नीतियों के चक्रव्यूह में फंसे देश के छोटे कारोबारी

Edited By Updated: 11 Jul, 2026 05:08 AM

small businesses in the country are caught in a maze of policies

गत 27 जून को राष्ट्रीय एमएसएमई दिवस पर देशभर में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात की रीढ़ बताते हुए खूब प्रशंसा की गई।

गत 27 जून को राष्ट्रीय एमएसएमई दिवस पर देशभर में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात की रीढ़ बताते हुए खूब प्रशंसा की गई। इसके ठीक तीन दिन बाद जीएसटी की नौवीं वर्षगांठ भी मनाई गई। लेकिन इन दोनों आयोजनों के बीच एक कड़वी हकीकत यह है कि भारत के छोटे उद्यमियों को आज भी औपचारिक अर्थव्यवस्था में आने का कोई आसान या व्यावहारिक रास्ता नहीं सूझ रहा। वे नीतियों के ऐसे चक्रव्यूह में फंसे हैं जहां बड़ी कंपनियां उनका भुगतान अटकाए रखती हैं और दूसरी तरफ हमारा कर ढांचा उनसे उस आय पर भी तुरंत कर वसूली चाहता है, जो उसे अभी तक मिली ही नहीं है। यही विरोधाभास छोटे कारोबारियों के लिए दोहरी मार बन गया है।

परिणामस्वरूप छोटे कारोबारियों का नकदी प्रवाह पूरी तरह बिगड़ जाता है और उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। ‘एमएसएमईडी एक्ट 2006’ की धारा 15 कहती है कि यदि लिखित अनुबंध है तो खरीदार को 45 दिनों के भीतर और अनुबंध न होने पर 15 दिनों के भीतर भुगतान करना होगा। देरी पर भारी जुर्माने और चक्रवृद्धि ब्याज का भी प्रावधान है। लेकिन हकीकत में बड़ी निजी कंपनियां और सरकारी संस्थान अक्सर 90, 120 या 180 दिन बाद भुगतान करते हैं।

इस खाई को पाटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काऊंटिंग सिस्टम (टीआरईडीएस) शुरू किया था, जिससे एमएसएमई अपने बिल बैंकों को बेचकर तुरंत धन प्राप्त कर सकें। लेकिन बड़ी कंपनियां इस कारण इससे जुडऩे या बिलों को मंजूरी देने से कतराती रही हैं कि टीआरईडीएस में भुगतान तिथि पर राशि स्वत: कट जाती है और चूक होने पर उसकी सूचना क्रैडिट ब्यूरो तक पहुंच जाती है। इससे छोटे कारोबारियों का पूरा बजट बिगड़ जाता है। उन्हें या तो कर्मचारियों का वेतन रोकना पड़ता है या फिर वे ऊंचे ब्याज पर बाजार से कर्ज उठाते हैं। कम डिजिटल साक्षरता और खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी इस संकट को और बढ़ा देती है।

इन्हीं झंझटों के कारण देश के 7.7 करोड़ असंगठित उद्यमों में से बमुश्किल 10 लाख सूक्ष्म उद्यम ही जीएसटी में पंजीकृत हैं। जीएसटी नेटवर्क के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 70 लाख करदाता ऐसे हैं, जिनका वार्षिक कारोबार एक करोड़ रुपए से कम है। लेकिन जमीनी सर्वेक्षण में वास्तविक रूप से काम कर रहे ऐसे जीएसटी-पंजीकृत प्रतिष्ठानों की संख्या 12 लाख से भी कम मिली। यह भारी अंतर कर चोरी का नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की मजबूरी है। छोटे कारोबारियों को लगता है कि जीएसटी में शामिल होने का मतलब है खुद का गला घोंटना। यही स्थिति छोटे उद्यमियों को एक विचित्र दुविधा में डाल देती है। 

जीएसटी में 180 दिन के भीतर भुगतान न होने पर खरीदार से इनपुट टैक्स क्रैडिट वापस लेने का नियम भी अंतत: सरकार के लिए फायदेमंद है। अगर कोई खरीदार 180 दिन तक भुगतान नहीं करता, तो कानूनन उसे लिया गया टैक्स क्रैडिट 18 प्रतिशत ब्याज के साथ सरकार को लौटाना पड़ता है। यदि सरकार वास्तव में एमएसएमई को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाना चाहती है तो तीन ढांचागत सुधार तुरंत करने होंगे। पहला, एक निश्चित कारोबार सीमा तक के सूक्ष्म उद्यमों को जीएसटी तभी जमा करने की अनुमति मिले, जब भुगतान वास्तव में उनके बैंक खाते में आ जाए। कर वसूली कागजी बिल के बजाय वास्तविक नकदी प्राप्ति पर होनी चाहिए। दूसरा, बेहद सरल और कम इंटरनैट क्षमता पर चलने वाला जीएसटी पोर्टल विकसित किया जाए, जिससे छोटे कारोबारी कमजोर नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी उसका उपयोग आसानी से कर सकें और हर महीने रिटर्न भरने का झंझट कम हो।

बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों के पास इनवॉइस को मंजूरी देने या रोकने का अधिकार नहीं होना चाहिए। 250 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाली कंंपनी के नाम ई-इनवॉइस कटते ही, सिस्टम उसे टीआरईडीएस पर खुद-ब-खुद स्वीकृत मान ले ताकि बैंक खुद-ब-खुद एमएसएमई को तुरंत भुगतान कर सकें। इससे बैंक छोटे कारोबारी को तुरंत पैसा दे सकेंगे और बड़ी कंपनियां प्रक्रिया को रोक नहीं पाएंगी। एमएसएमई वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकते हैं और मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं, बशर्ते सरकार उन्हें इस नीतिगत चक्रव्यूह और दोहरी मार से समय रहते बाहर निकाले।-अजीत रानाडे

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