Inspirational Context : करोड़ों का आश्रम या मन का संतोष ? जानिए जीवन की उस अनमोल पूंजी के बारे में जो बाजार में नहीं मिलती

Edited By Updated: 26 Mar, 2026 04:44 PM

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एक संत को अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन की जरूरत पड़ी। वह अपने शिष्यों को साथ लेकर धन जुटाने के लिए लोगों के पास गए। घूमते-घूमते वह एक गांव में अपनी शिष्या एक बुढ़िया की कुटिया में पहुंचे। कुटिया बहुत साधारण थी।

Inspirational Context : एक संत को अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन की जरूरत पड़ी। वह अपने शिष्यों को साथ लेकर धन जुटाने के लिए लोगों के पास गए। घूमते-घूमते वह एक गांव में अपनी शिष्या एक बुढ़िया की कुटिया में पहुंचे। कुटिया बहुत साधारण थी। रात हो गई तो संत वहीं ठहर गए। बूढ़ी मां ने उनके लिए खाना बनाया।

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खाने के बाद संत के सोने के लिए मां ने एक तख्त पर दरी बिछा दी और तकिया दे दिया। खुद वह जमीन पर एक 'टाट' बिछाकर सो गईं। थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद सो गईं, लेकिन संत को नींद नहीं आ रही थी। वह दरी पर सोने के आदी नहीं थे। अपने आश्रम में सदा मुलायम गद्दे पर सोते थे।

संत सोचने लगे कि जमीन पर टाट बिछा कर सोने के बावजूद इसको गहरी नींद आ गई और मुझे तख्त पर दरी के बिछौने पर भी नींद क्यों नहीं आई? 

यह बात उन्हें देर तक मथती रही। सोचने लगे, एक दिन यहीं रुकता हूं, देखता हूं कि यह ऐसा कौन-सा मंत्र जानती है कि ऐसी अवस्था में भी प्रसन्न है, चैन से सोती है।

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सुबह जल्दी उठकर बूढ़ी मां ने अपने हाथ से कुटिया की सफाई की। गुरु को प्रणाम किया और कुछ देर बैठ कर भगवान नाम का स्मरण किया। आंगन से सब्जियां तोड़ कर भोजन पकाया। गुरु को प्रथम भोजन करवा कर आप ग्रहण किया। दिन में आस-पड़ोस की बच्चियों को बुला कर उन्हें हरि कथा सुनाई। 

फिर संध्या पूजन, रात को पुनः सादे भोजन का प्रबंध। सोने की तैयारी। गुरु सोचने लगे आज फिर नींद नहीं आएगी। पूछ ही लूं कि क्या रहस्य है। संत ने पूछा, "देवी, तुमने मेरे लिए अच्छा बिछौना बिछाया। फिर भी मुझे नींद नहीं आई जबकि तुम्हें जमीन पर गहरी नींद आ गई। इसका कारण क्या है?"

वह बोलीं, "गुरुदेव जब मैं सोती हूं तो मुझे पता नहीं होता कि मेरी पीठ के नीचे गद्दा है या टाट। मैं सुख-दुख सब भूल कर परमपिता की गोद में सो जाती हूं, इसलिए मुझे गहरी नींद आती है।"

संत ने कहा, "मैं अपने सुख के लिए धन एकत्रित करने निकला था। यहां आकर मुझे मालूम हुआ कि सच्चा सुख भव्य आश्रम में नहीं बल्कि संतोष में है।"

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