Edited By jyoti choudhary,Updated: 18 Jul, 2026 03:17 PM

एकीकृत भुगतान प्रणाली (UPI) लेनदेन पर व्यापारी छूट दर (एमडीआर) लागू करने को लेकर जारी बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि आखिरकार इसका वित्तीय बोझ कौन उठाएगा, न कि इस बात पर कि भुगतान कंपनियों को टिकाऊ आय मॉडल की आवश्यकता है या नहीं। उद्योग...
नई दिल्लीः एकीकृत भुगतान प्रणाली (UPI) लेनदेन पर व्यापारी छूट दर (एमडीआर) लागू करने को लेकर जारी बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि आखिरकार इसका वित्तीय बोझ कौन उठाएगा, न कि इस बात पर कि भुगतान कंपनियों को टिकाऊ आय मॉडल की आवश्यकता है या नहीं। उद्योग विशेषज्ञों ने यह राय व्यक्त की है। यूपीआई भुगतान पर एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल लेनदेन की प्रक्रिया के लिए व्यापारियों (मर्चेंट्स) से लिया जाता है। इसके बैंकों या भुगतान मंचों द्वारा पूरी तरह वहन किए जाने की संभावना बहुत कम है। इसके बजाय, यह व्यवसायों के लिए एक अतिरिक्त परिचालन लागत बन जाएगा, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है, निवेश सीमित हो सकता है और उपभोक्ताओं को छूट देने की उनकी क्षमता कम हो सकती है।
इन पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि व्यापारी शुरू में इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन कर सकते हैं लेकिन आगे चलकर इसके कारण ग्राहकों को मिलने वाली पेशकश और छूट में कमी आ सकती है या वस्तुओं व सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। यह स्थिति व्यापार करने की लागत को कम करने और खपत को बढ़ावा देने के व्यापक नीतिगत प्रयासों को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों ने कहा कि इसका सबसे गहरा असर छोटे व्यापारियों, किराना दुकानों और उन अन्य व्यवसायों पर पड़ने की आशंका है जिन्होंने हाल के वर्षों में डिजिटल भुगतान को अपनाया है।
डिजिटल पेमेंट की रफ्तार हो सकता है धीमी
एमडीआर की मामूली दर भी कम मूल्य वाले लेनदेन के लिए यूपीआई की स्वीकार्यता को हतोत्साहित कर सकती है, जिससे डिजिटल भुगतान अपनाने की रफ्तार धीमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि व्यापारियों द्वारा डिजिटल भुगतान स्वीकार न करने या कम करने का असर व्यापक डिजिटल वाणिज्य परिवेश पर भी पड़ेगा। जो उपभोक्ता बिना किसी शुल्क और रुकावट के यूपीआई भुगतान के आदी हो चुके हैं, यदि व्यापारी यूपीआई लेनदेन को हतोत्साहित करने लगेंगे या बढ़ी हुई लागत का बोझ उन पर डालने लगेंगे, तो ग्राहकों के लिए भी डिजिटल भुगतान का उपयोग करने का प्रोत्साहन कम हो जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह चर्चा केवल भुगतान के अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के रूप में यूपीआई की भूमिका से जुड़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि बैंकों, भुगतान कंपनियों और अन्य हितधारकों के पास भुगतान परिवेश में निवेश जारी रखने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन हो, लेकिन इसके लिए व्यापार करने की लागत नहीं बढ़नी चाहिए, न ही उपभोक्ता मांग कमजोर होनी चाहिए और न ही डिजिटल अपनाने की गति धीमी होनी चाहिए।