Edited By Mansa Devi,Updated: 12 Feb, 2026 02:21 PM

इन्हीं प्रभावशाली शब्दों के साथ सीजीसी यूनिवर्सिटी, मोहाली में ‘साहित्यम 2026’ देश के प्रमुख साहित्यिक महोत्सवों में से एक का भव्य आगाज़ हुआ। यह आयोजन विचार, विमर्श और लेखनी की शक्ति का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। हजारों पुस्तकों की उपस्थिति से सुसज्जित...
नेशनल डेस्क: इन्हीं प्रभावशाली शब्दों के साथ सीजीसी यूनिवर्सिटी, मोहाली में ‘साहित्यम 2026’ देश के प्रमुख साहित्यिक महोत्सवों में से एक का भव्य आगाज़ हुआ। यह आयोजन विचार, विमर्श और लेखनी की शक्ति का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। हजारों पुस्तकों की उपस्थिति से सुसज्जित परिसर में प्रत्येक कहानी मानो अपनी धड़कन के साथ उपस्थित थी। महोत्सव के पहले दिन प्रख्यात साहित्यकारों, विशिष्ट व्यक्तित्वों और जिज्ञासु युवा मनों का प्रेरणादायी संगम देखने को मिला।
चर्चित हस्तियों का संगम
उद्घाटन सत्र में प्रसिद्ध लेखक और वक्ता अनिश कांजीलाल, अभिनेत्री पंखुरी गिडवानी, पत्रकार नवजोत रंधावा और ओलंपियन आशीष कुमार चौधरी ने शिरकत की। चर्चाओं का दायरा साहित्य, नेतृत्व, भाषा और नई पीढ़ी की बदलती मानसिकता तक विस्तृत रहा। पैनल चर्चा के दौरान अनिश कांजीलाल ने कहा कि यह संवाद “साहित्य से नेतृत्व तक” सहज रूप से प्रवाहित हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुस्तकें केवल अलमारियों तक सीमित नहीं रहतीं, वे विचारधाराओं, आंदोलनों और राष्ट्रों को आकार देती हैं।
जेन ज़ी के दौर में भाषा का विकास
कार्यक्रम का एक रोचक और विचारोत्तेजक क्षण तब आया जब भाषा के बदलते स्वरूप पर चर्चा हुई। मुख्यतः जेन ज़ी श्रोताओं को संबोधित करते हुए कांजीलाल ने पारंपरिक शब्दों जैसे “ऑलराइट” और “ओके” की तुलना आज के संक्षिप्त “K” से करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज़ में संवाद किया।
हालाँकि हास्य के पीछे एक गंभीर संदेश निहित था। उन्होंने कहा, “परिवर्तन ही सबसे बड़ा स्थिर तत्व है।” भाषा निरंतर प्रगति की प्रक्रिया है यह केवल सृजन नहीं, बल्कि सतत रूपांतरण है। स्वामी विवेकानंद के “प्रोग्रेशन” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि साहित्य, दर्शन और विज्ञान परस्पर जुड़े हुए हैं। समय की अवधारणा और उसके लचीलेपन जैसे विचार आधुनिक विज्ञान से पहले भी दार्शनिक चिंतन का हिस्सा रहे हैं।
इतिहास में शब्दों की शक्ति
कांजीलाल ने इतिहास के उदाहरण देते हुए भाषा की प्रभावशीलता को रेखांकित किया। उन्होंने विंस्टन चर्चिल का उल्लेख किया, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने ओजस्वी भाषणों से निराश ब्रिटेन में आशा का संचार किया। उन्होंने कहा, “चर्चिल ने अंग्रेज़ी भाषा को युद्धभूमि में उतार दिया था।”
भाषा निष्क्रिय नहीं होती;
वह प्रतिरोध और परिवर्तन का सशक्त माध्यम है। साथ ही उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि भाषा के विकास के साथ उसकी गरिमा और समृद्धि को बनाए रखें। सशक्त शब्दावली आत्मविश्वास को बढ़ाती है। “बिविचिंग” जैसे शब्द या “बॉयल डाउन टू” जैसे मुहावरे अभिव्यक्ति को गहराई और प्रभाव प्रदान करते हैं।
साहित्य, नेतृत्व और समाज
चर्चा का केंद्र साहित्य के व्यापक सामाजिक प्रभाव पर भी रहा। कांजीलाल ने लियो टॉल्स्टॉय का उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी रचनाओं ने महात्मा गांधी के विचारों, विशेषकर सत्याग्रह और अहिंसा की अवधारणा को गहराई से प्रभावित किया। गांधी पर जॉन रस्किन जैसे चिंतकों का भी प्रभाव रहा। यह दर्शाता है कि पुस्तकें मौन रहते हुए भी विश्व-परिवर्तनकारी नेताओं को आकार देती हैं।
राजनीतिक दर्शन की चर्चा करते हुए उन्होंने कार्ल मार्क्स का उल्लेख किया। 1842 के “वुड थेफ्ट” विवाद से प्रेरित होकर मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की ओर रुख किया, जिसका परिणाम ‘द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ और ‘दास कैपिटल’ जैसी कृतियों के रूप में सामने आया। चाहे समर्थन हो या विरोध, साम्यवाद ने वैश्विक राजनीति और शक्ति-संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। कांजीलाल ने कहा, “कल्पना कीजिए, यदि दुनिया में साम्यवाद न होता।” यह कथन किसी विचारधारा का समर्थन नहीं, बल्कि साहित्य के व्यापक प्रभाव का संकेत था।
बदलते दौर में शिक्षक की चुनौती
महोत्सव में वर्तमान समय की चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। डिजिटल व्याकुलताओं और घटते ध्यान-काल के बीच शिक्षण और सार्वजनिक वक्तृत्व अधिक चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। समाधान पुनः पढ़ने की आदत में निहित है जो गहराई, धैर्य और बौद्धिक जिज्ञासा को विकसित करती है। कांजीलाल ने कहा, “आत्मविश्वास ज्ञान से जन्म लेता है। एक अध्ययनशील मस्तिष्क भीड़ में भी मौन स्थापित कर सकता है।” उन्होंने ‘Read’ को अंग्रेज़ी शब्दकोश का सबसे शक्तिशाली शब्द बताया।
एक प्रेरक संदेश के साथ समापन
कार्यक्रम के अंत में स्कॉटलैंड की एक कहावत उद्धृत की गई “Many a mickle makes a muckle” अर्थात छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिवर्तन लाते हैं। साहित्य राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान और नेतृत्व से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। तेजी से बदलते भाषाई, तकनीकी और वैचारिक युग में ‘साहित्यम 2026’ यह स्मरण कराता है कि पुस्तकें आज भी हमारी सबसे विश्वसनीय साथी हैं। वे हमें चुनौती देती हैं, गढ़ती हैं और भविष्य के नेताओं के लिए आधार तैयार करती हैं। सीजीसी यूनिवर्सिटी, मोहाली में आयोजित ‘साहित्यम’ केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि यह विश्वास की पुनर्पुष्टि है कि कहानियाँ अंतिम पृष्ठ पर समाप्त नहीं होतीं वे हमारे भीतर आरंभ होती हैं।