट (एस.एन.सी.यू.), नियोनेटल इंटैंसिव केयर यूनिट (एन.आई.सी.यू.), 81 न्यूबोर्न स्टैब्लाइजेशन यूनिट (एन.बी.एस.यू.) और 208 न्यूबोर्न केयर कॉर्नर स्थापित किए गए। इन कदमों से 6-8 महीने के बच्चों में पूरक आहार की दर 46.2 प्रतिशत से बढ़कर 58.2 प्रतिशत हो गई है। 12-23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण का दायरा 76.2 प्रतिशत से बढ़कर 77.7 प्रतिशत हो गया है। खसरे के टीकाकरण में भी वृद्धि हुई है-पहली खुराक 88.1 प्रतिशत से बढ़कर 92.3 प्रतिशत और दूसरी खुराक 56.7 प्रतिशत से बढ़कर 60.7 प्रतिशत हो गई है।
इसी तरह, 12-23 महीने के बच्चों के लिए रोटावायरस वैक्सीन एन.एफ.एच.एस.-5 के 65.9 प्रतिशत से बढ़कर एन.एफ.एच.एस.-6 में 80.4 प्रतिशत हो गई है। मातृ स्वास्थ्य देखभाल संकेतकों में भी सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं। कम से कम 4 प्रसव पूर्व (एंटीनेटल) जांच कराने वाली माताओं की संख्या 59.7 प्रतिशत से बढ़कर 72.0 प्रतिशत हो गई है। अस्पतालों में होने वाले प्रसव (संस्थागत प्रसव) 94.3 प्रतिशत से बढ़कर 96.1 प्रतिशत हो गए हैं और प्रसव के बाद पहले 2 दिनों के भीतर बच्चों की देखभाल (प्रसवोत्तर देखभाल) 84.7 प्रतिशत से बढ़कर 88.9 प्रतिशत हो गई है। बच्चों के पोषण की बात करें तो, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटापन (स्टंटिंग) की दर एन.एफ.एच.एस.-5 के 24.5 प्रतिशत से घटकर एन.एफ.एच.एस.-6 में 20.4 प्रतिशत रह गई है। इसी तरह, बचपन (5 वर्ष से कम) में मोटापे की दर 4.1 प्रतिशत से घटकर 1.8 प्रतिशत रह गई है।
यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि यदि एन.एच.एम. जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम को सही रणनीति के साथ लागू किया जाए, जमीनी स्तर पर संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, पहलों पर प्रभावी ढंग से अमल किया जाए, जनभागीदारी सुनिश्चित की जाए और नवजात शिशुओं के बुनियादी ढांचे में निरंतर निवेश किया जाए, तो बच्चों की जान बचाने के परिणामों में बड़ा सुधार लाया जा सकता है। इससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए निर्धारित एस.डी.जी. लक्ष्यों को प्राप्त करने की गति को भी तेज किया जा सकता है।