Edited By Niyati Bhandari,Updated: 16 Jul, 2026 04:32 PM

Himalayan Snowfall study: हिमालय की चोटियों पर होने वाली बर्फबारी अब तक वैज्ञानिकों के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई थी, लेकिन एक नए अंतर्राष्ट्रीय शोध ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे और आई.आई.टी. खड़गपुर के वैज्ञानिकों के इस...
लंदन (एजैंसी): हिमालय में होने वाली बर्फबारी को लेकर वर्षों से लगाए जा रहे अनुमान वास्तविकता से काफी कम साबित हुए हैं। एक नए अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश के हम्प्टा झील क्षेत्र में केवल एक सर्दी के मौसम के दौरान हुई कुल बर्फबारी का अनुमान उपलब्ध सबसे बेहतर मॉडल में भी 37 प्रतिशत कम लगाया गया था। शोधकर्त्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन हिमालय में बर्फबारी के अधिक सटीक आकलन और भविष्य के जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में अहम भूमिका निभा सकता है।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे, ब्रिटिश मौसम विज्ञान कार्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) खड़गपुर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि हिमालय जैसे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों की जटिल भौगोलिक संरचना के कारण अब तक बर्फबारी का सही आकलन करना चुनौतीपूर्ण रहा है।
‘मंथली वेदर रिव्यू’ पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार वैज्ञानिकों ने पश्चिमी हिमालय की घेपन और हम्प्टा झीलों तथा नेपाल की मुगु झील में विशेष जल-दाब संवेदक (वाटर प्रेशर सैंसर) स्थापित किए।
ये सैंसर आर्किमिडीज के विस्थापन सिद्धांत के आधार पर झील के पानी के दबाव में होने वाले बदलाव से बर्फ के वास्तविक द्रव्यमान का आकलन करते हैं, जिससे बर्फबारी का अधिक सटीक और निष्पक्ष अनुमान मिलता है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक एवं ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के पर्वतीय जलवायु वैज्ञानिक सिद्धार्थ गुंबर के अनुसार, यह तकनीक न केवल बर्फबारी के समय बल्कि उसकी मात्रा का भी सटीक अनुमान लगाने में सक्षम है। विशेष रूप से भारी हिमपात की घटनाओं को दर्ज करने में यह मॉडल पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी साबित हुआ है।
शोधकर्त्ताओं का कहना है कि हिमालय की बर्फ करोड़ों लोगों के लिए मीठे पानी का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में बर्फबारी का सटीक आकलन नदियों में जल प्रवाह, जल संसाधनों की उपलब्धता और भविष्य में पानी की कमी जैसी चुनौतियों का बेहतर अनुमान लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते जलवायु परिवर्तन के दौर में पर्वतीय जल स्रोतों की नई तकनीकों से लगातार निगरानी करना समय की बड़ी आवश्यकता बन गया है।