युद्ध ने ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का ढोंग उजागर किया

Edited By Updated: 28 Mar, 2026 05:28 AM

the war exposed the pretense of self reliance in the energy sector

सरकारी विभागों के छोटे से लेकर बड़े से बड़े अधिकारियों और नीचे से लेकर ऊपर तक के नेताओं ने इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि भारत आत्मनिर्भर हो गया है और देश तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है।

सरकारी विभागों के छोटे से लेकर बड़े से बड़े अधिकारियों और नीचे से लेकर ऊपर तक के नेताओं ने इस बात को जोर-शोर से प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि भारत आत्मनिर्भर हो गया है और देश तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का वक्तव्य कि वर्तमान चुनौती कोरोना काल की तरह है और सब को मिलकर इसका सामना करना है, से आशंका होती है कि वास्तविकता क्या है? प्रश्न यह है कि यदि हमारी ईंधन, बिजली आपूर्ति और गैर पारंपरिक स्रोतों से ऊर्जा उत्पन्न करने की नीतियां सही होतीं तो हम न केवल अपनी सभी आवश्यकताएं पूरी कर रहे होते, बल्कि जो देश युद्ध के दौरान इस संकट से जूझ रहे हैं, उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा बेचकर मुनाफा कमा रहे होते?

गलती कहां हुई : हमारे सर्वज्ञानी प्रशासक और भविष्य का अनुमान लगाने में माहिर नेतृत्व इस विषय में कुछ सोच ही नहीं सका और यह तो अब जनता को पता चल रहा है कि हम 41 देशों से प्रार्थना कर रहे हैं कि अपना तेल मुंह मांगे दाम पर हमें दे दो, वर्ना हम तो कोरोना काल की तरह असहाय हो जाएंगे। देश में तेल, गैस और अन्य वस्तुओं की कमी महसूस होने लगी है, सिलैंडर के लिए लाइनें और मारपीट शुरू हो गई है और इसका असर उन पर अधिक पड़ रहा है, जो छोटे सिलैंडर से अपनी जरूरतें पूरी करते थे, पाइपलाईन से गैस मिलना उनकी किस्मत में नहीं है और अब मिट्टी के तेल और लकड़ी से जलने वाले चूल्हे खोज रहे हैं। पैसे वालों ने बिजली से चलने वाले उपकरण खरीद लिए और मार्कीट में अब उनका भी टोटा है।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत : सन् 1970 में भी तेल का संकट हुआ था। तब विश्व के दूरदर्शी नेताओं ने सोचा कि अगर तेल मिलना बंद हो गया तो क्या होगा? उस समय अनेक देशों ने इस बात की गंभीरता समझकर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों से बिजली बनानी शुरू की और आज उन देशों में 10 प्रतिशत के लगभग पैट्रोलियम पदार्थों का उपयोग होता है और हम 90 प्रतिशत तक तेल उत्पादक देशों पर निर्भर हैं। 

उल्लेखनीय है कि भारत में प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में सौर, पवन, जल और अवशिष्ट पदार्थों के अक्षय भंडार हैं। मौसम की विशेष कृपा है। ये ऐसे साधन हैं जो कितना भी इस्तेमाल करो, जरा भी कम नहीं होंगे। इसे देखते हुए 1980 में पहल की गई कि अलग से एक विभाग हो, जो इनके उपयोग के बारे में सटीक जानकारी दे और उसके आधार पर योजनाबद्ध तरीके से नवीन ऊर्जा स्रोतों से विद्युत उत्पादन किया जाए और हम तेल की खपत कम कर सकें। इस बात को 50 से अधिक वर्ष हो गए और हम इन संसाधनों को न तो पूर्ण रूप से विकसित कर पाए और न ही दूसरे देशों पर निर्भरता कम कर पाए। वजह बताई गई कि तेल आयात करना अपने यहां के कुदरती खजाने का इस्तेमाल करने से सस्ता है। कमाल की सोच थी, अद्भुत दूरंदेशी और बेमिसाल नीति, जो इस कहावत को चरितार्थ करे कि ‘बगल में छोरा और शहर में ढिंढोरा’।

इससे भी ज्यादा खतरनाक यह था कि इन ऊर्जा स्रोतों को इतना महंगा कर देना कि आम नागरिक नहीं, विलासिता का जीवन जीने वाले ही उनके उपयोग की क्षमता रखते हों। उदाहरण के लिए किसी ने बैटरी से चलने वाली कार या कोई अन्य वाहन खरीदा तो बैटरी चाॄजग का दूर-दूर तक कोई इंतजाम नहीं। इनके मैकेनिक मिलना आसान नहीं और एक बार खराबी हुई तो कबाड़ में बेचना पड़ सकता है। सौर ऊर्जा का उपयोग करने की अनेक तकनीकें विकसित हुईं ताकि गांव-देहात की गलियां, सड़कें और घर कभी अंधेरे का शिकार न हों। उम्मीद थी कि पवन ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बड़ी-बड़ी बांहों वाले पंखे रेल या हवाई यात्रा के दौरान दिखाई देंगे लेकिन आज शायद ही इन्हें देखने का सौभाग्य किसी को मिलता होगा। इसी तरह वर्षा यानी जल संरक्षण कर हाइड्रो ऊर्जा प्राप्त करने के संयंत्र हर गांव नगर में लगाए जाते तो आज तेल के दामों से परेशान नहीं होते। 

हरित ऊर्जा क्रांति हो : हरित ऊर्जा के उत्पादन से देश को आत्मनिर्भर बनाना ऐसा अवसर है कि हम अपनी जरूरतों को तो पूरा करते ही हैं, साथ में उन देशों को भी अंधेरे से बचा सकते हैं जो तेल की कमी से जूझ रहे हैं लेकिन यह हो न सका। परिवहन और यातायात तथा किसी भी साधन से यात्रा करने के लिए पैट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता का अर्थ है कि यदि सप्लाई रुकी तो सब कुछ ठप्प हो जाएगा। अगर हम प्राकृतिक स्रोतों के इस्तेमाल की सही नीति बना लेते तो वर्तमान संकट नहीं होता। जो तेल उत्पादक देश हैं, उनके भंडारों और संस्थानों के तबाह होने की स्थिति में भारत की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान होगा, इसका अनुमान प्रधानमंत्री तथा संबंधित विभागों के मंत्रियों के वक्तव्यों से साफ तौर से झलकता है। 

यह छलावा है कि पैट्रोलियम पदार्थों के सस्ता होने के कारण वैकल्पिक ऊर्जा को महंगा रखा जाए। आज इस गलती का अहसास हो रहा है। सरकार ने धूप, हवा, पानी की ताकत को व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल के लिए समयबद्ध तरीके से योजनाएं बनाई होतीं तो आज उनका असर होता। हम तेल से लगने वाली आग से बच सकते हैं अगर देश सोलर पावरहाऊस बन सके। पैट्रोलियम की जगह विद्युतीकरण की लहर चलानी होगी। इनके उपयोग को प्रोत्साहन देने, सबसिडी का लालच देकर लुभाने की बजाय सरकार को नियम बनाने होंगे कि अब सब कुछ उस बिजली से चलेगा, जो सौर ऊर्जा कहलाती है। जलशक्ति का सही उपयोग और कूड़े-कचरे से गैस बनाने के प्लांट हर गली कूचे में लगाने के लिए नागरिकों को प्रेरित करना होगा। जो नहीं हुआ उसे अब तो करिए, वर्ना देश आत्मनिर्भर नहीं होगा। भाषणों पर राशन लगाइए और देश के वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का पूरा लाभ उठाने की नीति बनाकर उस पर अमल करने का काम कीजिए।-पूरन चंद सरीन
 

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