एक खुले बजट की ओर

Edited By Updated: 25 Jan, 2026 05:52 AM

towards an open budget

बजट की गोपनीयता की रस्म, जो औपनिवेशिक काल के रहस्य में लिपटी हुई है और बदनाम ‘बजट बंकर’ द्वारा दर्शाई गई नाटकीय सख्ती के साथ लागू की जाती है, 21वीं सदी के लोकतंत्र में एक पुरानी बात लगती है, जो पारदॢशता और भागीदारी वाली शासन व्यवस्था के लिए कोशिश कर...

बजट की गोपनीयता की रस्म, जो औपनिवेशिक काल के रहस्य में लिपटी हुई है और बदनाम ‘बजट बंकर’ द्वारा दर्शाई गई नाटकीय सख्ती के साथ लागू की जाती है, 21वीं सदी के लोकतंत्र में एक पुरानी बात लगती है, जो पारदॢशता और भागीदारी वाली शासन व्यवस्था के लिए कोशिश कर रहा है। यह परंपरा, जिसमें केंद्रीय बजट संसद में तय दिन पर ही खोला जाता है, समझदारी भरे आॢथक प्रबंधन का स्तंभ कम और पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता का अवशेष ज्यादा है।

इस अवधारणा के जनक रॉबर्ट वालपोल थे, जो ब्रिटेन के पहले प्रधानमंत्री थे (और अपने प्रधानमंत्रित्व काल में चांसलर ऑफ एक्सचेकर भी थे)। 1733 में, वालपोल के विरोधियों ने उनके टैक्स प्रस्तावों का मजाक उड़ाते हुए उन्हें जादूगर की चाल बताया और ‘द बजट ओपन्ड’ शीर्षक से एक पैम्फलेट प्रकाशित किया, जिसमें वित्तीय योजना को ‘चालों की थैली’ से प्रकट किया गया एक ‘महान रहस्य’ बताया गया था। वालपोल और तब से हर चांसलर ने अपने वित्तीय प्रस्तावों की गोपनीयता का इस्तेमाल सट्टेबाजी वाले बाजार के हितों की रक्षा करने की बजाय संसदीय विरोधियों को मात देने और जनता के गुस्से को कम करने के लिए किया। इस प्रथा को ब्रिटिश भारत में लाया गया और तेज किया गया, जहां बजट लोकतांत्रिक बातचीत का नहीं, बल्कि शाही शोषण का एक उपकरण था। आज के नॉर्थ ब्लॉक का बजट बंकर औपनिवेशिक किलेबंदी वाली मानसिकता का सीधा वंशज है।

इस गोपनीयता के क्लासिक तर्क आधुनिक संदर्भ में कमजोर हैं। रियल-टाइम डाटा एनालिटिक्स, एल्गोरिदमिक ट्रेङ्क्षडग और वैश्विक पूंजी प्रवाह के युग में, यह धारणा कि कुछ हफ्तों की गुप्त तैयारी बाजारों को प्रभावी ढंग से ‘हैरान’ कर सकती है, भोली है। इसकी बजाय, जटिल वित्तीय और टैक्स उपायों की अचानक, बड़े पैमाने पर घोषणा अक्सर अस्थिरता पैदा करती है क्योंकि बाजार बिना किसी विश्लेषक की पहले की जांच या चरणबद्ध बहस के सैंकड़ों पन्नों की घनी नीति को समझने की कोशिश करते हैं। यह जिस असली सट्टेबाजी को बढ़ावा देता है, वह राजनीतिक किस्म की होती है-उन्मादी मीडिया अटकलें और लॉबिस्टों की फुसफुसाहट वाली मुहिम, जो सूचना के अभाव में पनपती है। इसके अलावा, यह दावा कि गोपनीयता अनुचित लाभ को रोकती है, खोखला है, जब हम यह सोचते हैं कि परिष्कृत कॉर्पोरेट संस्थाओं के पास आम नागरिक या छोटे व्यवसाय की तुलना में तत्काल बजट घोषणा का विश्लेषण करने और उस पर प्रतिक्रिया करने के लिए हमेशा अधिक संसाधन होते हैं। 

स्वीडन, नीदरलैंड्स और जर्मनी जैसे देश ओपन बजट बनाने के सिद्धांतों पर काम करते हैं। मुख्य पैरामीटर - वित्तीय सीमाएं, प्रमुख नीति दिशा, राजस्व पूर्वानुमान महीनों पहले प्रकाशित किए जाते हैं और उन पर बहस होती है। फ्रांस भी एक पारिभाषित मल्टी-ईयर वित्तीय ढांचे के भीतर बजट पर एक व्यापक सार्वजनिक और संसदीय चर्चा करता है। विधायिका सालाना तमाशे के लिए एक निष्क्रिय दर्शक बनने की बजाय शासन में एक भागीदार बन जाती है। ऐसी पारदॢशता का सीधा संबंध उच्च क्रैडिट रेटिंग, कम उधार लागत और अधिक वित्तीय स्थिरता से है - ऐसे परिणाम, जिनकी भारत को सख्त जरूरत है।

भारत के लिए ऐसे मॉडल की ओर बढऩे के फायदे बहुत ज्यादा हैं। सबसे पहले, यह कार्यपालिका पर एक मजबूत अनुशासन लागू करता है। दूसरा, यह ठोस पॉलिसी में तालमेल को बढ़ावा देता है। जब बड़ी पहल, चाहे वह कोई नई वैल्फेयर स्कीम हो या डिफैंस मॉडर्नाइजेशन प्लान, बजट से पहले के बयान में बताई जाती हैं, तो संसदीय समितियां हितधारकों से चर्चा कर, उनकी व्यवहार्यता का आकलन और लंबे समय के राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ तालमेल का मूल्यांकन कर सकती हैं। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह राजनीतिक रूप से तय किए गए आॢथक पैकेजों के लगातार विवाद को खत्म कर देगा। अगर इन आबंटनों पर खुले बजट फ्रेमवर्क के हिस्से के रूप में चर्चा की जाती है, तो उनका जरूरत, प्रदर्शन और समानता के वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है, जिससे उन्हें ज्यादा वैधता मिलेगी।

भारत के लिए आगे का रास्ता धीरे-धीरे, सोच-समझकर कैलिब्रेटेड खुलापन अपनाना है। यह प्रक्रिया बजट दिवस से दो-तीन महीने पहले एक अनिवार्य प्री-बजट वित्तीय रणनीति विवरण के साथ शुरू हो सकती है। साथ ही, टैक्स प्रस्तावों पर एक तकनीकी दस्तावेज एडवांस रूलिंग अथॉरिटी और विशेषज्ञों के एक चुनिंदा पैनल के साथ कड़ी गोपनीयता के तहत सांझा किया जा सकता है ताकि प्रशासनिक व्यवहार्यता की जांच की जा सके और केवल सटीक दर परिवर्तनों की घोषणा उसी दिन की जाए।  अब समय आ गया है कि हम अपनी वित्तीय योजना के केंद्र में सूचित बहस की रोशनी लाएं, क्योंकि जैसा कि जस्टिस लुई ब्रैंडिस की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं, धूप सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। राष्ट्र का वित्तीय स्वास्थ्य और उसके लोकतंत्र की अखंडता इससे कम कुछ भी नहीं मांगती।-मनीष तिवारी(वकील, सांसद एवं पूर्व मंत्री)
 

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