रायपुर में जो हो न सका

Edited By Updated: 02 Mar, 2023 04:46 AM

what could not happen in raipur

रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस का लोकतांत्रिक चेहरा सामने आया, ऐसा कुछ लोगों का कहना है।

रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस का लोकतांत्रिक चेहरा सामने आया, ऐसा कुछ लोगों का कहना है। इसके लिए वे तीन तर्क देते हैं। एक, अब कांग्रेस का अध्यक्ष गांधी-नेहरू परिवार से नहीं है। दो, अब कार्यसमिति में आधे सदस्य दलित, महिला, आदिवासी, अल्पसंख्यक, युवा वर्ग से होंगे। तीन, अधिवेशन में तमाम मुद्दों पर खुलकर बात हुई। सबको अपनी बात रखने का भरपूर मौका दिया गया लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही था या फिर कांग्रेस बहुत कुछ कहने के साथ-साथ बहुत कुछ छुपा भी गई?

यहां चार प्रमुख बातें सामने रखी जा रही हैं। एक, एक परिवार एक टिकट और एक व्यक्ति एक पद को भुला दिया गया। दो, कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लडऩे के लिए अब 10 की जगह 100 प्रस्तावकों के हस्ताक्षर जरूरी कर दिए गए हैं। तीन, कांग्रेस नेता जी 23 ग्रुप की संसदीय बोर्ड फिर से गठित करने की सिफारिश गोलमोल कर गए अपितु केंद्रीय चुनाव समिति के लिए तैयार हो गए। चार, कार्यसमिति के सदस्यों की संख्या तो बढ़ाई गई लेकिन चुनाव करवाने की हिम्मत नहीं कर सके ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तंज कसा कि रायपुर में बुजुर्ग मल्लिकार्जुन खरगे धूप में खड़े थे और सोनिया गांधी पर छतरी तानी गई थी। इससे साफ होता है कि कांग्रेस में असली ताकत किसके हाथ में है। खरगे ने तंज के जवाब में तंज कसा कि मोदी जी को यह बताना चाहिए कि अडानी जी को अपनी छतरी में क्यों रखा हुआ है। बात आई-गई हो गई लेकिन बड़ा सवाल उठता है कि क्या वास्तव में अभी भी आलाकमान यानी सोनिया-राहुल-प्रियंका की ही चल रही है।

यहां तक कि कार्यसमिति में पूर्व अध्यक्षों को स्थायी सदस्य इसलिए बना दिया गया ताकि सोनिया और राहुल को एडजस्ट किया जा सके। एक परिवार एक पद को भी क्या इसलिए हाशिए पर डाला गया ताकि गांधी- नेहरू परिवार को इसकी जद से दूर किया जा सके। हालांकि 5 साल तक सियासत में सक्रिय नेताओं और पी.सी.सी. अध्यक्षों के मामले में पहले से ही छूट दी जा चुकी थी लेकिन एक परिवार एक पद पर जोर दिया जाता तो भाजपा के निशाने पर फिर गांधी-नेहरू परिवार आता और मोदी को फिर एक तंज कसने का मौका मिल जाता।

सबसे हैरानी की बात है कि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के लिए अब से उम्मीदवार को 10 की जगह 100 पी.सी.सी. प्रस्तावकों का समर्थन जुटाना होगा। कहा जा रहा है कि भले ही गांधी-नेहरू परिवार ने खुद को इससे अलग कर लिया हो लेकिन वह चाहता है कि उनके किसी वफादार को ही इसकी जिम्मेदारी मिले जो उनके लिए सियासी रूप से खतरा नहीं बन सके। यानी वही नेता चुनाव लड़ पाएगा जिसे आलाकमान का समर्थन मिलेगा।

आखिर शशि थरूर को भी 60 प्रस्तावक ही मिल पाए थे जो 10 से तो 6 गुणा ज्यादा थे लेकिन 100 से 40 कम भी थे। चुनाव हारने के बाद शशि थरूर जिस तरह से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और जिस तरह से खरगे भी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने से कतरा रहे हैं उससे साफ है कि चुनाव के दौरान शशि थरूर का आलाकमान कल्चर खत्म करने का बयान आलाकमान को रास नहीं आया है। आगे किसी शशि थरूर से मुकाबला न करना पड़े इसे देखते हुए नई व्यवस्था की जा रही है। अगर ऐसा ही है तो फिर लोकतंत्र कहां से हुआ।

कार्यसमिति के आधे सदस्यों का चुनाव करवाने से डरी कांग्रेस- जी-23 का कहना था कि संसदीय बोर्ड का गठन होना चाहिए जिसके लिए सदस्यों का मनोनयन ए.आई.सी.सी. को करना चाहिए। अब इस संसदीय बोर्ड को एक केंद्रीय चुनाव समिति का गठन करना चाहिए। यहां आधे सदस्यों का  संसदीय बोर्ड के लिए चुनाव तक करवाने की बात कही गई थी लेकिन आलाकमान इसके लिए तैयार नहीं हुआ। यहां सवाल  उठता है कि किस बात से डर गया आलाकमान?

अब अगर चुनाव समिति सीधे-सीधे ए.आई.सी.सी. के सदस्य चुन लेती तो उसकी कितनी विश्वसनीयता रह जाएगी। एक प्रस्ताव देश को 7 अलग-अलग इलाकों में बांटने और क्षेत्रीय समितियां गठित करने का भी था। माना जा रहा था कि इससे क्षेत्र विशेष की समस्याओं, चुनावी मुद्दों को सामने लाने में आसानी होगी लेकिन इसे भी हाशिए पर डाल दिया गया। तर्क दिया गया कि इन समितियों का प्रदेश कांग्रेस इकाइयों से टकराव होगा और एक नया पावर सैंटर खुल जाएगा।

हालांकि कहा जा रहा था कि ये समितियां राज्यवार चुनाव गठबंधन करने की संभावनाओं को टटोलतीं जिससे 2024 में भाजपा को बेहतर ढंग से चुनौती दी जा सकती थी। कुछ जानकारों का कहना है कि रायपुर में विपक्षी दलों के साथ गठबंधन को लेकर नीति-रणनीति पर खुल कर बात की जानी चाहिए थी और कोई खाका सामने आना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। कुछ का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान अभी भी इसी गुमान में है कि वह पूरे भारत की पार्टी है, भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी है और उसे पिछले चुनाव में 12 करोड़ वोट मिले थे।

जब सियासी दुश्मन  अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ सामने हो तो उसे हराने के लिए रणनीति बदलनी पड़ती है। कुल मिलाकर रायपुर की हुंकार का सार क्या है, उसे क्या गांव देहात का कार्यकर्ता समझ गया है? जवाब शायद न में है। क्या उसे पता चल गया है कि हिंदूवादी राजनीति पर क्या रुख अपनाना है? जवाब शायद न में है। उसके राज्य की गैर-भाजपा विपक्षी पार्टी के साथ क्या कांग्रेस चुनावी समझौता करने जा रही है या ऐसी कोई संभावना दिख रही है? जवाब शायद न में है। -विजय विद्रोही

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