Edited By ,Updated: 18 Oct, 2026 04:09 AM

जून 2026 से छात्रों और उनके संगठनों द्वारा देश भर में किए गए हालिया विरोध प्रदर्शनों ने सरकारों के कड़े रुख के साथ मिलकर, एक बार फिर छात्र आंदोलनों और उनके परिणामों पर ध्यान केंद्रित किया है। इसलिए छात्र संगठनों और आंदोलनों के एक संक्षिप्त इतिहास पर...
जून 2026 से छात्रों और उनके संगठनों द्वारा देश भर में किए गए हालिया विरोध प्रदर्शनों ने सरकारों के कड़े रुख के साथ मिलकर, एक बार फिर छात्र आंदोलनों और उनके परिणामों पर ध्यान केंद्रित किया है। इसलिए छात्र संगठनों और आंदोलनों के एक संक्षिप्त इतिहास पर नजर डालना समीचीन होगा। 1960 से 1990 के दशकों में दुनिया भर में छात्र आंदोलन देखे गए। भारत में भी छात्रों द्वारा कई आंदोलन चलाए गए, जिनमें से कुछ धर्मनिरपेक्ष थे और कुछ सांप्रदायिक या भाषाई।
1968 के पैरिस छात्र विद्रोह ने यूरोप के युवाओं की कल्पना को झकझोर कर रख दिया। इसने ‘यथास्थिति’ में बदलाव के लिए युवाओं की तड़प का प्रतिनिधित्व किया। इसने वामपंथी राजनीति, युद्ध-विरोधी भावना, नागरिक अधिकारों पर जोर और एक ऐसी जवाबी संस्कृति को मुख्यधारा में ला खड़ा किया, जिसने 1970 के दशक के हिप्पी आंदोलन में अपनी अभिव्यक्ति पाई। पैरिस में यह उभार प्राग सिं्प्रग, चैकोस्लोवाकिया में स्वतंत्रता की एक संक्षिप्त खिड़की, के साथ मेल खाता था। यह कम्युनिस्ट कुशासन के खिलाफ 1956 में हंगरी में हुई क्रांति के 12 साल बाद आया था। इन दोनों विरोध प्रदर्शनों को तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा अपनी-अपनी राजधानियों में सोवियत टैंक उतारकर बेरहमी से कुचल दिया गया था।
मैक्सिको, ब्राजील, अर्जेंटीना से लेकर चिली तक पूरे लैटिन और दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में 1960 और 70 के दशक में छात्रों ने विश्वविद्यालय स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पुलिस दमन और सैन्य तानाशाही जैसे मुद्दों पर अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ रैलियां कीं और रोष प्रकट किया। एशियाई परिसर भी अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ सुलग रहे थे। स्वतंत्रता के बाद के भारत ने चार बड़े छात्र आंदोलन देखे, जिनके चार बेहद अनोखे परिणाम सामने आए। 1965 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन को सी.एन. अन्नादुराई, मुथुवेल करुणानिधि (कलैग्नार) और तमिल बौद्धिक और सांस्कृतिक समुदाय के अन्य प्रमुख व्यक्तियों का समर्थन प्राप्त था। इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन कांग्रेस सरकार बेदखल हुई और एक ‘द्रविड़ द्वैध शासन’ की स्थापना हुई, जिसे 6 दशक बाद 2026 के विधानसभा चुनावों में अभिनेता सी. जोसेफ विजय की जीत ने ही तोड़ा। इसके विपरीत, उत्तर भारत में ‘अंग्रेजी हटाओ आंदोलन’ नामक अंग्रेजी-विरोधी आंदोलन ने, जिसे डा. राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसों का समर्थन प्राप्त था, समाजवादियों और दक्षिणपंथियों को एक साथ ला खड़ा किया। इसने 1967 के राज्य विधानसभा चुनावों में पहली संयुक्त विधायक दल सरकारों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
1974 में गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन ने चिमनभाई पटेल सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह जल्द ही जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले संपूर्ण क्रांति आंदोलन में तबदील हो गया। इसके बाद 1975 में आपातकाल और फिर 1977 में जनता पार्टी की सरकार की स्थापना हुई। 1980 के दशक में ऑल-असम स्टूडैंट्स यूनियन (ए.ए.एस.यू.) द्वारा बंगलादेश से आए प्रवासियों के खिलाफ एक शक्तिशाली आंदोलन चलाया गया, जिसने ऑल असम गण संग्राम परिषद (ए.जी.एस.यू.) का गठन किया। 15 अगस्त, 1985 के असम समझौते के बाद इसने असम गण परिषद (ए.जी.पी.) की सरकार को अस्तित्व में ला दिया। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ आंदोलन के दौरान 63 से अधिक छात्रों ने आत्मदाह कर लिया और पुलिस फायरिंग में 50 से अधिक मारे गए। इसके कारण विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार सत्ता से बाहर हो गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण, उदारीकरण और वाशिंगटन सहमति के साथ इसके संरेखण ने युवाओं के लिए कई नए रास्ते खोल दिए। अब पारंपरिक पेशे और राष्ट्रीय राजनीति के प्रवेश द्वार के रूप में छात्र राजनीति ही बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण, भौतिक रूप से संतोषजनक या सार्वजनिक मंचों पर दृश्यता प्रदान करने वाले करियर का एकमात्र साधन नहीं रह गई थी। 1992 में केबल और सैटेलाइट टैलीविजन के आगमन के साथ निजी उद्यमों के लिए प्रसारण क्षेत्र के खुलने ने उन युवाओं को एक मंच प्रदान किया, जो सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी आवाज और पहचान दोनों की चाह रखते थे। 1991 के बाद के भारत द्वारा पेश किए गए नए अवसरों के मद्देनजर करियर को लेकर सजगता मुख्य प्रेरक शक्ति बन गई। छात्र अब छात्र राजनीति को समय की बर्बादी मानने लगे हैं और शायद सही भी। 1980 और 90 के दशक में एन.एस.यू.आई के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बाद में इंटरनैशनल यूनियन ऑफ स्टूडैंट्स (आई.यू.एस.) के अध्यक्ष के रूप में, मैंने इन बदलावों को वास्तविक समय में घटते देखा है। ये ऐसे रुझान हैं जो पिछले साढ़े 3 दशकों से लगातार कायम हैं।
क्या नीट और एस.आई.आर. पर छात्रों और युवाओं का यह नवीनतम रोष इस गैर-राजनीतिक ढांचे को तोड़ पाएगा, इस पर फैसला आना अभी बाकी है। किसी भी आंदोलन की कसौटी उसका अंतिम परिणाम ही होता है। सड़क पर केवल शक्ति प्रदर्शन के रूप में लामबंदी महज आत्म-संतुष्टि है।-मनीष तिवारी (वकील, सांसद एवं पूर्व मंत्री)