Edited By ,Updated: 25 Jan, 2026 05:57 AM

फैज अहमद फैज की यह रचना उन द्वारा लिखी ‘जेल डायरी’ से प्रेरित है। ये पंक्तियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के बावजूद एक शायर व लेखक के हौसले को दर्शाती हैं। 1950 के दशक के बाद फैज अहमद फैज को उनके प्रगतिशील, क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के...
मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है,
कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने,
जुबां पे मोहर लगी है तो क्या,
कि रख दी है हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबां मैंने।
फैज अहमद फैज की यह रचना उन द्वारा लिखी ‘जेल डायरी’ से प्रेरित है। ये पंक्तियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी के बावजूद एक शायर व लेखक के हौसले को दर्शाती हैं। 1950 के दशक के बाद फैज अहमद फैज को उनके प्रगतिशील, क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के कारण सत्ताधारी ताकतों द्वारा बार-बार निशाना बनाया गया और उनकी लेखनी पर पाबंदी लगाई गई लेकिन वह हमेशा अपनी कलम से आवाज उठाते रहे।
शायरों, लेखकों, सम्पादकों पर हकूमतों द्वारा उनकी आवाज दबाना कोई नई बात नहीं है और जब-जब अत्याचार हुए, राज करने वाले राजाओं को बाद में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े थे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि राजा खत्म हो गए, परंतु सच्चाइयां आज भी जिंदा हैं।
‘पंजाब केसरी’ समाचार पत्र समूह पर वर्तमान हकूमत द्वारा सच्चाई न सुन पाने पर जो दमनकारी नीति अपनाई गई है, ये चालें पुरानी हो चुकी हैं। आज सोशल मीडिया का जमाना है। सच्चाई सबके सामने है। शीश महल संबंधी एक खबर के प्रकाशन पर तिलमिलाहट क्यों, वह भी, जब दूसरा पक्ष भी प्रकाशित किया गया हो।
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है।
‘पंजाब केसरी’ के संस्थापक संपादक लाला जगत नारायण जी और रमेश चंद्र जी को आतंकवाद के खिलाफ देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा था। पत्रकारों की कुर्बानियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत के विभिन्न प्रांतों में लिखने या बोलने पर 9 पत्रकारों की हत्या कर दी गई और 33 पर हमले हुए। आवाज अब भी दबाई नहीं जा सकती।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली प्रैस की भूमिका सिर्फ खबरें देना भर नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना और जनता की आवाज बनना भी है। लेकिन जब-जब प्रैस की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है, तब-तब यह सिर्फ पत्रकारिता पर हमला नहीं होता, बल्कि पूरे लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचती है।
राहत इंदौरी का यह शे’र भी याद रखना चाहिए-
शाखाओं से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम,
आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे।
जब पत्रकार डर के माहौल में काम करने लगते हैं, जब सच्ची खबरों पर रोक लगाई जाती है, जब सवाल पूछने वालों को धमकाया या बदनाम किया जाता है, तब समाज धीरे-धीरे अंधेरे की ओर बढऩे लगता है।
उर्दू के शायर इकबाल अशहर का यह शे’र :
यही जूनून यही एक ख्वाब मेरा है,
मैंं वहां चिराग जला दूं जहां अंधेरा है,
तेरी रजा भी तो शामिल थी मेरे बुझने में,
मैं जो जल उठा हूं तो यह कमाल भी तेरा है।
आज कई जगह यह देखने को मिल रहा है कि प्रैस पर दबाव बनाया जा रहा है-कभी विज्ञापनों के जरिए, कभी सरकारी एजैंसियों के दुरुपयोग के जरिए, कभी कानूनी शिकंजे के जरिए और कभी डर व धमकियों के माध्यम से। कुछ मामलों में तो सच लिखने की कीमत जेल, मुकद्दमे या हमलों के रूप में चुकानी पड़ रही है। यह स्थिति बेहद ङ्क्षचताजनक है, क्योंकि अगर प्रैस ही स्वतंत्र नहीं रहेगी, तो आम आदमी की आवाज कौन उठाएगा?
इस बात की नौबत न आ जाए,
वो जो ख्वाब थे मेरे जेहन में,
न मैं कह सका न लिख सका,
कि जुबां मिली तो कटी हुई,
कि कलम मिला तो बिका हुआ।
प्रैस की आजादी का मतलब यह नहीं कि वह निरंकुश हो जाए, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह बिना डर और दबाव के सच दिखा सके। सत्ता की आलोचना करना, गलत नीतियों को उजागर करना और जनहित के मुद्दों को सामने लाना ही पत्रकारिता का असली धर्म है।
असली धर्म निभाया है ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप ने। दो मुख्य संपादकों द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदान का दूसरा शायद ही कहीं कोई उदाहरण हो। आतंकवाद के खिलाफ लिखना और उनको सरेआम सरे बाजार दिन दिहाड़े गोलियों से शहीद कर देना और इसके बावजूद आतंकवाद के आगे घुटने न टेकना पत्रकारिता का सच्चा धर्म है।
आतंकवाद के खिलाफ न लिखकर भी वे अपनी जान बचा सकते थे, परन्तु उन्होंने पत्रकारिता के उच्च मानदंडों के साथ समझौता नहीं किया, कलम उसकी किसी दरबार की जागीर नहीं, किसी के आगे झुकना हमारी तासीर (मूल स्वभाव) नहीं। ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप ने पत्रकारिता के अतिरिक्त जो समाज सेवा का बीड़ा उठाया है, वह भी अपने आप में मिसाल है। कहा जाता है कि पत्रकार पीड़ित मानवता का वकील होता है, जो अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की आवाज सरकार के कानों तक बुलंद करता है।
‘पंजाब केसरी’ के संचालकों द्वारा चलाया जा रहा ‘शहीद परिवार फंड’ अपने आप में एक वल्र्ड रिकार्ड है, क्योंकि इतने लंबे समय तक शायद समाचार पत्र के माध्यम से कोई भी सेवा प्रोजैक्ट नहीं चलाया गया। इसके अतिरिक्त देश के किसी भी प्रांत में आई प्राकृतिक आपदाओं में रिलीफ फंड चलाना, प्रधान संपादक पद्मश्री विजय कुमार चोपड़ा द्वारा इस क्षेत्र के विभिन्न नगरों में जाकर सेवा प्रोजैक्टों में भाग लेना व लोगों को प्रेरित करना अपने आप में एक अनूठा उदाहरण है।
वैल्फेयर प्रोजैक्टों के बावजूद यदि वर्तमान हकूमत द्वारा ‘पंजाब केसरी’ ग्रुप पर दमनकारी नीति अपनाई जा रही है तो फिर इसका जवाब अवाम पर ही छोड़ देना चाहिए।-प्रफुल्ल चंद्र नागपाल