क्या रहमान सरकार में सुधरेंगे भारत-बंगलादेश संबंध?

Edited By Updated: 19 Feb, 2026 05:53 AM

will india bangladesh relations improve in rahman sarkar

भारत के सबसे अप्रत्याशित और नए दुश्मन देश बंगलादेश में नव निर्वाचित सरकार पदारूढ़ हो गई। 17 साल बाद ब्रिटेन से स्वदेश लौट कर चुनाव में बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बी.एन.पी.) का नेतृत्व करने वाले तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री हैं। शपथ ग्रहण में...

भारत के सबसे अप्रत्याशित और नए दुश्मन देश बंगलादेश में नव निर्वाचित सरकार पदारूढ़ हो गई। 17 साल बाद ब्रिटेन से स्वदेश लौट कर चुनाव में बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बी.एन.पी.) का नेतृत्व करने वाले तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री हैं। शपथ ग्रहण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया गया था, पर भारत का प्रतिनिधित्व किया लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने। भारत की ओर से शुभकामना पत्र देते हुए बिरला ने तारिक को यात्रा का निमंत्रण भी दिया। अगस्त, 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में भारत-बंगलादेश संबंधों में कटुता चरम पर दिखी। बंगलादेश में हिंदू नागरिकों, उनके धर्मस्थलों एवं घरों-व्यावसायिक ठिकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया। हत्याएं और बलात्कार की घटनाएं भी हुईं। 

जिस भारत के सहयोग से 1971 में पाकिस्तान के शिकंजे और दमनचक्र से मुक्त हो कर बंगलादेश स्वतंत्र देश बन पाया, उसी के विरोध में यूनुस सरकार चीन और पाकिस्तान के साथ दोस्ती तक चली गई। बेशक जेन-जी के विद्रोह से अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत द्वारा शरण से भी परस्पर कटुता बढ़ी, लेकिन एक दोस्त देश का दुश्मनों से हाथ मिला लेना बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि दोनों के बीच लंबी सीमा है। इसी कटुता के परिणामस्वरूप बंगलादेश ने पाकिस्तान के उकसावे में आ कर टी-20 वल्र्ड कप क्रिकेट का बहिष्कार भी कर दिया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता परिवर्तन से भारत-बंगलादेश संबंध  सुधरेंगे? बेशक तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा कुछ नहीं कहा, जिससे आशंकित हुआ जाए। ज्यादातर जानकार उनके 31 सूत्रीय एजैंडा को बेहतर संबंधों की संभावना का ही संकेत मानते हैं। जमात-ए-इस्लामी पार्टी और शेख हसीना सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली जेन-जी की नैशनल सिटीजन पार्टी (एन.सी.पी.) की तरह भारत विरोधी कार्ड खेलने से तारिक ने परहेज ही किया। डिजिटल डोमेन और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस आदि के जरिए तारिक बंगलादेश को रेनबो नेशन बनाने का सपना दिखा रहे हैं, जिसमें भारत से संबंध सुधार की संभावनाएं प्रबल हो सकती हैं। 

तारिक मंत्रिमंडल में एक ङ्क्षहदू और एक बौद्ध को भी शामिल किया गया है, लेकिन यह भी सच है कि वह जिया उर रहमान और खालिदा जिया के राजनीतिक वारिस हैं, जो भारत विरोध की ही राजनीति करते रहे। यह तो ऐतिहासिक सच है कि बंगलादेश के जनक माने जाने वाले बंगबंधु शेख मुजीब उर रहमान और उनकी बेटी शेख हसीना भारत के सबसे विश्वसनीय दोस्त रहे, जिन्हें पहले जिया उर रहमान और फिर खालिदा जिया राजनीतिक चुनौती देती रहीं। यह भी कि जिया उर रहमान और खालिदा जिया के शासन में भारत-बंगलादेश संबंध कभी भी सहज नहीं रहे। संसद के जिन चुनावों में प्रचंड जीत के जरिए तारिक रहमान ने सत्ता हासिल की है, उनमें शेख हसीना की अवामी लीग को भाग नहीं लेने दिया गया। शेख हसीना इन चुनावों को मानने को भी तैयार नहीं हैं। 

जाहिर है, यूनुस सरकार द्वारा शेख हसीना के प्रत्यर्पण का आग्रह तारिक सरकार भी दोहराएगी। लगभग डेढ़ साल से भारत में रह रहीं शेख हसीना के प्रत्यर्पण का फैसला निश्चय ही भारत के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि उनके तख्तापलट के पीछे अन्य देशों की भूमिकाओं की चर्चा भी आम रही है। ऐसे में दोनों परिवारों की परंपरागत कटुता के अलावा वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी तारिक सरकार के लिए शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा गरमाए रखना अनुकूल साबित होगा। तारिक के पास अपने पिता जिया और मां खालिदा जैसा राजनीतिक अनुभव नहीं है, पर विदेश प्रवास के चलते देश के लिए नए सपने हो सकते हैं। उनकी अनुभवहीनता के चलते भारत विरोधी चीन और पाकिस्तान भी उन पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहेंगे। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि परंपरागत घरेलू राजनीति के चक्रव्यूह में फंसने की बजाय तारिक देश के बेहतर भविष्य की राह पर चलने का साहस जुटा पाते हैं या नहीं। इतिहास भी बताता है कि पाकिस्तान की तरह बंगलादेश में भी ‘भारत विरोध’ तमाम समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सरकारों का आजमाया हुआ नुस्खा रहा है।-राज कुमार सिंह

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