Edited By Sarita Thapa,Updated: 25 Apr, 2026 02:41 PM

भगवान और भक्त से जुड़ी कई कहानियां हमें सुनने को मिलती है। किसी कहानी में भगवना भक्त की भक्ति के आगे झुक गए तो कहीं भक्त ने अपने प्रभु के लिए अपना सर्वत्र न्योछावर कर दिया।
Kannappa aur mahadev ki katha : भगवान और भक्त से जुड़ी कई कहानियां हमें सुनने को मिलती है। किसी कहानी में भगवना भक्त की भक्ति के आगे झुक गए तो कहीं भक्त ने अपने प्रभु के लिए अपना सर्वत्र न्योछावर कर दिया। लेकिन आज आपको एक ऐसी कथा के बारे में बताने हैं जिसे पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे की कैसे एक भक्त ऐसा काम कर सकता है। हम बात कर रहे हैं भक्त कन्नप्पा की जिन्होंने अपनी अनन्य भक्ति से प्रभु को प्राप्त कर लिया। तो आइए जानते हैं शिव के प्रति कन्नप्पा की अद्भुत भक्ति के बारे में-
पौराणिक कथा के अनुसार कन्नप्पा एक साधारण शिकारी थे, जिनका असली नाम थिन्नन था। एक बार वे अपने साथियों के साथ जंगल में शिकार करने गए, लेकिन शिकार के दौरान वे अपने साथियों से बिछड़ गए। भटकते-भटकते वे जंगल के एक ऐसे स्थान पर पहुंच गए, जहां एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित था और उसके भीतर एक शिवलिंग विराजमान था। जैसे ही थिन्नन की नजर उस शिवलिंग पर पड़ी, उनके मन में अचानक एक गहरा आकर्षण जाग उठा। उन्होंने उसी क्षण भगवान शिव को अपना आराध्य मान लिया। थिन्नन को पूजा-पद्धति या नियमों का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन उनके मन में सच्ची श्रद्धा और प्रेम था। वे वही अर्पित करते थे, जो उनके पास सबसे प्रिय और श्रेष्ठ होता था।
एक शिकारी होने के कारण वे भगवान शिव को मांस अर्पित करते और स्वयं भी वही ग्रहण करते थे। अभिषेक के लिए वे अपने मुंह में पानी भरकर लाते और उसी से शिवलिंग को स्नान कराते। जंगल से तोड़े गए फूल-पत्ते बिना साफ किए ही वे भोलेनाथ को चढ़ा देते थे। उसी मंदिर की देखरेख एक ब्राह्मण करता था, जो समय-समय पर वहां आता था। एक दिन जब वह मंदिर पहुंचा, तो उसने शिवलिंग के सामने मांस के टुकड़े पड़े देखे। उसे लगा कि यह किसी जंगली जानवर का काम होगा। उसने मंदिर की सफाई की और वापस चला गया। लेकिन जब यह घटना रोज होने लगी, तो ब्राह्मण को संदेह हुआ कि यह कार्य किसी मनुष्य का है।

वह शिवलिंग के सामने बैठकर व्यथित होकर प्रार्थना करने लगा— “हे प्रभु, आप तो समस्त संसार की रक्षा करते हैं, फिर अपने साथ ऐसा क्यों होने दे रहे हैं?” तभी भगवान शिव ने उसके मन में संदेश दिया— “जिसे तुम अपवित्र समझ रहे हो, वह मेरे प्रिय भक्त का प्रेम है। उसे पूजा-विधि का ज्ञान नहीं, लेकिन उसका हृदय सच्ची भक्ति से भरा है। मैं उसकी भावना से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूं। यदि तुम उसकी भक्ति देखना चाहते हो, तो छिपकर देखो।” भगवान शिव के आदेश अनुसार ब्राह्मण छिप गया। थोड़ी देर बाद थिन्नन वहां पहुंचे। उन्होंने हमेशा की तरह अपने मुंह में भरा जल शिवलिंग पर अर्पित किया और मांस चढ़ाया। तभी उन्होंने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से रक्त बहने लगा है।
यह देखकर वे घबरा गए। उन्होंने तुरंत जंगल की जड़ी-बूटियां लगाईं, लेकिन रक्त बहना बंद नहीं हुआ। तब थिन्नन ने बिना एक पल सोचे अपना बाण निकाला और अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग की आंख पर लगा दी। आश्चर्य की बात यह थी कि रक्त बहना तुरंत रुक गया। लेकिन तभी शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त बहने लगा। अब थिन्नन ने अपनी दूसरी आंख भी अर्पित करने का निश्चय किया।
लेकिन उन्हें एक चिंता हुई— “यदि मैं दूसरी आंख भी निकाल दूंगा, तो मैं सही स्थान पर उसे कैसे लगा पाऊंगा?” तब उन्होंने एक अद्भुत उपाय किया। उन्होंने अपने पैर को शिवलिंग पर उस स्थान पर रख दिया, ताकि आंख लगाने की सही जगह को पहचान सकें। जैसे ही वे अपनी दूसरी आंख निकालने वाले थे, उसी क्षण भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए। उन्होंने थिन्नन का हाथ पकड़ लिया और उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की। भगवान शिव उनकी इस अनन्य भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें “कन्नप्पा” नाम की उपाधि दी।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ