Edited By Sarita Thapa,Updated: 11 Jun, 2026 10:21 AM

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में से खास और बेहद फलदायी माना जाता है। हर महीने शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में आने वाली दोनों एकदाशी पर भगवान विष्णु की पूजा करना बहुत शुभ होता है।
Goddess Ekadashi and Demon Mura Story : हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में से खास और बेहद फलदायी माना जाता है। हर महीने शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में आने वाली दोनों एकदाशी पर भगवान विष्णु की पूजा करना बहुत शुभ होता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से और पूरे विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। क्या आप ने कभी सोचा है कि एकादशी व्रत की शुरुआत कैसे हुई। एकादशी कोई एक तारीख नहीं हैं, बल्कि एक देवी का नाम है। महाभारत काल में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को एकादशी माता के जन्म और मुरा नाम के दैत्य के वध की यह अद्भुत कथा सुनाई थी। तो आइए जानते हैं देवी एकादशी और मुरा राक्षस की पौराणिक कथा के बारे में-
भगवान विष्णु और मुरा के बीच भयंकर युद्ध
पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग में नाडीजंघ नाम का एक अत्यंत बलशाली राक्षस था। उसी का पुत्र था मुरा। बचपन से ही मुरा का स्वभाव क्रूर और महत्वाकांक्षी था। उसने अपनी कड़ी तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर कई अजय वरदान हासिल कर लिए थे। उसने अपने वरदान और पराक्रम से देवताओं में जीत हासिल की और स्वर्ग लोक पर अपनी काबू पा लिया था। उसने देवराज इंद्र, अग्नि, वायु और यमराज सहित सभी देवताओं को हरा दिया और स्वयं स्वर्ग का राजा बन बैठा। मुरा के अत्याचारों से परेशान होकर इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता भगवान शिव के पास मदद के लिए पहुंचे। भगवान शिव ने उन्हें इस संकट से मुक्ति पाने के लिए क्षीरसागर में विराजमान जगत के पालनहार भगवान विष्णु के पास जाने की सलाह दी।

जैसे ही भगवान विष्णु ने मुरा द्वारा देवताओं पर हुए अत्याचारों के बारे में पता चला तो वह बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए। उन्होंने देवताओं को हौंसला दिया और मुरा की विशाल सेनी के साथ युद्ध करने के लिए युद्ध क्षेत्र में उतर पड़े। यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। लगातार युद्ध करते-करते नारायण ने लीला रचते हुए थोड़ा विश्राम करने की सोची। वे युद्ध क्षेत्र से हटकर बद्रीनाथ की एक विशाल गुफा में चले गए। वहां भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन हो गए। भगवान विष्णु का पीछा करते हुए मुरा भी उस गुफा में पहुंच गया। उसने भगवान को विश्राम करते देखा और उन पर हमला करने का विचार बनाया। उसी समय भगवान विष्णु के दिव्य तेज से एक अद्भुत और तेजस्वी देवी प्रकट हुई। अचानक प्रकट हुई उस देवी का तेज इतना तेज था कि मुरा कुछ समय के लिए बिल्कुल ही अंधा हो गया। देवी ने मुरा को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ, लेकिन अंत में कुछ ही समय में देवी ने मुरा के सभी अस्त्र-शस्त्र नष्ट कर दिए और उसका वध कर दिया। इस प्रकार तीनों लोकों को मुरा के आतंक से मुक्ति मिली।
कैसे हुई एकादशी व्रत की शुरुआत?
जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने मुरा के शव को देखा और सामने उस तेजस्वी देवी को हाथ जोड़े खड़ा पाया। तब देवी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि जिस दिन वे प्रकट हुई हैं, उस दिन जो भी भक्त सच्चे मन से उसका व्रत रहेगा। उसके मन की हर मुराद पूरी होगी और जीवन में आने वाली हर परेशानी से छुटकारा मिलेगा। चूंकि, देवी का प्राकट्य कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि अर्थात एकादशी को हुआ था, इसलिए भगवान विष्णु ने उनका नाम एकादशी रखा। तभी से एकादशी व्रत की परंपरा शुरू हुई और यह तिथि भगवान विष्णु की प्रिय मानी जाने लगी।

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