Edited By Sarita Thapa,Updated: 05 Sep, 2026 11:44 AM

हिंदू धर्म में देखा जाएं तो हर देवी-देवता का अपना कोई न कोई वाहन है। माता पार्वती का सिंह, गणेश जी का मुषक, महादेव के नंदी तो विष्णु जी के गरुड़। गरुड़, जिनकी गिनती देवताओं में भी होती है, पौराणिक कथाओं में इनका वर्णन एक ऐसे दिव्य पक्षीराज के रूप...
Garuda Vishnu Vahana Story : हिंदू धर्म में देखा जाएं तो हर देवी-देवता का अपना कोई न कोई वाहन है। माता पार्वती का सिंह, गणेश जी का मुषक, महादेव के नंदी तो विष्णु जी के गरुड़। गरुड़, जिनकी गिनती देवताओं में भी होती है, पौराणिक कथाओं में इनका वर्णन एक ऐसे दिव्य पक्षीराज के रूप में मिलती गै, जिनके नाम मात्र से ही बड़े-बड़े दैत्य और नहा भयभीत हो जाते हैं। लेकिन क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि स्वयं पक्षीराज कहलाएं जाने गरूड़ आखिर श्री हरि के वाहन कैसे बने। आखिर गरूड़ को ही ऐसा सौभाग्य क्यों प्राप्त हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसके पीछे एक पौराणिक कथा मिलती है जो काफी प्रचतिल है।
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थी, एक नाम कद्रू और दूसरी विनता थी। दोनों सगी बहनें थी लेकिन एक दूसरे से उनका प्रेम न था और सदैव उनमें एक दूसरे से आगे निकले की होड़ लगी रहती थी। एक बार महर्षि कश्यप ने उन दोनों को वर मांगने को कहा जिसमे कद्रू ने हज़ार नाग पुत्रों की मांग की तो वहीं विनता ने दो ही पुत्र मांगे लेकिन कहा की वह कद्रु के हज़ार नाग पुत्रों के कई अधिक शक्तिशाली हो। कद्रू ने 1000 अंडे दिए तो वहीं विनता ने दो। जब अंडे फूटने का समय आया तो कद्रू के सारे अंडे फूट गए और उसे 1000 नाग पुत्रों की प्राप्ति हुई लेकिन विनता के अंडे अभी भी वैसे थे। उत्सुकता में विनता से रहा नहीं गया और उसने अपना एक अंडा स्वयं ही फोड़ दिया, जिसमें से अरुण प्रकट हुए। उनका शरीर पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी माता को जल्दबाजी के लिए दोषी ठहराया और कहा कि दूसरे अंडे को समय से पहले न खोलें। कुछ समय पश्चाच दूसरा अंडा भी फूट गया जिसमें से गरुड़ देव का जन्म हुआ।
गरुड़ के तेज और बल इतना थी कि उनके पंखों की गति से आकाश तक कंपित होने लगा। समय बीता और एक दिन दोनों ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा। विनता ने कहा कि घोड़े की पूंछ सफेद है, कद्रू ने कहा कि घोड़े की पूंछ काली है। दोनों में शर्त लगी जो गलत होगा उसे दूसरे की दासी बनकर रहना होगा। कद्रू जानती थी कि वह गलत है इसलिए उसने अपने पुत्रों को आदेश दिया की तुम घोड़े की पूंछ से लटर जाओ ताकि वह काले रंग की प्रतीत हो। जब विनता और कद्रू ने घोड़े की पूछ देखी तो वह काली थी जिसने विनता हार गई और कद्रू की दासी बन गई।
जब गरुड़ को अपनी माता की स्थिति के बारे में पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने नागों से अपनी माता को मुक्त करने का उपाय पूछा। नागों ने कहा कि यदि गरुड़ उनके लिए स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आएं, तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे। गरुड़ मान गए और तेज़ गति से इंद्र लोक की ओर निकल पड़ें और कई कठिनाइओं के पश्चात गरुड़ ने अमृत कलश प्राप्त कर लिया। सभी देवताओं ने गरुड़ देव की हराने का प्रयास किए लेकिन वह सब असफल रहे। कहा जाता है कि गरुड़ के पराक्रम को देखकर देवराज इंद्र भी आश्चर्यचकित रह गए।
अमृत लेकर जाते समय गरुड़ देव की भेंट भगवान विष्णु से हुई। गरुड़ का पराक्रम देखकर श्री हरि बहुत प्रसन्न थे। भगवान विष्णु और गरुड़ के बीच संवाद हुआ। गरुड़ ने भगवान के सामने अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं रखी। उनके मन में केवल अपनी माता विनता को दासता से मुक्त कराने का उद्देश्य था। जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने गरुड़ से वरदान मांगने को कहा। तब गरुड़ ने ऐसा वर मांगा जिससे वह बिना अमृत पिए ही अमर रह सकें। कहा जाता है कि गरुड़ ने भी भगवान विष्णु को वर मांगने के कहा जिसपर श्री हरि ने उन्हें अपने वाहन बनने को कहा। गरुड़ ने भगवान विष्णु की इस इच्छा को स्वीकार कर लिया इसी तरह गरुड़ देव भगवान विष्णु के दिव्य वाहन बन गए।
इसके बाद गरुड़ जब अमृत लेकर जा रहे थे, तब देवराज इंद्र ने उनका पीछा किया। गरुड़ ने इंद्र से कहा कि वह अमृत को स्वयं पीने वाले नहीं हैं। उनका उद्देश्य केवल अपनी माता को दासता से मुक्त कराना है। गरुड़ ने अमृत को नागों तक पहुंचाने का वचन दिया था, लेकिन उन्होंने अमृत पीने की अनुमति किसी को देने का स्थायी वचन नहीं दिया था। गरुड़ ने अमृत कलश नागों के सामने रख दिया और कहा कि पहले वे स्नान करके शुद्ध होकर आएं, उसके बाद अमृत ग्रहण करें। जैसे ही नाग स्नान करने गए, इंद्र ने अवसर पाकर अमृत कलश वापस ले लिया। जब नाग लौटे तो उन्हें अमृत नहीं मिला। उन्होंने जहां अमृत रखा गया था, वहां मौजूद कुश घास को चाटना शुरू कर दिया। इसी कारण उनके जीभ के दो हिस्से हो गए, ऐसी पौराणिक मान्यता है। इस तरह गरुड़ ने अपनी बुद्धि और वचन दोनों की रक्षा करते हुए अपनी माता को दासता से मुक्त करा दिया।
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ