Dharmik Katha: ‘मन’ की शुद्धि होने पर मिलता है हर सुख

Edited By Updated: 12 May, 2022 04:23 PM

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एक बार समर्थ रामदास भिक्षा मांगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और  उन्होंने आवाज लगाई, ‘‘जय-जय श्री रघुवीर समर्थ।’’

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एक बार समर्थ रामदास भिक्षा मांगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और  उन्होंने आवाज लगाई, ‘‘जय-जय श्री रघुवीर समर्थ।’’

घर की स्त्री बाहर आई। उनकी झोली में शिक्षा डालती हुई वह बोली, ‘‘महाराज, कोई उपदेश दीजिए।’’

स्वामी जी बोले, ‘‘आज नहीं, कल दूंगा।’’

दूसरे दिन वे पुन: उसके घर पर गए। गृहिणी ने उस दिन खीर बनाई थी। वह खीर का कटोरा बाहर लेकर आई।

स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने को आगे हुई तो उसने देखा कि कमंडल कुछ गंदा-सा है।

वह बोली, ‘‘महाराज, यह कमंडल तो गंदा है।’’ स्वामी जी बोले, ‘‘हां गंदा तो है परन्तु तुम उसी में खीर डाल दो।’’

‘‘तब तो खीर खराब हो जाएगी इसीलिए दीजिए, यह कमंडल मैं साफ कर देती हूं।’’

स्वामी जी बोले, ‘‘अर्थात कमंडल जब साफ हो जाएगा, तभी तुम इसमें खीर डालोगी?’’

 स्त्री ने उत्तर दिया, ‘‘जी महाराज!’’

स्वामी जी बोले, ‘‘तो मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक संसार की वासनाओं और विषय-लालसा की गंदगी भरी है तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ नहीं होगा। यदि लाभ पाना है तो पहले अपने मन को शुद्ध करना होगा, विषयों के प्रति उदासीनता लानी होगी, तभी तुम्हारा कल्याण हो सकता है।’’

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