बुजुर्ग केवल सम्मान, देखभाल और अपनेपन का अहसास चाहते हैं

Edited By Updated: 12 Jan, 2026 05:41 AM

the elderly just want respect care and a sense of belonging

भारत के हर शहर, कस्बे और गांव के बंद दरवाजों के पीछे एक मौन संकट पनप रहा है। यह महंगाई या चुनाव की तरह सुॢखयों में नहीं आता, लेकिन इसकी चोट उतनी ही गहरी होती है। यह संकट है बुजुर्गों के बीच बढ़ती अकेलेपन की भावना और अवसाद (डिप्रैशन)। इनमें से कई वे...

भारत के हर शहर, कस्बे और गांव के बंद दरवाजों के पीछे एक मौन संकट पनप रहा है। यह महंगाई या चुनाव की तरह सुॢखयों में नहीं आता, लेकिन इसकी चोट उतनी ही गहरी होती है। यह संकट है बुजुर्गों के बीच बढ़ती अकेलेपन की भावना और अवसाद (डिप्रैशन)। इनमें से कई वे लोग हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के लिए परिवार, घर और भविष्य बनाने में लगा दिया, सिर्फ इसलिए कि बुढ़ापे में उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। हाल के वर्षों में, मैंने वृद्धाश्रमों में न्यायाधीशों, आई.ए.एस. अधिकारियों और बड़े व्यापारियों को देखा है, जो वर्षों से वहां रह रहे हैं और उनके बच्चों ने उन्हें कोई सहारा नहीं दिया।

पीढिय़ों से भारत को अपने मजबूत पारिवारिक मूल्यों पर गर्व रहा है। माता-पिता का सम्मान किया जाता था, बड़ों की देखभाल होती थी और संयुक्त परिवार यह सुनिश्चित करते थे कि कोई भी अकेला या भूखा न सोए। आज, वह सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। आॢथक दबाव, पलायन, बदलती जीवनशैली और कुछ मामलों में घोर उपेक्षा और स्वार्थ ने हजारों बुजुर्गों को भावनात्मक और वित्तीय संकट में धकेल दिया है। कई माता-पिता प्यार और भरोसे में आकर अपनी संपत्ति बेटे या बेटियों के नाम कर देते हैं, यह मानकर कि इससे बुढ़ापे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी। इसकी बजाय, कुछ खुद को कमरे के एक कोने में धकेल दिया हुआ पाते हैं, उनके साथ एक बोझ की तरह व्यवहार किया जाता है या उससे भी बुरा, उन्हें घर छोडऩे के लिए कह दिया जाता है। उनके अपने घरों पर उनके बच्चों का कब्जा है, जो जिम्मेदारी लेने से इंकार करते हैं।

इससे भी अधिक दुखद उन बच्चों की कहानियां हैं, जो बेहतर जीवन की तलाश में विदेश चले गए और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि विदेश में रहने वाले सभी बच्चे अपने माता-पिता को नहीं छोड़ते लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसा करती है। बूढ़े माता-पिता सीमित पैंशन, बढ़ते मैडीकल बिल और बिना किसी भावनात्मक सहारे के पीछे छूट जाते हैं। फोन कॉल दुर्लभ हो जाते हैं, मुलाकातें पूरी तरह बंद हो जाती हैं और माता-पिता धीरे-धीरे अलगाव में चले जाते हैं। त्यौहार अकेले बीतते हैं। बीमारी का सामना बिना किसी मदद के करना पड़ता है। कई बार तो उनकी मृत्यु हो जाती है और शव कई दिनों बाद मिलते हैं। अंतिम संस्कार के लिए भी बच्चे नहीं आते। मैं कहूंगी कि वे बच्चे बहुत अभागे हैं।

अकेलापन सिर्फ एक भावनात्मक मुद्दा नहीं, यह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक अकेलापन अवसाद, चिंता, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और यहां तक कि असामयिक मृत्यु का कारण बन सकता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए, विशेष रूप से जो पहले से ही उम्र से संबंधित बीमारियों से जूझ रहे हैं, भावनात्मक उपेक्षा उनकी शारीरिक पीड़ा को और बदतर बना देती है। बुजुर्गों में अवसाद अक्सर अनदेखा रह जाता है क्योंकि इसे ‘बुढ़ापे का स्वभाव’ या मूड सिं्वग मान लिया जाता है। वित्तीय असुरक्षा दर्द की एक और परत जोड़ देती है। कई बुजुर्ग थोड़ी पैंशन या बचत पर निर्भर होते हैं, जो चिकित्सा खर्चों के कारण जल्दी खत्म हो जाती है। जब बच्चे मदद करने से इंकार कर देते हैं, तो माता-पिता को दवाओं और भोजन के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कुछ लोग सामाजिक कलंक या अपने ही बच्चों के खिलाफ कानूनी लड़ाई के डर से शिकायत करने या अधिकारियों के पास जाने में हिचकिचाते हैं। 

भारत में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम’ जैसे कानून हैं, जो बच्चों के लिए अपने माता-पिता की देखभाल करना कानूनी कत्र्तव्य बनाते हैं। हालांकि, कागज पर बने कानून हमेशा जमीन पर राहत नहीं देते। कानूनी प्रक्रियाएं धीमी हैं और कई बुजुर्ग भावनात्मक रूप से अपने बच्चों को अदालत में घसीटने के इच्छुक नहीं होते। वे जो चाहते हैं, वह है सम्मान, देखभाल और अपनेपन का अहसास, न कि सजा। यही वह जगह है जहां सरकार को अधिक मजबूती और संवेदनशीलता से कदम उठाना चाहिए। वृद्धाश्रमों को परित्याग के स्थान के रूप में नहीं, बल्कि देखभाल, साथ और सम्मान के सुरक्षित स्थानों के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार द्वारा समर्थित वृद्धाश्रम, जिनमें उचित चिकित्सा सुविधाएं हों, केवल बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि हर जिले में अत्यंत आवश्यक हैं। इनमें नियमित स्वास्थ्य जांच, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, पौष्टिक भोजन और स्वच्छ रहने की स्थिति होनी चाहिए। चिकित्सा देखभाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कई बुजुर्ग बीमारियों से पीड़ित हैं और अस्पतालों तक लंबी दूरी तय करना उनके लिए कठिन और महंगा है। क्लीनिकों या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े वृद्धाश्रम समय पर उपचार सुनिश्चित कर सकते हैं और कष्टों को कम कर सकते हैं। 

आश्रय और दवा से परे, साथ (कंपैनियनशिप) मायने रखता है। सामूहिक भोजन, प्रार्थना सत्र, वाचनालय, योग, संगीत और हल्का मनोरंजन जैसी गतिविधियां जीवन के उद्देश्य को वापस ला सकती हैं। जब बुजुर्ग अपनी उम्र के लोगों के साथ बातचीत करते हैं, अपनी कहानियां सांझी करते हैं और खुद को सुना हुआ महसूस करते हैं, तो अकेलेपन के खिलाफ आधी जंग जीत ली जाती है। सरकार समुदाय-आधारित सहायता प्रणालियों को भी प्रोत्साहित कर सकती है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए ‘डे-केयर सैंटर’, जहां वे दिन के समय वक्त बिता सकें और शाम को घर लौट सकें, उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है जो अभी भी परिवार के साथ रहते हैं लेकिन उपेक्षित महसूस करते हैं। एक और महत्वपूर्ण कदम वित्तीय सुरक्षा है। वृद्धावस्था पैंशन बढ़ाना और समय पर भुगतान सुनिश्चित करना एक बड़ा बदलाव ला सकता है। सरल प्रक्रियाएं, डोरस्टैप बैंकिंग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए हैल्प डैस्क शोषण और भ्रम को रोक सकते हैं। 

हालांकि, समाज को भी अपने भीतर झांकना होगा। हमें उन सफलता की कहानियों का महिमामंडन करना बंद करना चाहिए, जो माता-पिता द्वारा चुकाई गई कीमत को नजरअंदाज करती हैं। बच्चों को याद रखना चाहिए कि उन्हीं माता-पिता ने कभी उन्हें पालने के लिए अपने आराम, नींद और सपनों का त्याग किया था। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना कोई दान नहीं, यह जिम्मेदारी और कृतज्ञता है। स्कूलों-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में बुजुर्गों की देखभाल, सहानुभूति और पारिवारिक जिम्मेदारी पर चर्चा शामिल होनी चाहिए।  अंत में, एक समाज अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह उसकी नैतिक शक्ति को दर्शाता है। वरिष्ठ नागरिक अतीत के अवशेष नहीं, वे अनुभव और ज्ञान के जीवित पुस्तकालय हैं। उन्हें अवसाद और गरीबी में डूबने देना हमारी सामूहिक विफलता है। भारत तेजी से बूढ़ा हो रहा है। यदि हम अभी कार्य नहीं करते, तो आज की मध्यम आयु वर्ग की आबादी को कल उसी नियति का सामना करना पड़ सकता है। भारतीयों के रूप में हम कर्म में दृढ़ विश्वास रखते हैं। जैसा आप बोएंगे, वैसा ही काटेंगे। किसी भी माता-पिता को देखभाल के लिए भीख नहीं मांगनी पड़े। किसी भी बुजुर्ग को डर और बीमारी में अकेले नहीं सोना चाहिए। राष्ट्र उनका ऋणी है और उन्हें मौन से कहीं अधिक मिलना चाहिए।-देवी एम. चेरियन        

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