राजस्थान परंपरा तोड़ेगा या निभाएगा?

Edited By Updated: 24 Nov, 2023 05:29 AM

will rajasthan break the tradition or follow it

राजस्थान में चुनाव प्रचार का शोर थम गया है। वैसे इस बार शोर कम मचा अलबत्ता हो-हल्ला ज्यादा हुआ। नेताओं के भाषणों के स्तर में आ रही गिरावट यहां भी जारी रही। समूचा चुनाव गारंटियों पर आ टिका। यहां भी गैस सिलैंडर के दाम घटाने की होड़ चर्चा में रही।...

राजस्थान में चुनाव प्रचार का शोर थम गया है। वैसे इस बार शोर कम मचा अलबत्ता हो-हल्ला ज्यादा हुआ। नेताओं के भाषणों के स्तर में आ रही गिरावट यहां भी जारी रही। समूचा चुनाव गारंटियों पर आ टिका। यहां भी गैस सिलैंडर के दाम घटाने की होड़ चर्चा में रही। कांग्रेस की तरफ से अशोक गहलोत तो भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा सामने रहा। वोटरों की चुप्पी हैरानी में डालने वाली रही। मौजूदा विधायकों के खिलाफ नाराजगी देखी गई। यहां तक कि पार्टी कार्यकत्र्ताओं में उधार के सिंदूर यानी पैराशूट उम्मीदवारों के खिलाफ नाराजगी देखी गई। लेकिन इस बार एक नई बात देखी गई। अशोक गहलोत ने पहली बार खुद को माली (ओ.बी.सी.) बताया (हालांकि बगीचे की देखभाल करने वाले माली की तरह खुद की राजस्थान नाम के बगीचे के माली से तुलना की)। प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार अपने चेहरे की जगह कमल के फूल को भाजपा की पहचान बताया। 

मुद्दे : कांग्रेस ने 7 ताजा गारंटियों के साथ चल रही अन्य गारंटियों को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया। इसके साथ ही चिरंजीवी स्वास्थ्य योजना और पुरानी पैंशन स्कीम पर पूरा जोर दिया। चिरंजीवी योजना में मुफ्त इलाज की सीमा 25 लाख से बढ़ाकर 50 लाख करने को भुनाने की पूरी कोशिश की गई। गहलोत ने पहली बार अपनी योजनाओं को लेकर  दबाव डाला। प्रधानमंत्री से उनकी योजनाओं को देश भर में लागू करने का अनुरोध किया गया। आखिरी दिनों में तो बाकायदा विज्ञापन छापे गए कि जनता सोच-समझ कर वोट दे नहीं तो चिरंजीवी योजना से लेकर ओ.पी.एस. बंद कर दी जाएंगी। चुनाव प्रचार के अंतिम दिन खुद मोदी को भरोसा दिलाना पड़ा कि गहलोत की तमाम योजनाएं जिससे जनता को फायदा होगा, जस की तस लागू की जाएंगी। विज्ञापनों को लेकर विवाद में भी रहे गहलोत और कांग्रेस। भाजपा ने बाकायदा उसको लेकर शिकायत की और कांग्रेस को नोटिस तक जारी हुआ। 

उधर भाजपा का मुख्य मुद्दा गांधी परिवार की आलोचना से लेकर लाल डायरी और कांग्रेस के ध्रुवीकरण तक सिमटा रहा। वसुंधरा राजे सरकार की उपलब्धियां नहीं के बराबर गिनाई गईं। यहां तक कि मोदी सरकार के साढ़े 9 साल के कामकाज का बखान देने से ज्यादा जोर कांग्रेस को आलोचना पर था। उदयपुर में पिछले साल कन्हैयालाल नाम के दर्जी की तलवार से गला रेत कर की गई हत्या को भुनाने में मोदी से लेकर अमित शाह और नड्डा पीछे नहीं रहे। जयपुर के परकोटे में मोदी का रोड शो भी उन इलाकों में किया गया जहां 2008 में सीरियल बम धमाके हुए थे। भाजपा की रणनीति यही रही कि हिंदुत्व के बहाने अपने वोट बैंक को एकाग्र रखा जा सके और मतदान केंद्र वोट डालने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को ले जाने के लिए प्रेरित किया जा सके। 

विधायकों से नाराज वोटर : चुनाव प्रचार के दौरान मौजूदा विधायकों को अपने-अपने इलाकों में वोटरों की नाराजगी से दो चार होना पड़ा। इसमें कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा के मौजूदा विधायक भी शामिल रहे हालांकि ज्यादा संख्या कांग्रेस विधायकों की रही। दिलचस्प है कि कांग्रेस ने सिर्फ एक दर्जन विधायकों के ही टिकट काटे। भाजपा में यह संख्या 10 की रही। देखा गया कि कांग्रेस और भाजपा का कैडर कुछ जगह अपनी ही पार्टी के उस फैसले को पचा नहीं पाया जहां दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट थमा दिया गया। कांग्रेस में पहले 100 में से 60 के टिकट काटे जाने की चर्चा हो रही थी। फिर यह संख्या 40 पर आई लेकिन अंत में गहलोत और सचिन पायलट के समर्थक विधायकों को रिपीट कर दिया गया। गहलोत निर्दलीय विधायकों को भी टिकट दिलाने में कामयाब रहे जिन्होंने सचिन पायलट के मानेसर कांड के बाद सरकार को गिरने से बचाया था। 

एक तरफ टिकट पाने के लिए मारामारी रही तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के 3 नेताओं ने लाख मनुहार के बाद भी चुनाव लडऩे से मना कर दिया। टिकट काटने के फैसले में कांग्रेस उलझी रही और आखिरी दिन तक टिकट बांटने में लगी रही। चुनाव प्रचार के दौरान खास बात देखने को मिली कि वसुंधरा उन सीटों पर प्रचार करने के लिए नहीं गईं जहां उनका समर्थक बागी के रूप में मैदान में था। यही हाल गहलोत का भी था जो मजबूत बागी के यहां पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में चुनाव प्रचार करने से दूर रहे। ऐसा बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं को लग रहा है कि अगर पार्टी 95-96 सीटें जीतती है तो समर्थक बागी मुख्यमंत्री बनाने में मदद कर सकते हैं। ऐसा 2018 में हो चुका है। हालांकि सर्वे भाजपा की जीत बता रहे हैं। सट्टा बाजार भी ऐसे ही इशारे कर रहा है। लेकिन दोनों दलों को फंसी हुई सीटों की चिंता सता रही है। 

कौन आगे कौन पीछे  : चुनाव को कहीं-कहीं छोटे दलों और बागियों ने चुनाव को अटका दिया है ...भाजपा में कम से कम एक दर्जन बागी मजबूती से लड़ते दिखाई दे रहे हैं तो कांग्रेस में यह आंकड़ा 8 से 10 का बताया जा रहा है। दक्षिण के आदिवासी इलाकों में भारतीय ट्राइबल पार्टी और भारतीय आदिवासी पार्टी ने कम से कम 10 सीटों पर कांग्रेस की हालत खराब कर रखी है। वहीं हनुमान बेनीवाल और चन्द्रशेखर रावण का गठबंधन भी कुछ सीटों पर भाजपा को मुश्किल में डाले हुए है। मायावती की पार्टी आधा दर्जन सीटों पर दोनों दलों का खेल खराब कर सकती है। मायावती ने पिछली बार 6 सीटें जीती थीं। खैर, अब चाबी वोटरों के हाथ में है। वोटरों के सामने दोनों दलों की रियायतें हैं। कुल मिलाकर यह बात तय है कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के नाम पर गहलोत ने जो अभियान चलाया है अगर वह जीते तो राज्य सरकारों के काम करने का पूरा अंदाज ही बदल जाएगा। -विजय विद्रोही

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